__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत
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नीलेश्वर महादेव मंदिर – हरिद्वार

हरिद्वार में चंडी घाट पुल से लगभग एक-डेढ़ कि.मी.की दूरी पर हरिद्वार से नजीबाबाद मार्ग पर नीलेश्वर महादेव का यह पौराणिक मंदिर नील पर्वत पर कम ऊंचाई पर स्थित है।

हरिद्वार में चंडी देवी जाने के लिए रोपवे स्थल के पास ही गौरी शंकर मंदिर के बराबर से ऊपर पहाड़ी पर जाने का रास्ता है।

हरिद्वार सनातन हिंदू धर्म का महान तीर्थ होने के साथ-साथ ऋषि-मुनियों तथा सिद्ध साधकों की तपस्थली भी है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार यह भगवान शिव के विवाह, उनकी अर्धांगिनी देवी सती के द्वारा स्वयं को भस्म करने तथा पार्वती द्वारा तप करके शिव को प्राप्त करने की अनेक घटनाएं इसी परम पवित्र तीर्थ नगरी हरिद्वार में घटित हुई हैं।

हरिद्वार में कई प्राचीन एवं पौराणिक शिव मंदिर है। लेकिन नील पर्वत पर स्थित भगवान शंकर का नीलेश्वर महादेव मंदिर अत्यधिक प्राचीन तथा पौराणिक मंदिर है। इस पौराणिक मंदिर का उल्लेख शिव पुराण में मिलता है।

शिव पुराण के अनुसार भगवान शंकर का विवाह दक्ष पुत्री सती के साथ कनखल में संपन्न हुआ था। भगवान शंकर देवी सती के साथ कैलाश पर्वत पर रहते थे।

पुराणों के अनुसार प्रयाग में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया था। निमंत्रण मिलने पर भगवान शिव भी उस विशाल यज्ञ में पधारे। सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि भी यज्ञ में आए हुए थे। उस यज्ञ में भाग लेने के लिए जब महाराजा दक्ष यज्ञ भूमि में पधारे तो सभी देवताओं और ऋषि-मुनियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, लेकिन शिव अपने आसन पर ही बैठे रहे। यह देख कर महाराजा दक्ष अत्यंत क्रोधित हुए और वह शिव के प्रति मन ही मन सोचने लगे कि शिव ने उनका अपमान किया है।

महाराजा दक्ष ने शिव को नीचा दिखाने के लिए अपनी नगरी कनखल में एक अभूतपूर्व महायज्ञ का आयोजन किया। जिसमें भाग लेने के लिए ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु सहित तीनों लोकों के सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों सहित सभी प्रमुख शक्तियों को आमंत्रित किया गया लेकिन अपनी पुत्री देवी सती तथा दामाद शिव को ईर्ष्यावश दक्ष ने आमंत्रित नहीं किया।

जब सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि आदि दक्ष के यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आकाश मार्ग से जा रहे थे तब देवी सती ने अपनी प्रिय सखी से कहा कि मालूम करो की यह सब कहां जा रहे हैं। सखी ने देवी सती को बताया की महाराजा दक्ष के यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन हो रहा है और यह सब उसमें सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं। यह सुनकर देवी सती को घोर आश्चर्य हुआ। वह मन ही मन सोचने लगी कि मेरे पिता दक्ष और माता वरिणी मुझे और मेरे स्वामी भगवान शिव को बुलाना कैसे भूल गए।

देवी सती भगवान शिव के पास पहुंची और उन्हें अपने पिता दक्ष के यहां हो रहे विशाल यज्ञ और यज्ञ में सम्मिलित होने जा रहे सभी देवी-देवता, विद्याधर, ऋषि-मुनियों के विषय में बताया। देवी सती ने भगवान शिव से भी उन्हें दक्ष के यज्ञ में ले चलने के लिए कहा।

भगवान शिव ने देवी सती को बड़े प्यार से समझाया की ‘प्रिये हम वहां नहीं जा सकते। महाराजा दक्ष ने उन्हें यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित नहीं किया है।’देवी सती के बहुत हट करने पर भगवान शिव ने उन्हें बड़े सम्मान और अपने गण नंदी एवं अन्य अनुचरों के साथ महाराजा दक्ष के यज्ञ में भेज दिया।

देवी सती के कनखल अपने पिता के घर पहुंचने पर वहां किसी ने भी उनके प्रति किसी भी प्रकार के प्रेम या आदर का भाव प्रकट नहीं किया, वहां केवल उनकी माता ने ही अपनी पुत्री सती से उनकी कुशलक्षेम पूछी।

यज्ञ मंडप में सभी देवों एवं ऋषि-मुनियों के साथ अपने पति भगवान शिव का स्थान न देखकर देवी सती भगवान शिव का अपमान नहीं सह सकी और उन्होंने अपनी योगशक्ति से स्वयं को भस्म कर डाला।

देवी सती के योगाग्नि के द्वारा स्वयं को भस्म करने का समाचार सुनकर सती के साथ आए शिवगणों ने यज्ञशाला के भीतर आकर उसे नष्ट करना शुरू कर दिया।

भगवान शिव को जब यह समाचार मिला तब वह क्रोधित हो उठे और उन्होंने महाशक्तिशाली वीरभद्र को प्रकट करके अपने गणों की विशाल सेना के साथ दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करने के लिए भेजा।

महाशक्तिशाली वीरभद्र ने देवताओं को पराजित कर दक्ष प्रजापति का शीश काटकर हवन कुंड में जला डाला और सारा यज्ञ तहस-नहस कर दिया।

जिस समय भगवान शिव के गण वीरभद्र कनखल में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर रहे थे, उस सारे दृश्य को भगवान शिव ने गंगा के दूसरे किनारे पर बैठकर स्वयं अपनी आंखों से देखा था।

पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने दक्षयज्ञ के विध्वंस को जिस स्थान पर बैठकर देखा था उसी स्थान पर नीलेश्वर महादेव का मंदिर बना हुआ है।

यह नीलेश्वर महादेव का मंदिर सघन वन में स्थित है और शक्तिशाली सिद्ध पीठ है। इस स्थान पर सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने वाले श्रद्धालुओं को कभी भी निराश नहीं होना पड़ता।

पौराणिक नीलेश्वर महादेव मंदिर में स्थित शिवलिंग अद्भुत और प्राकृतिक है। इस नीलेश्वर महादेव मंदिर के जैसा विशाल और प्राकृतिक शिवलिंग अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।

घनघोर वन में स्थित होने के कारण यहां श्रद्धालुओं को आराधना करने पर परम शांति का अनुभव होता है।

हरिद्वार में पतित पावन गंगा जी की नीलधारा के उस पार नील पर्वत पर कम ऊंचाई पर स्थित नीलेश्वर महादेव के विख्यात पौराणिक मंदिर में केवल प्राकृतिक और विशाल अकेला शिवलिंग स्थित है। यहां इस मंदिर में पार्वती, नंदीगण इत्यादि की अन्य शिव मंदिरों की तरह कोई अन्य प्रतिमा नहीं है। क्योंकि दक्षयज्ञ के विध्वंस को यहां उन्होंने अकेले ही बैठकर देखा था। आज भी नीलेश्वर महादेव मंदिर से देखा जाए तो सामने ही दक्ष महादेव का मंदिर अर्थात प्रजापति दक्ष का यज्ञ स्थान एवं पंच पुरी दिखाई पड़ती है।

श्रावण मास में यहां शिव भक्तों का तांता लगा रहता है।

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