__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र. भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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आम की कई बेहद उम्दा किस्मे यहां होती है देश में ही नहीं विदेशो में भी प्रसिद्ध है यहां के आम

फलों का राजा आम
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आम भारत का वह खास फल है, जिसकी महिमा हजारों वर्षों से वेद पुराणों तक में गाई गई है। ईसा से भी हजारों वर्ष पहले बृहदारण्यक उपनिषद और फिर शतपथ ब्राह्मण में आम के पेड़-पत्तों व फलों की महिमा का वर्णन मिलता है।

आम की सोंधी गंध और मिठास किसे नहीं लुभाती है।
आम का बेजोड़ स्वाद और पोषक तत्व इसकी लोकप्रियता को बढ़ाते हैं। आम का स्वाद ही नहीं खुशबू भी मन को प्रसन्न कर देती है।

इसलिए ही आम के वृक्ष को कल्पवृक्ष तक कहा जाता है।

आम का हमारे धर्म और संस्कृति में भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।

आम को अनादि काल से भारतीय संस्कृति का प्रतीक माना जाता है।

आम के उपवनों का उल्लेख रामायण में भी मिलता है। विष्णु पुराण में वर्णन है की भगवान विष्णु को आम अति प्रिय है। भगवान विष्णु को चढ़ाए जानेवाले नैवेद्य में सबसे पहले आम को ही अर्पित किया जाता है।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में आम की उपमा एक परोपकारी के रूप में की है। तुलसीदास जी ने रामायण में एक संत पुरुष को आम वृक्ष की तरह उल्लेख किया है। आम का वृक्ष दूसरे के लिए ही फल देता है पत्थर मारने वाले को भी वह मधुर रस से भरपूर आम का फल देता है।

आम से जुड़ी अनेक रोचक बातों में एक है -आम के बाग का विवाह जोकि भारतीय संस्कृति का एक अंग बन चुका है।

आम का बाग लगाने वाले उस बाग में आम के पेड़ों पर पहली बार फल आने पर आम का विवाह रचाते हैं। उसके पश्चात ही आम के पेड़ पर आने वाले फलों का रसास्वादन करते हैं। आम के बाग के पेड़ों के विवाह में सम्मिलित होने के लिए अपने सभी सगे-संबंधियों व मित्रों को आमंत्रित करते हैं।

आमतौर पर होने वाले किसी विवाह मे जिस प्रकार सभी परंपराओं को निभाया जाता हैं। उसी प्रकार ही आम के विवाह के आयोजन करने पर मंगल गीत गाए जाते हैं व अन्य परंपराओं को निभाया जाता है।

भारतीय संस्कृति में वृक्षों को पूरा संरक्षण दिया जाता है। भारतीय संस्कृति व साहित्य में आम को बहुत महत्व दिया गया है।

भारत में आम की पैदावार उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक होती है और उत्तर प्रदेश में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को तो एक तरह से आम पट्टी ही कहा जाता है।

यहां के आम अपने मधुर स्वाद व सुगंध के लिए देस ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है।

मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शामली, बिजनौर, मुरादाबाद, हापुड़, गाजियाबाद में आम के बागों में आम की एक से एक बेहतरीन किस्मों का खजाना है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुंज स्थान व गांव जैसे रटोल, बेहट, धौलडी, सिरौली, शाहजहानपुर, किठौर ,आदि की पहचान तो आम के बागों के साथ ही जुड़ी हुई है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगभग 90 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आम के बाग है।

फरवरी महीने के शुरुआत में ही ऋतुराज बसंत की पदचाप आहिस्ता से किंतु साफ-साफ सुनाई देने लगती है। आम की अमराइयो में आम के पेड़ों पर कहीं-कहीं बोर निकलने लगता है। भौंरे मंडराने लगते हैं। बेहद हल्की मादक सुगंध वातावरण में फैलने लगती है।

मार्च के महीने के शुरू में ही आम के पेड़ों पर बसंत की बहार छा जाती है। इस समय आम के बागों में बहार आ
आती है। आम के पेड़ बौरा जाते हैं, पेड़ों पर लकदक बौर की मादक सुगंध हवा में चारों ओर फैल जाती है।

आम की अमराइयो में कोयल की कूक सुनाई देने लगती है।

मई महीने में आम के पेड़ों पर लटकते हरे-हरे आमों से टपकता नूर बागानों की शोभा बढ़ाने लगता है।
खूबसूरत बागानों के आम के पेड़ों की डालों पर तरह-तरह की प्रजाति के आम झूलने लगते हैं।

इस क्षेत्र के बागों में बहार आ जाती है।सुनसान पड़े आम के बागों में हलचल बढ़ जाती है।

मार्च के महीने से जून-जुलाई तक के बीच के महीनों में इस क्षेत्र में जहां के मार्गों के दोनों ओर आम की घनी अमराइयां हैं या इस क्षेत्र में जहां आम फलपट्टी के इलाके हैं। वहां के रास्तों पर यात्रा करते हुए इन सब का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।

प्रतिवर्ष मई माह के अंतिम सप्ताह से आम बाजार में अपनी पैठ लगानी शुरू कर देता है और जून माह के आते ही आम पूरे बाजार पर कब्जा कर लेता है। इन दिनों चारों ओर आम ही आम दिखाई देता है। हर कोई फलों में केवल आम की खरीदारी करता ही नजर आता है।

नेशनल हाईवे वे अन्य मार्गों पर जहां आम के बाग होते हैं वहां सड़कों के किनारे दूर तक आम की अनेक किस्मों की दुकानें सज जाती है। हाईवे पर यात्रा करने वाले यात्री यहां से रसीले आम खरीद कर अपने साथ ले जाते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रसीले आमों की मिठास की बादशाहत विदेशों में भी कायम है।

००० रटौल ०००. (जि० बागपत)

आकार में छोटा और मिठास में बेजोड़ भीनी-भीनी सुगंध वाला अनवर रटोल का आम।
गर्मी का मौसम हो और आम के शौकीनों के बीच बागपत जिले के रटोल गांव के अनवर रटौल आम की चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। अपनी भीनी भीनी सुगंध और मधुर स्वाद के लिए देश ही नहीं विदेशों में भी यह चर्चाओं में रहता है।

