__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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परियों का तालाब –

मुजफ्फरनगर जनपद में एक ऐसा तालाब है जिसे परियों के तालाब के नाम से जाना जाता है। किवदंती है और बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि किसी समय इस तालाब के किनारे गांव में बसने वाले पीर अपनी संगत जमाते थे तथा रात में यहां परियां जलक्रीड़ा करती थी। परियां स्नानादि से निवृत्त होकर यहां नाच-गाना मनोरंजन आदि करती थी तथा मनोरंजन के लिए गांव वाले भी यहां आते थे। नाच गाने के बाद परियां प्रसाद के रूप में कुछ खाने की वस्तुएं देती थी। लेकिन उस प्रसाद को वहीं पर खा लेना होता था यदि उसे घर पर लाने की कोशिश की जाती थी तो वह कोयले की राख के समान हो जाता था और खाने लायक नहीं रह जाता था।

समय बीतने के बावजूद इस तालाब का अस्तित्व अभी भी कायम है। यह ऐतिहासिक ‘परियों का तालाब’ मुजफ्फरनगर जनपद के खतौली कस्बे की नगर पालिका की सीमा से बिल्कुल सटे हुए शेखपुरा गांव में कई एकड़ में घनी आबादी के बीच स्थित है।

शेखपुरा गांव को पीर-पगारों का गांव माना जाता है। इस गांव में कई पीरों की मजारें हैं। जिनकी मान्यता दूर-दूर तक है। मान्यता होने के कारण प्रत्येक जुम्मेरात (बृहस्पतिवार) के दिन यहां श्रद्धालुओं का मेला सा लगा रहता है।

परियों के तालाब के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि लगभग 200 वर्ष से भी पहले हैदराबाद से यहां आए पांच पीरों ने इस तालाब का निर्माण कराया था। किवदंती है कि पीरों के द्वारा इस तालाब के निर्माण कराए जाने के समय वे मजदूरों को मजदूरी एक अनोखे वस्त्र के नीचे से धन निकाल कर देते थे।

इस परियों के तालाब की सुंदरता देखते ही बनती है। तालाब की गहराई का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि धरातल से इस तालाब में नीचे जाने के लिए 52 पैडियां बनी हुई हैं। तालाब की चारों दिशाओं में लखोरी ईंटों की मोटी दीवारें हैं और उनके बीच में से ढालदार चार पक्के घाट बनाए गए हैं। साथ ही तालाब के चारों ओर पक्की पेडियां बनी हैं। लोगों के बैठने के लिए तालाब पर आठ बुर्जियां बनी हैं। जहां से इस तालाब की छटा देखी जाती थी।

गांव के लोगों का कहना है कि इस तालाब का पानी कभी नहीं सूखता है। तालाब के न सूखने के विषय में भी यहां एक कहावत है कि तालाब के चारों किनारों पर बने हुए कुओं से इस तालाब में पानी आते रहने के कारण यहां का पानी नहीं सूखता है।

तालाब के उत्तर दक्षिण दोनों किनारों पर पत्थर से बने प्राचीन मंदिरों से इस तालाब की शोभा और भी अधिक बढ़ जाती है। उत्तर की दिशा में बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाली धार्मिक आस्थाओं की प्रतीक माताओं के स्थान बने हैं। प्रतिवर्ष अपने बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा की कामना हेतु बड़ी संख्या में माताएं यहां पूजन करने के लिए आती हैं। उस समय यहां मेले जैसा दृश्य हो जाता है।

इस क्षेत्र के लोगों की इस तालाब के बारे में मान्यता है कि इसमें जो भी स्नान करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

शासन-प्रशासन तथा पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते इस ऐतिहासिक तालाब की सुंदरता धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। बड़े बुजुर्गों का यह भी कहना है कि उन्होंने ऐसा सुंदर भव्य तालाब यहां आसपास के किसी और स्थान पर नहीं देखा है।

यह स्थान नेशनल हाईवे 58 पर स्थित है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्री यहां से होकर गुजरते हैं। प्रशासन अगर इस स्थान का सौंदर्यकरण करा कर इस तालाब में नौका विहार की व्यवस्था कराए तो यह एक सुंदर पर्यटन स्थल बन सकता है।

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