_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी.के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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हिमालय के अनुपम सौंदर्य और अद्भुत आकर्षण के लिए विख्यात देवभूमि उत्तराखंड में देहरादून जनपद के लाखामंडल से पांडवों की स्मृतियां जुड़ी हुई है।

लाखामंडल का प्राचीन नाम ‘ मोड़ा ‘ था जो कालांतर में लाखामंडल यानी ‘ लाख का महल ‘ कहां जाने लगा। महाभारत काल में दुर्योधन ने पांडवों को नष्ट करने के लिए यहीं लाख का महल बनवाया था। दुर्योधन ने छल नीति से पांडवों को यहां भेज दिया था। वह पांडवों को माता कुंती सहित इस महल में अपने अनुचरों के द्वारा आग लगवाकर समाप्त कर देना चाहता था लेकिन पांडव विदुर के संकेत से एक सुरंग से सुरक्षित बच निकले थे। आज भी उस लंबी सुरंग का मुहाना पर्यटक अपनी आंखों से देख सकते हैं।

लाखामंडल नाम का यह प्राचीन स्थान देहरादून जनपद के जनजातीय क्षेत्र चकराता के पास यमुना नदी के किनारे स्थित है। प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहाड़ों की रानी मसूरी से कैंप्टीफॉल, नैनबाग, डामटा, कुआं होते हुए चकराता अंचल के रंग-बिरंगे प्राकृतिक दृश्यों को देखते हुए लाखामंडल पहुंचा जा सकता है।

यहां के निवासी अपने आप को विशुद्ध पांडवों के वंशज बताते हैं तथा पांडवों के प्रति अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त करते हैं। यहां के लोग पांडवों की पूजा के अतिरिक्त शिव की पूजा भी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास का समय यहां पर बिताया था और इस क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा की थी। लाखामंडल गांव के सामने की ओर कई प्राचीन गुफाएं हैं। इन गुफाओं की संख्या पांच है। यहां के निवासी बताते हैं कि इन्हीं गुफाओं में रहकर पांडवों ने बारह वर्ष के वनवास के बाद तेरहवें वर्ष के अज्ञातवास का समय यहीं प्रतीत किया था।

लाखामंडल नामकरण के संबंध में एक और प्रमुख प्राचीन तथ्य यह भी कहा जाता है कि जिन पेड़ों से लाख के कीड़े, ‘लाख’ का निर्माण करते हैं, वे पेड़ यहां के आस-पास के जंगलों में होते हैं। लाख के इन्हीं पेड़ों से प्राप्त होने वाले लाख से दुर्योधन ने पांडवों के लिए ‘लाख’ का घर बनवाया था। वैसे आज के समय में इन पेड़ों की संख्या बहुत कम रह गआज लाखामंडल देहरादून जनपद के चकराता क्षेत्र का छोटा सा गांव है लेकिन किसी समय सुखी और समृद्ध राज्य था। लाखामंडल राज्य की परिकल्पना के आधार के लिए उल्लेख मिलता है कि लाखामंडल, बाटाहाट मंडल(उत्तरकाशी) कि दक्षिणी सीमा से अंबाला, सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र तक विस्तारित था। इस मंडल में संतर, सोल,शेर,ननोर,कौवा,रत्न,कुडली आदि अनेक गढ़ थे। इस क्षेत्र की समृद्धि का राज यहां की नदियां ही हैं। इन्हीं क्षेत्रों तथा नदियों के कारण यहां बड़ी संख्या में लोग निवास करते थे। प्राचीन ग्रंथों में भी यहां घनी जनसंख्या के निवास करने के उल्लेख मिलते हैं।

एक बहुत बड़े इलाके में फैला और धनधान्य से परिपूर्ण रहा यह क्षेत्र लाखामंडल धीरे-धीरे सिमटता चला गया। यह स्थान राजा-महाराजाओं का आधार स्थल रहा है। लेकिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को बचाने की आवश्यकता है।

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