बागपत जिले का रटोल गांव अपने अनवर रटोल आम की किस्म के माध्यम से देश ही नहीं विदेशों में भी अपना नाम रोशन किए हुए हैं।

रटोल गांव में पैदा होने वाले आम भारत ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है। यहां होने वाले रटोल नाम के आम की पहचान विदेशों तक में है। इस आम का यदि कोई एक बार स्वाद चख ले तो वह इसे भूल नहीं पाता है।
मधुर स्वाद व सुगंध वाले रटोल प्रजाति के आम के विषय में वैसे तो कई किवदंती प्रचलित हैं। गांव के बड़े बुजुर्गों का कहना है कि रटोल गांव में आम की बागवानी की शुरुआत सन 1914 के आसपास शुरू हुई। स्वर्गीय मोहम्मद आफाक फरीदी यहां आम की बागवानी करने वाले सबसे पहले व्यक्ति थे। उन्होंने यहां आम की कई किस्मों को इजाद किया। विभिन्न प्रांतों से लाए गए आमों को यहां रोप कर उन्होंने रटोल गांव के आमों की लोकप्रियता इतनी बढ़ा दी कि उन आमों को रटोल आम के नाम से पुकारा जाने लगा। आज रटोल के आमों की विदेशों में भी बड़ी मांग है।

स्वर्गीय आफाक ने यहां की आम की बागवानी में जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने
सोहरे आफाक नर्सरी की स्थापना कर लगभग 450 किस्में तैयार की। कहा जाता है कि उन्होंने ही आम की रटोल किस्म की इजाज की थी, क्योंकि इस रटोल आम का पौधा अनवर नाम के एक किसान के खेत में तैयार किया गया था। इसलिए पहले इसे अनवर रटौल के नाम से ही जाना जाता था, जो बाद में केवल रटोल आम के नाम से जाना जाता है।

रटोल आम से एक बहुत ही दिलचस्प घटना जुड़ी हुई है।

पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को बतौर उपहार आम की एक पेटी यह कहलवा कर भिजवाई कि पाकिस्तान की बेहतरीन आम की वैरायटी रटोल आपको पसंद आएगी। और रटोल आम की वह किस्म श्रीमती इंदिरा गांधी को वास्तव में बहुत पसंद भी आई, श्रीमती इंदिरा गांधी ने जियाउल हक को भारत से लीची भेजी।
उस समय मीडिया में रटोल आम की बहुत चर्चा हुई थी।
मीडिया के कारण खबरों में आई रटोल आम की प्रसिद्धि से रटोल गांव का एक प्रतिनिधि मंडल दिल्ली जाकर श्रीमती इंदिरा गांधी से मिला था और रटोल प्रजाति के आम भेट कर पूरी हकीकत से अवगत कराया। साथ ही यह भी बताया कि पाकिस्तान जिस आम को अपनी बेहतरीन वैरायटी बता कर शेखी बघारता है, वह वास्तव में अपने देश की राजधानी दिल्ली से केवल 35 किलोमीटर दूर स्थित रटोल गांव की पैदाइश है, यहीं से यह किस्म पाकिस्तान गई हुई है। तब श्रीमती इंदिरा गांधी को जियाउल हक द्वारा भेजी गई आम की पेटी और उसके साथ भिजवाए गए संदेश की याद आई।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने तत्काल रटोल आम की एक पेटी जियाउल हक को यह संदेश लिखकर भिजवाई कि मैं आपको असली अनवर रटोल आम भिजवा रही हूं।

रटौल गांव में आम के बागों में ४८५ तरह की आम की किस्में मिलती हैं। जिनमें दशहरी, लंगड़ा, चौसा, बम्बई, जाफरी, मकसूस आदि सैकड़ों किस्मे है। जिनमें कई तो देस ही नहीं विदेश में भी प्रसिद्ध हैं।

००० बेहट ००० (जि० -सहारनपुर )

सहारनपुर जिले में बेहट क्षेत्र का एक भू-भाग विश्व का सबसे उत्कृष्ट व उन्नतिशील आम उत्पादक क्षेत्र है। यहां की जलवायु आम के उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है। जलवायु के साथ-साथ यहां की मिट्टी भी आम के बागों के लिए सर्वोत्तम है। संसार में यही एक ऐसा क्षेत्र है जहां ४५० से अधिक आम की किस्में पैदा की जाती हैं। यहां पैदा होने वाली प्रमुख किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, मालदा, गुलाब, रटोल, गुलाब जामुन, फजली,सिंदुरिया, रामकेला, राजा, लैला-मजनू आदि किस्में प्रमुख है।

आम की सर्वोत्तम किस्में व आम का मुख्य व्यवसाय का केंद्र होने के कारण बेहट को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर गर्व के साथ दर्शाया जाता है।

अनुकूल जलवायु व आम के उत्पादन के लिए पाई जाने वाली सर्वोत्तम मिट्टी के कारण जहां अन्य क्षेत्रों में आम के बाग लगाने पर सात व आठ वर्ष के बाद आम के पेड़ों पर बहार आती है, लेकिन इस क्षेत्र में चार या पांच वर्ष के बाद ही आम के पेड़ों पर फल लगने शुरू हो जाते हैं।

बेहट में प्रतिवर्ष अरबों रुपए के आम देश के हर कोने में भेजे जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, हरियाणा, चेन्नई,कोलकाता, राजस्थान, गुजरात, पंजाब आदि राज्यों व महानगरों की बड़ी मंडियों में यहां से आम भेजा जाता है। जबकि दिल्ली, मुंबई,कोलकाता तथा सीधे यहां से भी आमों को विदेश भेजा जाता है।

इसके अतिरिक्त बेहट, सहारनपुर, देहरादून, हरिद्वार, मेरठ व मुजफ्फरनगर की मंडियों में भी बड़ी मात्रा में यहां से आम को भेजा जाता है।

रसीले व विभिन्न प्रकार के आमों के लिए प्रसिद बेहट क्षेत्र को सरकार ने फल पट्टी घोषित किया हुआ है।
दुनिया में बेहट की फल पट्टी की अपनी एक खास पहचान है।

आम के साथ साथ अमरूद के लिए भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध है बेहट कस्बा।

