_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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नीलकंठ महादेव मंदिर – ऋषिकेश

भयानक कालकूट विष पीकर व्याकुल भगवान शिव की जलन जहा शांत हुई वह स्थान नीलकंठ कहलाया

ऋषिकेश की पर्वत मालाओं में बसा श्री नीलकंठ महादेव मंदिर एक पौराणिक स्थान है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार समुंद्र मंथन से उत्पन्न विष को भगवान महादेव शंकर ने अपने कंठ में ही धारण कर लिया था। भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाने लगा। भगवान शिव के गले में धारण किए हुए विष की उष्णता इसी स्थान पर शांत हुई थी। इसी से यह स्थान नीलकंठ महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।

मणिकूट पर्वत की पर्वतमाला के बीच नीलकंठ महादेव का पावन स्थान है।

कुछ दशक पहले तक नीलकंठ महादेव के दर्शन करने के लिए स्वर्गआश्रम से केवल पैदल यात्रा करके ही जाया जा सकता था। स्वर्ग आश्रम से नीलकंठ तक का यह रास्ता कठिन एवं दुर्गम था।

बाद में नीलकंठ मंदिर तक पक्की सड़क बन गई रामझूला और लक्ष्मणझूला से नीलकंठ तक जाने के लिए आसानी से प्राइवेट टैक्सी वाहन उपलब्ध हैं।

ऋषिकेश से नीलकंठ का रास्ता बहुत सुंदर पहाड़ियों और वनों के बीच से है। रास्ते के एक और ऊंचे पहाड़ तो दूसरी ओर कल-कल कर बहती पावन गंगा का सुंदर दृश्य।

बहुत से श्रद्धालु भक्त और ट्रैकिंग के शौकीन पर्यटक नीलकंठ की यात्रा पैदल ही करते हैं।

नीलकंठ महादेव प्रमुख पर्यटन स्थल है। एकांत और जंगलों के बीचोंबीच स्थित शिव भक्तों को यह स्थान अति प्रिय है। श्रावण मास में नीलकंठ महादेव में जलाभिषेक करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। सोमवार महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालुओं की संख्या क‌ई लाख तक में पहुंच जाती है।

नीलकंठ महादेव मंदिर बड़ा ही मनोरम मंदिर है। इस मंदिर की नक्काशी की सुंदरता देखते ही बनती है। अत्यंत मनोहारी मंदिर के शिखर के तल पर सुंदर समुद्र मंथन के दृश्य को चित्रित किया गया है। मंदिर के गर्भ गृह के द्वार पर एक विशाल चित्र में भगवान शिव को विष को पीते हुए दिखाया गया है।

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