_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शामली जनपद का ऊन कस्बा तहसील मुख्यालय है। इस कस्बे के इतिहास के अतीत बारे में यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि धन्ना नामक जाट ने गांव ढोडाभाऊ के एक तालाब डाब्बर के किनारे पर गांव बसाया था। बताते हैं कि इस स्थान पर पानी की कमी रहती थी। धन्ना जाट को पालतू पशुओं के द्वारा ज्ञात हुआ कि उत्तर दिशा में एक विशाल तालाब है। जहां पर बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध है। पानी होने की सूचना मिलने पर धन्ना जाट ने उसी तालाब के किनारे बस्ती बसाई और उस तालाब का नाम तीरथ जोहड़ रखा। इससे पहले ही भारत में बाहर से आए हुणों की एक जाति रिंद भी इस स्थान पर बसी हुई थी।

ऊन कस्बे के मुख्य बाजार में स्थित मस्जिद के सामने वाले स्थान पर उस समय एक कुआं था। जिसे रिंद जाति के लोगों द्वारा पानी पीने के लिए बनवाया गया था। उस कुएं पर सभी वर्गों के लोग पानी भरते थे। एक दिन धन्ना जाट की पुत्रवधू कुएं पर पानी भरने के लिए गई तो रिंद जाति वालों में से किसी ने गुलेल से पत्थर मारकर उसके घड़े को तोड़ दिया। इस घटना के बारे में जब उस पुत्रवधू ने घर आकर बताया तो यह स्थान रिन्द जाति बहुल होने के कारण उसके ससुराल वालों ने घटना का प्रतिवाद करने से मना कर दिया। इस पर पीड़ित महिला गांव जुआमाहरा  (वर्तमान समय में हरियाणा राज्य के रोहतक जनपद का एक गांव) के चौधरी की पुत्री होने के कारण अपने मायके चली गई। वहां जा कर उसने अपने साथ घटी घटना को अपने मायके वालों को सुनाया। उसके पिता भाई और अन्य कुटंबियों का सारी घटना को सुनकर खून खौल उठा। चौधरी ने अपने गोत्र के लोगों की बैठक करके पुत्री की ससुराल कूच कर दिया। यहां आने पर उनका रिंदों के साथ भयंकर घमासान हुआ। जिसके कारण रिंद जाति के लोगों को यह स्थान छोड़ कर भागने के लिए विवश होना पड़ा। उन रिंद जाति के वंशज आज भी पास के गांव में रह रहे हैं।
रिंद हूण जाति के होने के कारण इस गांव का नाम हूण पड़ा। जो समय के साथ- साथ बाद मे ऊन कहा जाने लगा। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस स्थान से ऊन का व्यापार बड़ी मात्रा में होता था इस कारण इस स्थान का नाम ऊन पड़ा।

बाद में हरियाणा से आए जाट जाति के लोग यहां बस गए तथा अन्य स्थानों के लोग भी यहां आकर बस्ते रहे।

इस कस्बे में चारों दिशाओं में चार दरवाजे बने हुए थे जिनके आधार पर यहां चार पट्टियां बनाई गई थी। जिनके नाम जयसिंह, लाखिया, बधाला व नोतना है।

ऊन कस्बे की कारीगरी भी एक लंबे अरसे तक ख्याति प्राप्त करती रही। यहां के बने डोल और कढ़ाई बहुत प्रसिद्ध थे। जिनकी मांग आज के समय में धीरे धीरे कम होती जा रही है।

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सिद्ध पीठ बाबा बिशन दास की समाधि

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शामली जनपद के कस्बा ऊन में स्थित चमत्कारी सिद्ध पीठ बाबा बिशनदास का मंदिर इस क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्रसिद्ध है। कई. प्रदेशों के श्रद्धालु यहां आकर बाबा की समाधि पर माथा टेकते हैं। सच्चे मन से जो भी श्रद्धालु यहां आता है। बाबा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इस सिद्ध पीठ पर प्रत्येक मंगलवार को श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ लगती है।

कस्बे के झिंझाना मार्ग पर स्थित यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि काफी समय पूर्व पंडित बिशन सिंह अपने दो भाइयों किशन व हरिचंद के साथ ऊन में रहते थे। बिशन सिंह के मन में अचानक वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे अपनी युवावस्था में ही संसार के मोह माया को त्याग कर सन्यासी हो गए। उन्होंने सभी प्रमुख धार्मिक स्थानों का भ्रमण किया साथ ही मक्का और मदीना की भी यात्रा की। मक्का मदीना की यात्रा से लौट कर वह वापिस ऊन  में ही आ गए। यहां एक वट वृक्ष के नीचे बैठकर उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या में लीन रहकर सिद्धियां प्राप्त की। जिसके बाद उन्हें सब सिद्ध बाबा विशनदास के नाम से जाना जाने लगा I