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां का आम सबसे बाद में पकता है। जब देश में अन्य स्थानों पर आम का उत्पादन समाप्त होने लगता है उस समय यहां पर आम की फसल पकती है।
दशहरी प्रजाति के आम जून माह के चौथे सप्ताह तक पक कर तैयार होते हैं, जबकि लंगड़ा आम की बहार जून के अंत या जुलाई माह के प्रथम सप्ताह में पकते हैं। जबकि चौसा जाति के आम बागों में बरसात के मौसम में जुलाई माह के अंत में ही रौनक आ पाती है। इस समय तक देश के अन्य क्षेत्रों के अलावा पूर्वी एवं मध्य उत्तर प्रदेश के जिलों में भी सभी प्रकार की किस्मों के आम प्राय समाप्त हो जाते हैं।

सहारनपुर जनपद का तीतरो क्षेत्र भी सर्वोत्तम किस्म के आम व फुलम के लिए जाना जाता है।
तीतरो व इससे लगे ग्रामीण क्षेत्रों में आम की 400 से अधिक किस्में पैदा होती हैं।
यहां की जलवायु के साथ साथ यहां की मिट्टी भी आम व फुलम के उत्पादन में विशेष योगदान देती है।

० ० ० मुजफ्फरनगर ० ० ०

मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों के साथ साथ जनपद में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां आम के बाग दूर-दूर तक फैले हुए हैं। यहां के आम की किस्मों को कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिले हैं।

एक समय जानसठ, पुरकाजी, ककरौली, मीरापुर, कवाल, चित्तौड़ा, मंसूरपुर तथा भोपा आदि इलाके आम के लिए खास तौर पर मुजफ्फरनगर जनपद में जाने जाते थे।

गंगा यमुना के दोआब की उपजाऊ मुजफ्फरनगर जनपद की धरती पर आम के भरपूर बागान होते थे। इनमें से बहुत से बागानों की ख्याति तो दूर-दूर तक थी। राजे- रजवाड़ों के साथ ही आम के लखपेड़ा बाग तो बीते जमाने की बात हो चुके हैं। कभी जानसठ में इतिहास प्रसिद्ध सैयद भाइयों के लखपेड़ा बाग के आमों की मिठास दूर-दूर तक फैली थी।

मुजफ्फरनगर शहर में भी आबादी का बसाव बेहद कम था और कई-कई बीधों में फैली सामंतो व रईस व्यापारियों की कोठियों के चारों ओर घने आम की बगिचियों का चलन हुआ करता था।

मुजफ्फरनगर का पुरकाजी क्षेत्र बागों के लिए विख्यात है। पुरकाजी कस्बे के ही क्षेत्र में हजारों बीघा भूमि पर आम के बाग है। वहीं पुरकाजी के पास के भौजोहडी, लखनौती, भैसानी आदि गांवों में आम के बागों की बहुतायत है। पुरकाजी से गुजरते नेशनल हाईवे 58 के दोनों तरफ दूर तक आम के बाग है।

पुरकाजी क्षेत्र के बागों के आमों की किस्मों ने राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त किए हैं।

पुरकाजी के बड़े बागवान तारीफ मुस्तफा के बाग के आम की एक किस्म ने राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा व वजनी आम 2 किलो 226 ग्राम के आम ने पूरे भारत में पहला पुरस्कार प्राप्त किया था। और सबसे खूबसूरत आम में पुरकाजी के आम ने तीसरा स्थान प्राप्त किया था।

तारीफ मुस्तफा अपने साथ 125 आम की पेटियां लेकर प्रदर्शनी में गए थे। उन 125 पेटियों में 125 तरह की ही किस्मों के आम थे। इसलिए इन्हें 125 तरह के आमों को प्रदर्शित करने पर शिल्ड भी दी गई थी।

जानसठ स्थित मुन्ने मियां के बाग में आम की 500 किस्मे है तथा इन्हीं के बागपत स्थित बाग में 350 तरह की आम की किस्में है।

खतौली और आसपास के गांव अंबरपुर, चंदसीना, फुलत,अंबरपुर,चंदसीना,फुलत,खंजापुर, भंगेला,
सिकंदरपुर, बुआडा, कढली, जसोला क्षेत्रों में तमाम किस्मों के आम की पैदावार होती है।

यहां का आम देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी धूम
मचाता है।

० ० ० शामली ० ० ०

शामली जनपद के कांधला झिंझाना बनत बंती खेड़ा, टिटौली व शामली नगर के आसपास के क्षेत्रों में आम के बड़ी संख्या में बाग है। यहां पर भी आम की अनेक किस्मों का उत्पादन होता है। यहां के बागों के आम दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

झिंझाना कस्बे की शम्स नर्सरी गाजीपुर झिंझाना आम की बेहतरीन किस्मों के लिए प्रसिद्ध है।

कैंडी में राव मुसर्रत बेगम के बाग के आम भी दूर तक प्रसिद्ध है।
बाबरी में कर्मवीर सिंह सैनी के बाग में आम के पेड़ों पर लटक रहे आमों का कोई जवाब नहीं होता है।

गढ़ी पुख़्ता में अमीर आलम के बाग के हुस्नेआरा किस्म के बेहद मीठे खुशबूदार आम जायके में मलिहाबाद के आमों को भी पीछे छोड़ देते हैं। हुस्ने आरा किस्म के आम लंबी शक्ल के होते हैं इन आमों का रस पतला बेहद मीठा व खुशबू लिए हुए होता है।

००० बिजनौर ०० अमरोहा ०० बुलंदशहर ० ० हापुड़ ००

बिजनौर जनपद के सहसपुर, अमरोहा जनपद के हसनपुर, नौगांबा सादात, कांठ व गजरौला क्षेत्र में हजारों हेक्टेयर भूमि पर आमों के बाग लगे हुए हैं।

आम के इन बागों में अनेकों किस्म की आम की प्रजातियां हैं। दशहरी, तोता परी, लंगड़ा, हुसैन आरा, अल्फेजों बंबईया, चितकबरा, गुलाब जामुन, झूम, हाथी, सिंदूरी, आम्रपाली, सुखरू, रटोल, फिरदौसिया आदि आम की प्रमुख किस्में है। इनके अलावा अचार में काम आने वाला आम भी यहां का बहुत प्रसिद्ध है।

