_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे व उसके ही निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के जौनसार बावर क्षेत्र में स्थित चकराता नगर के इलाके में प्राकृतिक रूप से बनी दुर्लभतम गुफ़ाएं स्थित हैं। इन गुफाओं में हजारों लाखों वर्ष प्राचीन शिवलिंग बने हैं। शिवलिंग पर २४ घंटे प्राकृतिक रूप से जल की बूंदे टपकती रहती हैं।

उत्तराखंड में देहरादून के चकराता के अलावा नैनीताल के चौखुटिया, पिथौरागढ़ के चांडक आदि कई क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से बनी हुई दुर्लभ गुफाएं मिलती है।

इन प्राकृतिक गुफाओं में शिवलिंग तथा तरह-तरह की आकृतियां प्राकृतिक रूप से बनी हुई होती हैं। अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित गुफा में पाए जाने वाले प्राचीन शिवलिंग चूने के पत्थर पर गिरने वाले कैल्शियम कार्बोनेट के साथ पानी की बूंदों से बना होता है।

इन शिवलिंगों के बनने की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है।जिस क्षेत्र में चूने के पत्थर अधिक संख्या में होते हैं उन स्थानों पर ही इस प्रकार की गुफाएं पाई जाती हैं। मानसून के समय कैल्शियम कार्बोनेट के साथ पानी की बूंदे पहाड़ की दरारों से रिस कर इन गुफाओं में गिरती हैं तब ठोस पत्थर के रूप में शिवलिंग जैसी आकृति तथा और भी विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण होता है।

स्वमेव बनने वाले इन शिवलिंगों के निर्माण की प्रक्रिया बेहद धीमी होती है,बल्कि पचास सें‌.मी‌. के लिंग के निर्माण में कम से कम पच्चीस हजार वर्ष का समय लगता है। मानसून के समय गुफा की छत से जब पानी गिरता है तो उसी के माध्यम से वह शिवलिंग विकसित होता है।

देहरादून के चकराता तहसील क्षेत्र के खारसी गांव में सड़क निर्माण के लिए कटिंग का कार्य करने के दौरान अचानक एक गुफा मिली। इस गुफा में प्राकृतिक रूप से बना हुआ एक शिवलिंग है। शिवलिंग पर २४ घंटे जल की बूंदें टपकती रहती हैं।

इस प्राकृतिक गुफा में शिवलिंग के निकट ही एक अन्य आकृति उकरी हुई है। शिवलिंग के ऊपर निरंतर पानी गिरने से चट्टान पर फूलनुमा आकृति भी उभरी हुई है। स्थानीय लोग यहां पर पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं।

इन दुर्लभतम गुफाओं में प्राकृतिक रूप से बने शिवलिंग को खोज कर उन के माध्यम से कम से कम बीस हजार वर्ष की जलवायु का पता लगाने का एक नायाब वैज्ञानिक अध्ययन कुमायूं विश्वविद्यालय के भूगर्भ विभाग के द्वारा शुरू किया गया है। इस अध्ययन के अंतर्गत कैल्शियम कार्बोनेट से बनी शिवलिंगों की उम्र का पता लगाया जाएगा और फिर उस समय की जलवायु का आकलन भी वैज्ञानिक तरीके से किया जाएगा।

इन गुफाओं में हजारों वर्ष के दौरान पानी की बूंदों की जो परत बनती है उसी को अलग कर उसका अध्ययन किया जाता है। यूरेनियम थोरियम तकनीक से मशीन के द्वारा इन परतों के निर्माण की तारीख का पता लगाया जाता है।

मानसून दौरान गुफा की छत से जो पानी गिरता है उस पानी में मिले कैल्शियम कार्बोनेट से शिवलिंग विकसित होता है। पानी के साथ आने वाले कैल्शियम कार्बोनेट की मात्रा से ही यह पता चलता है कि उस वर्ष उस स्थान पर मानसून की कैसी स्थिति रही होगी। अध्ययन में मालूम होता है की अगर पानी के साथ अधिक मात्रा में कैल्शियम कार्बोनेट आता है तो उस वर्ष उतना ही अच्छा मानसून रहा होगा। हर वर्ष बनने वाली परत का समय पता चल जाने के बाद यह अनुमान आसानी से लग जाएगा कि उस वर्ष मानसून की स्थिति क्या रही होगी।

अध्ययन में धार्मिक आस्था से जुड़े शिवलिंगों को शामिल नहीं किया जाता बल्कि इसके लिए अत्यधिक ऊंचाई पर दुर्गम तथा निर्जन स्थानों पर स्थित गुफाओं के लिंगनुमा पत्थर की डेटिंग के लिए 15 हजार नमूने तैयार किए जाते हैं और फिर यंत्रों के माध्यम से उसकी तारीख का पता लगाया जाता है।

इस अध्ययन का उद्देश्य यह है कि पिछले कई हजार वर्ष की जलवायु के रुख का पता लगा कर भविष्य में किस तरह की जलवायु हो सकती है इसके विषय में लोगों को जानकारी दी जाए।

इस अध्ययन से मिलने वाले संकेतों से बादल फटने, भूस्खलन होने तथा जलवायु परिवर्तन के बारे में लोगों को होने वाले खतरों से आगाह भी किया जा सकता है।

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