इस क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति के ऊपर कोई आफत या मुसीबत आन पडती है। तब वह व्यक्ति बाबा बिशन दास का स्मरण करता और उसकी सारी मुसीबतें समाप्त हो जाती। लोगों का यह भी कहना है एक बार बाबा बिशन दास के खेत में दो चोर धान चुराने के लिए गए जब दोनों चोर धान चोरी करके खेत से बाहर जाने लगे तो दोनों चोर अंधे हो गए। वे चोर फिर से खेत में घुस गए और उनकी आंखों की रोशनी वापस आ गई। लेकिन चोरों के मन में फिर से पाप आ गया और वे दोबारा धान को उठाकर चल दिए। खेत से बाहर निकलते ही वे दोनों चोर फिर से अंधे हो गए। बताते हैं कि यह सिलसिला पूरी रात चलता रहा। सुबह होने पर दोनों चोर बाबा बिशन दास के चरणों में लेट गए और उनसे क्षमा मांगी तब जाकर उन्हें मुक्ति मिली।

एक बार एक गरीब किसान अपनी बैलगाड़ी को लेकर कहीं जा रहा था रास्ते में आधी रात के समय उसकी बैलगाड़ी का धुरा टूट गया। तब दुखी किसान ने रात में उसी समय बाबा बिशन दास को याद कर उनका नाम लिया तो बैलगाड़ी अपने आप ही चलने लगी। रात में  उस गरीब किसान के स्वप्न में बाबा बिशन दास जी प्रकट हुए। बाबा का पूरा हाथ खून से लथपथ था। उस किसान ने बाबा के हाथ खून से सने हुए देख कर पूछा तो बाबा ने बताया कि बैलगाड़ी का धुरा टूट जाने पर वह स्वयं अपने हाथ से बैलगाड़ी को लाए हैं। जिससे हाथ जख्मी हो गया।

बाबा बिशन दास की इन दोनों चमत्कारी घटना के बाद बाबा को इस क्षेत्र में पूजा जाने लगा। दूर-दूर से श्रद्धालु आकर बाबा के धुने पर अपने मनोकामनाएं पूरी करने के लिए बाबा से प्रार्थना करते बाबा बिशन दास उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते।

बाबा बिशन दास की आयु जब 100 वर्ष से अधिक हो गई तो उन्होंने स्वयं अपनी इच्छा से समाधि लगा कर अपना शरीर  त्याग दिया। बाद में उसी स्थान पर बाबा की समाधि बना दी गई और उनके वंशजों ने उनकी मूर्ति स्थापित कराई। इस स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। बाबा बिशन दास के बराबर में ही गुरु गोरखनाथ की प्रतिमा को भी स्थापित कराया गया है।

बाबा बिशन दास जी के मंदिर के दर्शन करने के लिए पूरे भारत से श्रद्धालु आते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी होने पर बाबा बिशन दास जी के चरणों में प्रसाद चढ़ाते हैं।  प्रतिवर्ष इनकी पुण्यतिथि पर मेला लगता है इस अवसर पर  विशाल भंडारे में हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं इस मंदिर में दूर दूर से आए साधु महात्मा रहते हैं और बाबा की पूजा करते  हैं।

इस  सिद्ध पीठ पर  महाशिवरात्रि, होली व दिवाली के अवसर पर विशाल भंडारे व मेले का आयोजन होता है। इस दौरान दूर- दूर से आए महात्मा एवं श्रद्धालु समाधि पर माथा टेकते हैं। क्षेत्रवासी अपना कोई भी शुभ काम करने से पहले सिद्ध पीठ बाबा बिशन दास की समाधि पर माथा टेकते हैं। बाबा के आशीर्वाद से सभी श्रद्धालुओं के सभी काम सिद्ध हो जाते हैं।

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ऊन कस्बे में प्रतिवर्ष बारहदरी  मंदिर  में जेष्ठ मास की पूर्णिमा के अवसर पर संत समनदास के सानिध्य में विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। भंडारे से पहले रात्रि में  सत्संग  एवं कीर्तन  आदि  किया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

बताया जाता है कि वर्षा ऋतु के आगमन एवं तपती गर्मी से राहत हेतु वर्षा की कामना के लिए इस भंडारे का आयोजन किया जाता है।

वर्षों से इस भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। संत के हजारों श्रद्धालु इसमें सम्मिलित होकर अपने को धन्य मानते हैं और अपने गुरु के दर्शन करके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

 

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