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आम उत्पादन के क्षेत्र में स्याना फल पट्टी का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां पैदा होने वाली आम की विभिन्न किस्मों की धूम देश भर की प्रमुख फल मंडियों में रहती है। दिल्ली की आजादपुर फल मंडी पर तो यहां के आमों का आधिपत्य रहता है। इसलिए इस क्षेत्र की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।

स्याना फल पट्टी क्षेत्र में अनेक किस्म के फल पैदा किए जाते हैं। इस फल पट्टी क्षेत्र में स्याना विकासखंड व ऊंचा गांव विकासखंड के लगभग 100 से अधिक गांव की भूमि आती है। यहां पर फलदार पेड़ों को लगाने की शुरुआत सैकड़ों वर्ष पहले मुगल काल में हुई थी।

इसी क्षेत्र में स्थित बुगरासी कस्बे के चारों ओर पठान जाति की बाहुल्यता वाले 12 गांव है। ये सभी बारह बस्ती के नाम से प्रसिद्ध हैं।

स्याना फल पट्टी क्षेत्र में 95 हजार हेक्टेयर भूमि पर फलदार पेड़ों का रोपण किया गया था जो विकासखंड स्याना व ऊंचा गांव की कुल भूमि का लगभग 80 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में सर्वाधिक घने पेड़ निकटवर्ती गांव माकड़ी में है।

इस फल पट्टी क्षेत्र में अरबों रुपए के आम की पैदावार होती है। जो देश की राजधानी दिल्ली की आजादपुर मंडी व देश के अन्य हिस्सों हरियाणा पंजाब मध्य प्रदेश राजस्थान महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश की प्रमुख मंडियों में बिकता है।

यहां उत्पादित आम की प्रमुख प्रजातियां जैसे दशहरी बंबईया तोता परी , तू कमी, सफेदा लंगड़ा चौसा आदि विशेष जायके वाली हैं।

आम तो इस क्षेत्र में होता ही है इसके साथ ही यहां आडू की फसल भी बहुत अच्छी होती है। इसके अलावा यहां लीची कटहल जामुन अमरूद की भी अच्छी फसल होती है।

बुलंदशहर में पैदा होने वाला अचार का आम भी काफी प्रसिद्ध है। यहां के अचार के आम को विशेष पसंद किया जाता है। यहां कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर अचार बनाया जाता है जो देश के कई भागों में सप्लाई नहीं किया जाता है।

००००० मेरठ ०००००

मेरठ जनपद में आमों के लिए विख्यात ग्राम धौलड़ी व
गांव शाहजहांपुर। यहां की हजारों एकड़ भूमि पर बाग ही है। सैकड़ों प्रकार की प्रजाति के आम यहां होते हैं। इनमें से दशहरी चौसा लंगड़ा सफेदा सरोली गुलाब खास फजरी जैसी किस्मों के नाम बाजार में हाथों हाथ बिक जाते हैं।
धौलड़ी के पास ही गांव माजरा भारापुर है यहां भी आम के ही बाग मुख्य रूप से हैं।

धौलड़ी में आम के बाग के अलावा अन्य फलों के भी बाग हैं। लीची आडू लोकाट नाशपाती पुलम के साथ कुछ और फल भी यहां पैदा होते हैं। इससे यहां पूरे वर्ष कोई न कोई फल मिलता रहता है।

मेरठ जनपद में शाहजहांपुर भी फल पट्टी है। यहां पर भी आम के बागों में आम की कई किस्मों का उत्पादन होता है।
शाहजहांपुर आडू और बेर के लिए भी प्रसिद्ध है।
मेरठ बरेली मार्ग पर होने के कारण शाहजहांपुर आम की पौध के लिए भी प्रसिद्ध है।

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अगर आप अप्रैल माह के शुरू में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में यात्रा करें तो आपको खट्टा मीठा बेहतरीन स्वाद वाला फल लोकाट ठेलियो पर बिकता दिखाई देगा। उत्तर प्रदेश के केवल इस पश्चिमी क्षेत्र में ही लोकाट के बाग है। यह बहुत ही नाजुक फल होता है। इसे देर तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है इसलिए इसे दूर के इलाकों में भी नहीं भेजा जा सकता है इस कारण इसके बाग कम ही लगाए जाते हैं। लेकिन इसके स्वाद के कद्रदान अब भी बहुत लोग हैं। बाजार में यह फल कुछ ही दिनों तक दिखाई देता है।

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गर्मी के साथ ही बाजार में फुलम भी ठेलियों और दुकानों पर दिखाई देने लगती है। खट्टे मीठे स्वाद वाला यह फल अपने ठंडे गुणों के कारण गर्मी के मौसम में लाभकारी माना जाता है।
फुलम का फल के बाग उत्तर प्रदेश के केवल सहारनपुर व मुजफ्फरनगर जनपदों में ही है। यहां पर भी इस फल के बाग सहारनपुर जनपद के तीतरों कस्बे के क्षेत्र में है। मिट्टी की संरचना और जलवायु के कारण फुलम के बाग सहारनपुर
जनपद के तीतरों कस्बे वे उसके आसपास के गांवों में ही अधिक संख्या में है।
फुलम के फल ने तीतरों क्षेत्र को एक अलग पहचान दी है। लाल काले बैंगनी रंगो वाला यह खट्टे मीठे स्वाद वाला फल फुलम गर्मियों में करीब करीब पूरे एक माह तक बाजार में दिखाई देता है।
तीतरों क्षेत्र की रसीली फुलम जिसके कारण इस शताब्दी के शुरुआत तक यहां की पहचान विदेशों तक में हुआ करती थी। अब अतीत की यादें भर बनती जा रही है। अब यह फल विलुप्ती के कगार पर है। यहां के लोग इसे अपने रिश्तेदारों के यहां उपहार के तौर पर भी भेजते थे। इस क्षेत्र के प्रमुख स्थानों वह देश की कई फल मंडियों में इस का डंका बजता था।

