________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सबडी (सबली) गांव –

यह गांव औद्योगिक नगरी हापुड़ से लगभग 2-3 किमी दूर गढ़ – दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। इस गांव में शंकर भगवान का प्राचीन मंदिर है। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने गढ़मुक्तेश्वर तीर्थ की यात्रा करते समय यहां विश्राम किया था। यहां के प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना उन्हें के द्वारा की गई थी। कालांतर में यह शिवलिंग भूमिगत हो गया था। बाद में लगभग 300 वर्ष पूर्व एक किसान को अपने खेत में हल चलाते समय यह शिवलिंग दृष्टिगोचर हुआ। बाद में यहां शिव मंदिर का निर्माण किया गया।

हापुड़ नगर के अनेकों श्रद्धालु भक्त नित्य प्रति यहां दर्शनार्थ आते हैं। श्रावण मास में तो प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।

श्रावण मास के सोमवार के दिन हापुड़ नगर से भोर होते ही हजारों श्रद्धालु महिलाएं एवं पुरुष हाथों में जल लिए,नंगे पैर ही चल कर यहां जलाभिषेक एवं पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर धर्म प्रेमियों का यहां मेला सा लग जाता है। अनेकों श्रद्धालु कावड़ में पवित्र गंगाजल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। कावड़ियों के फलाहार एवं सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं। समाजसेवी कावड़ लाने वालों के लिए शिविर लगाते हैं।

चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन यहां स्नान कर शिवलिंग का जलाभिषेक करना अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है।

मंदिर के निकट मनोवांछित वटवृक्ष है। मान्यता है कि श्रद्धा भक्ति के भाव से नियम पूर्वक यहां 40 दिन तक वट वृक्ष पर जल चढ़ाने से लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

श्रद्धालु मनोकामनाएं पूर्ण होने पर इस स्थान पर भंडारे का आयोजन करते हैं।

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हापुड़ नगर के पास लालपुर गांव में देश-विदेश में ख्याति प्राप्त उदासीन नया अखाड़ा से संबद्ध खिचड़ी वाले बाबा का आश्रम है।

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हापुड़ के ही थाना लालगढ़ से 7 किलोमीटर दूर नूरपुर गांव है।

नूरपुर गांव में ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री एवं किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह जी का जन्म हुआ था।

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असौढा गांव –

असौदा का खंडहर महल स्वाधीनता के संघर्ष का ऐतिहासिक गवाह है।

स्व. चौधरी रघुवीर नारायण सिंह के महल में गांधी जी और नेहरू ने आजादी की रणनीति तैयार की थी।
गांधी जी के आदेश पर रघुवीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों का खिताब वापस कर दिया था।

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