________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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न्यामू गांव-चरथावल (जनपद मुजफ्फरनगर)

(चरथावल कस्बा जनपद मुख्यालय मुजफ्फरनगर से 25 किमी दूर है। यहां से 7 किमी दूर न्यामू गांव है।)

न्यामू गांव गुप्तकालीन भगवान विष्णु के वराहावतार की दुर्लभ प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है।

न्यामू गांव हिंडन नदी की ढांग पर बसा हुआ है। हिंडन नदी एक पौराणिक नदी है। इस क्षेत्र में हिंडन नदी के किनारे कई ऐसे ऊंचे टीले हैं। जहां हजारों वर्ष पहले एक विकसित सभ्यता निवास करती थी।

कहते हैं इस गांव का अस्तित्व मुजफ्फरनगर के बसने से भी पुराना है। महाभारतकालीन क्षेत्र में बसा यह गांव अपने अंदर प्राचीनता के कई अनसुलझे रहस्य समेटे हुए हैं।

पुराने समय से न्यामू गांव के बड़े बुजुर्गों द्वारा इस गांव के बारे में कही गई एक कहावत या किवदंती चली आ रही है – ‘न्यामनगर और सिकंदराबाद, जिनका मोहल्ला जलालाबाद’जो काफी प्रचलित है। किवदंती है कि महाभारत काल में इस स्थान को खंभापुर के नाम से जाना जाता था।

पुराने समय में यह गांव व्यापारिक एवं सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। यहां वाममार्गी राजा संसार चंद का राज्य था। उस समय राजाओं का शासकीय कामकाज यहीं से चलता था। लेकिन प्रकृति की किसी अनहोनी के कारण यह पूरा क्षेत्र तबाह हो गया। जिसके कारण यह पूरा शहर जमींदोज हो गया। आज के समय में इसे खेड़ा पलटना कहा जाता है।

इस स्थान के उजड़ जाने के बहुत समय बाद नियमत ने इसे पुणः आबाद किया। उसके नाम पर ही इसका नाम नियामतगढ़ पड़ा जो बाद में बदल कर न्यामू हो गया।

चरथावल क्षेत्र का न्यामू गांव अपने आप में ऐतिहासिक है। यह गांव पुरातत्व खजानों से भरा पड़ा है।आज के समय में भी किसानों के खेतों में प्राचीन समय की बस्ती के घरों की नींव निकलती रहती है। पुराने समय के बर्तन और सिक्के भी यहां पर मिलते रहते हैं। एक किसान के खेत से शिव पार्वती की मूर्ति भी यहां निकली थी। खास बात यह है कि इस गांव में जब भी कोई व्यक्ति मकान बनवाता है। उसकी नींव की खुदाई करते समय पुराने मिट्टी के बर्तन निकलते हैं। न्यामू गांव की धरती के नीचे अभी भी न जाने कितने पुरातात्विक अवशेष छिपे पड़े हैं।न्यामू गांव के पास के ही इलाके छिमाऊं,बुढ्ढा खेड़ा व अकबरगढ़ से सटे इलाकों में पुराने समय के कुएं भी मिलते हैं।

गुप्तकालीन वराहावतार मूर्ति –

न्यामू गांव के ही मुस्लिम परिवार के व्यक्ति अलीमा को अपने खेत की खुदाई करते समय फावडे के किसी पत्थर से टकराने की आवाज सुनाई दी। जब उसने वहां और अधिक गहराई तक खुदाई की तो वहां उसे कुछ मूर्तियां मिली।

बड़ी सफाई से दो हिस्सों में बनी 33 करोड़ देवताओं की छाया सहित प्रस्तर की इस अद्भुत प्रतिमा को देखकर गांव के लोग अचंभित रह गए।

उस समय के गांव के मुखिया वेद बाबू के प्रयास से न्यामू गांव के मंदिर में भगवान विष्णु के वराहावतार व अन्य प्रतिमाओं को स्थापित करा दिया गया था।

बाद में पता चला भगवान विष्णु के वराह अवतार की यह प्रतिमा गुप्त काल की है और बहुत ही दुर्लभ है। इस तरह की मूर्ति और किसी भी अन्य स्थान पर देखने को नहीं मिलती।

पुरातत्व विभाग के दल ने भी इस इलाके का दौरा करके इसे ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया था। पुरातत्व विभाग के दल ने तब इस प्रतिमा को अपने साथ ले जाने का भी प्रयास किया था। किंतु गांव वालों के विरोध के कारण वह अपने साथ इस प्रतिमा को नहीं ले जा सके थे।

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतार हैं। आदिकाल में दैत्यराज हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष दैत्य का वध करने के लिए एवं पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था।

आसमानी रंग के पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बनाई गई इस प्रतिमा का सौंदर्य देखते ही बनता है। इस प्रतिमा को बनाने वाले कलाकार के कौशल को आज भी इस प्रतिमा में देखा जा सकता है। प्रतिमा के नाखून हों या मनके उसने बड़ी कुशलता से इस प्रतिमा में तराशा है।

वराहावतार प्रतिमा में भगवान विष्णु के चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा व पद्म विद्यमान हैं। अपने आप में एक मंदिर का रूप लिए इस प्रतिमा में शिव परिवार व गणेश जी की प्रतिमा को भी उकेरा गया है।

प्रतिमा के शीर्ष पर ३३ करोड़ देवी देवताओं के साथ राम-बलराम की प्रतिमाएं भी उकेरी गई हैं। भगवान विष्णु वराह रूप में शेषनाग से पूरी तरह लिपटे हुए हैं। उनके बाएं हाथ की कोहनी पर धरती माता को शेषनाग की सवारी पर दिखाया गया है।

वराहावतार वाली इस प्रतिमा में भगवान विष्णु के दस अवतारों की प्रतिमाएं भी इसमें उकेरी गई हैं।

5 फीट ऊंची इस प्रतिमा के पीछे वि. क्र. लिखा है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह विक्रमादित्य या वीर कर्म का संकेत है।

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