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०० लीची। ००

फलों की रानी लीची। बाग बगीचों में हरे भरे पेड़ों पर लगी लाल रंग की लीची अपनी मनोहारी छवि एवं मधुरता के लिए लोकप्रिय है। लीची ने जैसा आकर्षक रूप पाया है, वैसे ही अनोखा स्वाद भी। इस की मिठास रसगुल्ले को भी मात देती है।

बच्चे तो बच्चे बड़े बूढ़े भी लीची की मिठास लिए बिना नहीं रह पाते हैं। मई-जून की तेज गर्मी में आम खरबूजा और तरबूज के साथ साथ रसभरी लीची की याद आते ही मुंह में पानी आए बिना नहीं रह सकता।

इन दिनों ठेलों पर बड़े बड़े बच्चों में रखी लाल रंग की लिचियां अपनी महक से बरबस ही आते जाते लोगों को ललचा लेती है।

गंगा यमुना के इस मैदानी भाग में बेहतरीन किस्म की लीची होती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लगे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून बेहतरीन किस्म की लीची के लिए प्रसिद्ध है।
मुजफ्फरनगर व इसके आसपास पैदा होने वाली लीची भी बेहतरीन किस्म की होती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में लीची की व्यवसायिक बागवानी की असीम संभावनाएं हैं

यहां की जलवायु और भूमि की गुणवत्ता लीची की बागवानी के लिए बेहतर है। लीची के बागों के लिए यहां की जलवायु अनुकूल है। इससे यहां बढ़िया किस्म की लीची पैदा होती है। यहां से विदेशों में लीची के निर्यात की संभावनाएं हैं और इस क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

लीची की फसल बेहद नाजुक होती है इसमें बीमारियां भी जल्दी लगती है। पेड़ पर पकी हुई लीची को यदि तोड़ा न जाए तो पेड़ पर टंगे हुए ही दो-तीन दिन बाद खराब हो जाती है।

लीची का सीजन मात्र 20 दिन का होता है। यह जून के पहले सप्ताह से शुरू होकर जून माह के अंत तक समाप्त हो जाता है।

क्षेत्र में लीची की चार किस किस्मे लोकप्रिय हैं।
सबसे रसीली गोला किस्म की लीची सबसे अधिक पसंद की जाती है।
पतली गुठली वाली बिदाना किस्म की मोटे गूदे वाली लीची भी बहुत पसंद की जाती है।
खट्टे मीठे स्वाद वाली सामान्य प्रजाति की लीची की किस्म को सुराही किस्म कहा जाता है।
सामान्य गूदे वाली मध्यम साइज की लीची की किस्म को कलकत्ता किस्म कहा जाता है।

यहां के बाजारों में देहरादून की लीची के साथ साथ लीची भंडूरे वाली की आवाज भी सुनाई देगी।

मुजफ्फरनगर जनपद में ही कई हजार हेक्टेयर भूमि में लीची के बाग है।
मुजफ्फरनगर जनपद की खतौली तहसील क्षेत्र के रायपुर नगली, चलसीना, घासीपुरा, भंगेला, मुबारिक पुर,तिंगाई,ु फुलत व मंसूरपुर आदि एक दर्जन गांवों में लीची के बाग है।

चंदसीना में कुंवर हर्षवर्धन का सैकड़ों बीघा का लीची का बाग है।
घासीपुरा में भी लीची के बड़े बाग है। अन्य गांवों में भी 20 बीघे से लेकर 50 बीघे तक के लीची के बाग है।

यहां के कई बागों की लीची तो विदेशों में भी भेजी जाती है। गन्ने के साथ ही खतौली की लीची सात समुंदर पार विदेशों में भी अपनी मिठास से लोगों को लबरेज करती है।

फुलत के बाग मालिक जईम हसन कादरी, रायपुर नंगली के बाग मालिक गजेंद्र अहलावत व चंदसीना गांव के बागों की लीची दिल्ली की आजादपुर मंडी में सप्लाई की जाती है और वहां से विदेशों में भेजी जाती है।

खतौली क्षेत्र में चार प्रजातियों की लीची का उत्पादन किया जाता है।
जनपद के किसानों को लीची की मिठास भा गई है। किसान इसकी खेती को सुरक्षित मानकर इसका रकबा बढ़ा रहे हैं। पिछले दशकों में लीची के बागों का रकबा बढ़ गया है।

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००० बेर ०००

गंगा यमुना के मैदान में एक और बेमिसाल मौसमी फल होता है। शामली जनपद के जलालाबाद और गांव हसनपुर लुहारी में पैदा होने वाला बेर का फल अपनी मिठास और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है।

बेर देखने में सुंदर और खाने में स्वादिष्ट होता है।

बेर एक मौसमी फल है। बेर की झाड़ियां फरवरी माह के खत्म होते होते बेरों से लग जाती हैं। इस समय लड्डू बेर लुहारी के आवाज सुनाई देने लगती है।
लड्डू के नाम से प्रसिद्ध लुहारी के बेर जिसने भी खाए वह इन बेरो का स्वाद फिर कभी नहीं भूलता। मुगल काल से ही यहां के इन दिनों की मिठास दूर दूर तक फैली है, इसलिए बड़े बड़े शहरों में आज भी बेर लुहारी के बेर के नाम से ही बिकते हैं।
शामली जनपद के जलालाबाद के मीठे लड्डू बेरों का इतिहास काफी पुराना है। मुगल शासन काल के समय जलालाबाद में लुहारी पर अपना शासन स्थापित कर लिया था।
हसनपुर लुहारी पर जीत हासिल करने वाले हसन खा का नाम भी लोहारी से जुड़ गया था। हसन खा तथा उनके वंशजों के दरबार में एक संस्कृति भी पूरे गांव को स्मृत करती रही। बेर के यह बाग इसी संस्कृति के देन थे। यहां के शासकों ने बेरो के बाग लगाने में रुचि ली। बेरो के प्रति नवाबों के इस प्रेम के चलते यहां बेर की फसल का काफी विकास हुआ। यहां के बेर देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचे और अपनी बेहतरीन स्वाद मिठास के बल पर पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए।
जलालाबाद व लुहारी के ये दुर्लभ प्रजाति के बेर लड्डू की मिठास की प्रसिद्धि विदेशों तक में है।
जलालाबाद क्षेत्र के अलावा भारत के किसी भी स्थान पर इस प्रजाति के बेर मौजूद नहीं है। यहां पर भी कई सो वर्ष पुराने यह पेड़ अब काले पड़ चुके हैं।
किसी समय जलालाबाद से यह बेर ट्रेन के द्वारा पाकिस्तान तक जाते थे। इसके अलावा यहां से सैकड़ों लोग विदेश जाते थे अपने साथ यहां के बेर को भी ले जाते थे।

इस बेर की मुख्य पहचान यह है कि यह बीच से फट जाता है ऐसी जमीन पर उगता है जहां पानी की एक भी बूंद नहीं होती है।
पुराने समय में जलालाबाद व लुहारी में बेरों के घने बाग हुआ करते थे लेकिन भारत की स्वतंत्रता के बाद नवाबों का दौर खत्म होने से इनके रखरखाव पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। दूसरी ओर बेर के पेड़ को उगाने के लिए कलम चढ़ाना एक कठिन कार्य होता है और इसके जानने वाले भी धीरे धीरे कम होते गए। इससे यह कला भी धीरे धीरे समाप्त हो रही है। संरक्षण के अभाव में बेरो के पेड़ धीरे-धीरे कट रहे हैं।

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देवबंद मीठे व स्वादिष्ट बेर के लिए भी जाना जाता है। यहां के बेर इतने मीठे होते हैं कि बेरो की मिठास खाने वाले की होठों को भी चिपकाने वाली होती है।
एक समय था जब बसंत के मौसम का आगमन होने के साथ देवबंद के बेर का बाजारों में ढेर लग जाता था। बाजार में बेर क्या मिठाई है, देवबंद की शान बेर की आवाज सुनाई देने लगती थी। यह आवाजें यहां से गुजर रहे हैं सैलानियों को आकर्षित करने के लिए काफी होती थी। यहां से होकर जाते लोग देवबंद के बेर अवश्य खरीद कर ले जाते थे। देवबंद के निवासी भी अपने रिश्तेदारों को देवबंद के मीठे बेर उपहार के रूप में भेजते थे।
देवबंद के बेर की अपनी मिठास मैं स्वाद के कारण दूर-दूर तक पहचान है।
कुछ दशकों पहले तक यहां पर बेरो की बड़े पैमाने पर खेती की जाती थी। यहां के महकदार रसीले व पौष्टिक बेरो की अलग ही पहचान थी।
जमीन की बढ़ती कीमतों के कारण अब बेर की खेती लाभकारी नहीं रही। धीरे धीरे बेरो की झाड़ियां काटकर आवासीय कालोनियों बना दी गई।
सब देवबंद के मीठे बेर तो चखना चाहते हैं लेकिन इनका संरक्षण नहीं करना चाहते, धीरे धीरे देवबंद के मीठे बेर विलुप्त होने लगे हैं। इस समय बहुत कम बेर की झाड़ियां ही यहां बची हैं।

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बागपत जनपद के बिनोली ब्लाक का शेखपुरा गांव भी बेरो के लाजवाब स्वाद के लिए प्रसिद्ध है।
रियासती समय में यहां के नवाबों ने जलालाबाद से पौधे मंगा कर सैकड़ों बीघा जमीन पर बेर के पेड़ लगवाए थे। पुराने समय में यहां पर सिंचाई के साधन नहीं थे जमीन बंजर पड़ी हुई थी नवाबों ने शौकिया तौर पर बेर के बाग लगवाए थे।
शेखपुरा के बेरो के बारे में एक जुमला प्रसिद्ध है जो यहां पर इन बेरो को बेचने वाले लगाते हैं..
शेखपुरे का बेर , बुड्ढा खाकर हो जाए शेर।

कहते हैं कि एक बार शेखपुरा के नवाब ने तोहफे के रूप में हैदराबाद के नवाब को शेखपुरा के बेर भेजें।
हैदराबाद के नवाब उन बेरो को खा कर इसके दीवाने हो गए।
फिर क्या था हैदराबाद के नवाब शेखपुरा के बेरो को ऊंटों पर लदवा कर हैदराबाद मंगवाने लगे।
यहां पर बेर कई किस्में होती हैं। शेखपुरा के बेरो में एक बात खास है, यहां का बेर आकार में लंबा व मोटा होता है। खुशबू ऐसी कि यदि इन बेरो की एक टोकरी घर में रख दो तो पूरा घर जाग जाएगा।
इस क्षेत्र के इलाकों में आज भी ठेलियो पर बेर बेचने वाले आवाज लगाते हैं, शेखपुरा के बेर बुड्ढा खाकर हो जाए शेर।
शेखपुरा के बेरो की दूर दूर के इलाकों में पहचान थी।
इस क्षेत्र में जो कोई भी व्यक्ति अपने सगे संबंधियों से मिलने आता था वह अपने साथ शेखपुरा के बेर ले जाना नहीं भूलता था।

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इन स्थानों के अलावा कैराना के बेर भी प्रसिद्ध थे। किसी समय कैराना के बाजारों में यहां के रंग-बिरंगे बेरो का ढेर लग जाता था। कैराना का नाम ही इन बेरो के कारण
बेरियो वाला कैराना पड़ गया था। दूरदराज के क्षेत्रों में कैराना के बेरो की बहुत मांग थी।

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—-‌। खरबूजा। । —-

इस क्षेत्र का एक और मौसमी फल प्रसिद्ध है और वह है बागपत का बेहद मीठा रसीला खरबूजा। यह अपने खास स्वाद के लिए भी जाना जाता है।
यमुना के किनारे बसे बागपत के खरबूजों की बात ही कुछ और है। बेहद रसीले और मीठे बागपत के खरबूजे यमुना की रेती में उगाए जाते हैं। सूखी गर्म हवा, यमुना की रेतीली जमीन और यमुना का किनारा यह तीनों चीजें बागपत के खरबूजे को विशेष बनाते हैं। जितनी अधिक तेज और गर्म लू चलती हैं उतना ही मीठा खरबूजा होता है। बागपत के खरबूजे आकार में बढ़े और वजन में भारी होते हैं।
अपने अनूठे स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध बागपत के खरबूजे हर किसी को वाह वाह कहने पर मजबूर कर देते हैं।

अच्छे मिठास से भरे खरबूजे के लिए पछुआ हवा का चलना जरूरी होता है। परवा हवा में खरबूजे का स्वाद फीका हो जाता है और इसमें कई बीमारियां भी लग जाती हैं।

मौसम में परिवर्तन, बेमौसम की बारिश और समय पर लूओं के नए चलने के कारण बागपत के खरबूजों की मिठास और स्वाद दोनों पूरी तरह बदल जाते हैं।

लेकिन अब बागपत के प्रसिद्ध खरबूजे बहुत कम दिखाई देते हैं। इनका स्थान अब जौनपुरी खरबूजों के बीजों से बोए जाने वाले खरबूजों ने ले लिया है।

इस क्षेत्र में गंगा व यमुना नदी तो बहती ही है, और भी कई नदियां बहती है। इन नदियों के दूर तक फैले रेतीले किनारों पर खरबूजे की खेती भी बहुत की जाती है।

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०००० तरबूज. ००००

तरबूज के उत्पादन में भी यह क्षेत्र अग्रणी माना जाता है।
गंगा वे यमुना नदी के खादर की रेतीली जमीन में तो तरबूज का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता ही है।
गर्मी के मौसम का तोहफा है तरबूज और यमुना के रेतीले किनारों के तरबूज की तो रंगत ही अलग होती है।

मुजफ्फरनगर जनपद के शाहपुर क्षेत्र के गांव उमरपुर,
शिकारपुर और ढिढावली के तरबूज प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र के गांवों में दूर की रिश्तेदारियों से फोन आने शुरू हो जाते हैं, यहां के रहने वाले अपने रिश्तेदारों में यहां के तरबूज भेजते हैं।
शाहपुर क्षेत्र के हिंडन नदी के किनारे पैदा होने वाला तरबूज भी दूर तक प्रसिद्ध है। किसी जमाने में इस इलाके में गुड से भी मीठे मतीरे (छोटे आकार के तरबूज) पैदा होते थे। मतीरे के नाम से प्रसिद्ध इन तरबूजों में  इतना

मीठा पन होता था कि ये हिंडन के तरबूज के नाम से प्रसिद्ध थे।

 

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यह क्षेत्र फूलों की खेती के लिए प्रसिद्ध है

मुजफ्फरनगर जनपद का खतौली कस्बा कहने को तो एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन अब इस कस्बे की गूंज विदेशों में भी होती है। फूलों की खेती के लिए प्रसिद्ध इस विकास खंड का गंगधाडी गांव देस ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है।

गंगधाडी, लाडपुर, भंगेला, तिगाई,अंतवाडा, शाहपुर,

याहियापुर, लिसोड़ा आदि दर्जनों गांवों में किसान फूलों की खेती कर रहे हैं।

यह क्षेत्र बुके बनाने में प्रयुक्त होने वाले विदेशी नस्ल के फूलों की खेती के लिए प्रसिद्ध है। यहां के किसान विभिन्न प्रकार के फूलों का उत्पादन करते हैं। जिनमें रजनीगंधा, अमेरिकन ब्यूटी, ग्लोड्स, व्‍हाईट और ऑरेंज शामिल है। लेकिन किसानों को सबसे अधिक पसंद ऑरेंज और व्‍हाईट है, जो कम समय में तैयार होकर अधिक लाभ प्रदान करती हैं।

फूलों की खेती से खतौली का नाम रोशन हुआ है। खतौली के आसपास के अनेकों गांव में अब चारों ओर खेतों में फूल ही फूल दिखाई देते हैं।

शादी विवाह व दीपावली के आसपास यहां के फूलों की मांग सबसे अधिक होती है।

चुनाव का मौसम , तीज त्यौहार, पूजा अनुष्ठान या सभा समारोह फूलों की मांग जोरों पर रहती है।

महानगरों में अभिजात्य वर्ग के समारोह में भी यहां के फूलों की मांग रहती है।

स्सी के दशक में गंगधाडी के चौहान परिवार ने 5 बीघा जमीन पर फूलों की खेती शुरू की थी आज सैकड़ों बीघा जमीन पर बुके में प्रयोग होने वाले रजनीगंधा व ग्लाईड – यू ला की खेती कर रहे हैं।

5 बीघा से शुरू हुई फूलों की खेती अब हजारों बीघा  जमीन पर फूलों की खेती की जा रही है। यहां से प्रतिदिन कई गाड़ी फूल दिल्ली की मंडी में भेजे जाते हैं। क्षेत्र के सैकड़ों किसान फूलों की खेती कर रहे हैं।

इस क्षेत्र के किसानों की कड़ी मेहनत व लगन का परिणाम है कि दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर के पास फूलों की मंडी अस्तित्व में आई जहां प्रतिदिन लाखों रुपए के फूलों का कारोबार होता है। इस क्षेत्र के कई फूलों का उत्पादन करने वाले किसान अपनी फूलों की खेती के बल पर ही फूल मंडी के बड़े आढ़ती भी बन गए। इन किसानों की मेहनत और लगन देख कर सरकार ने इन फूलों की खेती करने वाले किसानों को दिल्ली की गाजीपुर में बन रही मंडी में दुकाने अलर्ट कर दी , और इन्होंने उन दुकानों में कारोबार भी शुरू कर दिया। फूलों की खेती में यहां का चौहान परिवार आज भी अग्रणी बना हुआ है और फूलों की खेती में रुचि लेने वाले किसानों की भी यह हर संभव मदद करते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई गांवों से यहां पर उगाए गए सजावटी फूल विदेशों में भी निर्यात हो रहे हैं।

यहां के फूल विदेशों में भी अपनी खुशबू महका रहे हैं। विदेशों में इन फूलों से परफ्यूम भी तैयार कर बाजार में बेचा जाता है।

देश की राजधानी दिल्ली में खतौली क्षेत्र के फूल उत्पादक किसानों का डंका बजता है। यहां से आने वाले फूलों का इंतजार दिल्ली के फूलों के आढ़तियो को रहता है तथा खतौली क्षेत्र के फूल पहुंचने के बाद ही मंडी का रेट खुलता है।

खतौली क्षेत्र में होने वाली फूलों की खेती सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण है और एक सबक है तथा यही कारण है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन होने वाले आईएएस अधिकारियों को भी समय-समय पर इस क्षेत्र के गांव का भ्रमण करा कर उन्हें सहभागिता और परिश्रम के बल पर मिल सकने वाली सफलता कैसे प्राप्त की जा सकती है इसकी सीख दी जाती है। आईएएस अधिकारियों के दल खतौली क्षेत्र के फूल उत्पादन करने वाले किसानों के खेतों का समय-समय पर दौरा भी करते हैं।

शादी विवाह का सीजन व बड़े त्यौहार के अवसर पर यहां के फूलों की भारी मांग रहती है। फूलों की खेती से होने वाली आय का ही परिणाम है कि जिन गांवों में किसान फूलों की खेती कर रहे हैं उन किसानों का जीवन स्तर अन्य किसानों से कहीं बेहतर है।

खतौली क्षेत्र में उत्पादन किए जा रहे फूलों को कई बड़े महानगरों में भी भेजा जाता है । बड़े महानगरों में शादी विवाह समारोह में अधिक इस्तेमाल किया जाता है। शादी समारोह स्थल , दूल्हे के वाहन, दुल्हन व सुहाग सेज यहां के फूलों की चकाचौंध से पटे रहते हैं।

खतौली कस्बे में जानसठ तिराहे पर फूलों की खरीद बिक्री सुबह के समय धड़ल्ले से होती है। खतौली क्षेत्र के गांव से फूलों की कटाई कर प्रातः काल भोर के समय में ही दिल्ली नोएडा गाजियाबाद मेरठ मुजफ्फरनगर सहित कई बड़े नगरों में यह फूल भेजे जाते हैं।

बड़े बड़े महानगरों में यहां के फूल मल्टीनेशनल कंपनियां, 5 तारा होटल तथा शोरूम में भी भेजे जाते हैं।

फूलों की खेती से सैकड़ों लोगों को रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है।

खतौली क्षेत्र में  ग्लाई डोरियस के फूलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। जब इस फूल की फसल पक कर तैयार हो जाती है, इसकी खुदाई का काम जोर शोर से चलता है। फूलों की खेती से गरीब ग्रामीण महिलाओं को भी रोजगार मिल जाता है।

खेतों की देखभाल से लेकर तैयार माल की कटाई व उनके बंडल बनाना। फूलों की फसल पकने पर पके बीजों की खुदाई व छटाई इन सब कामों को महिला श्रमिक की करती हैं। जिन गांवों में फूलों की खेती होती है वहां फूलों के खेतों में काम करने वाली महिला श्रमिकों की बड़ी मांग होती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमि और जलवायु फूलों के उत्पादन के लिए सर्वथा उपयुक्त है।

यहां उत्पादित होने वाले फूल स्थानीय स्तर पर व आसपास के महानगरों में हाथों हाथ बिक जाते हैं।

मुजफ्फरनगर में सबसे पहले फूलों की खेती करने का चलन खतौली क्षेत्र के गांवों से शुरू हुआ था। अब मुजफ्फरनगर जनपद के और कई क्षेत्रों में भी फूलों की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। यहां के किसानों को भी अब फूलों की खुशबू लुभा रही है। चीनी के कटोरे में अब किसान गन्ने की खेती तो करते ही हैं। बहुत से किसान अब फूलों की खेती को भी अपना रहे हैं। फूलों की डिमांड और फूलों की खेती से मिलने वाले मुनासिब धाम के चलते अब किसानों का फूलों की खेती के प्रति रुझान तेजी से बढ़ रहा है। फूलों की खेती से कई गांवों की पहचान बन गई है। गन्ने की फसल से कहीं आदम अधिक फायदा होने से किसानों का रुझान फूलों की खेती के प्रति बढ़ा है। जनपद के किसान सजावटी फूलों के साथ साथ गुलाब और गेंदे फूलों की खेती बड़ी मात्रा में कर रहे हैं।

आजकल मुजफ्फरनगर जनपद के खेतों में गन्ना, गेहूं व अन्य जिंसों की फसलें ही नहीं लहराती है बल्कि यहां देसी विदेशी फूलों की भी बहार रहती है। खेती के इस बदलते रुझान ने कई इलाकों के किसानों की झोली भी फूलों की खेती ने भर डाली है। इतना ही नहीं यहां के मेहनती किसानों ने देसी फूलों की नई नई नस्लें तैयार करके विदेशी फूलों को भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

परंपरागत रूप से होने वाली खेती में यह बदलाव कई सालों पहले ही शुरू हो गया था, अब तो मुजफ्फरनगर जनपद के कई क्षेत्रों, खतौली, मीरापुर, बघरा, सिसौना आदि कई इलाकों यह बदलाव देखा जा सकता है। इन इलाकों के खेत ग्लाईड्यूलस , रजनीगंधा आदि  नहीं कई सजावटी किस्मों के फूलों से चहकते महकते रहते हैं। जनपद के बहुत बड़ी संख्या में किसान अब फूलों की खेती को अपना चुके हैं।

फूलों की खेती जनपद में मात्र किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी क्षेत्रों के हजारों किसान अब फूलों की खेती कर रहे हैं।

गेंदे के फूलों की खेती भी बहुत बड़ी मात्रा में की जा रही है।

 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद मुजफ्फरनगर मेरठ बागपत शामली सहारनपुर आदि जनपदों में फूलों की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ता जा रहा है

इन सभी जनपदों में हजारों किसान अपने खेतों में तरह-तरह के फूलों का उत्पादन कर रहे हैं।

देश की राजधानी दिल्ली के निकट होने के कारण यह क्षेत्र फूलों की खेती का हब बनता जा रहा है।

दिल्ली फूलों की सबसे बड़ी मंडी है। और यह किसान के लिए एक मात्र खेती है जिसमें सभी खरीद और बिक्री नगद की जाती है। एक और बात रजनीगंधा व गुलाब के फूलों से इत्र भी बनाया जा सकता है।

सहारनपुर के देवबंद तथा आसपास के इलाकों में किसान राष्ट्रीय फूल कमल की खेती भी कर रहे हैं। यहां से बड़ी मात्रा में कमल के फूल दिल्ली भेजे जाते हैं जहां वे हाथों हाथ अच्छे दामों पर बिक जाते हैं।

 

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