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सुविख्यात ‘निजानन तीर्थ आश्रम’ – शेरपुर (जड़ौदा पांडा)
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(यह स्थान सहारनपुर- दिल्ली मुख्य मार्ग पर कस्बा ननौता से 25 कि.मी. पूर्व की ओर शेरपुर (जड़ौदा पांडा) प्रसिद्ध प्राचीन तीर्थ ‘पांडव ताल’ के किनारे स्थित है। यह स्थान देवबंद, मुजफ्फरनगर तथा बड़गांव से भी सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है)

प्रणामी संप्रदाय के प्रवर्तक परमहंस राम रतन दास जी की पवित्र कर्म भूमि निजानंद आश्रम एक तीर्थ स्थल बन गया है। इस गंगा रूपी तीर्थ पर पूरे वर्ष श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। हर वर्ष यहां एक बार विशाल मेले एवं संत समागम का आयोजन किया जाता है।

निजानंद आश्रम के संस्थापक परमहंस राम रतन दास जी का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस कारण उनकी शिक्षा दीक्षा अधिक नहीं हो सकी। लेकिन उन्हें बचपन से ही ईश्वर में श्रद्धा एवं आत्मा और परमात्मा की खोज करने का वैराग्य हो गया था। वे दिन रात भक्ति भाव से परमात्मा के चिंतन में लीन रहने लगे। उन्हें बचपन में ही विवाह के बंधन में बांध दिए जाने के बाद भी उन्होंने ईश्वर की खोज जारी रखी

संत राम रतन दास जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और वनों और पर्वतों में तपस्या की। इसी बीच उनकी भेंट सोनागिरी में संत राज नारायण दास जी से हुई जिनसे उन्होंने संत की दीक्षा ली। प्रणामी संप्रदाय के प्रमुख श्रद्धा स्थलों एवं संतो के साथ सत्संग करके उन्होंने परमात्मा प्राप्ति एवं दिव्य ज्ञान प्राप्त किया। परमहंस राम रतन दास जी ने अपनी जन्मस्थली को ही अपनी कर्मभूमि माना। अपने गुरु की प्रेरणा से उन्होंने भगवान श्री कृष्ण एवं राधा जी का भक्ति भाव जन जन तक फैलाया और भगवान श्री कृष्ण के कई बार दर्शन किए। अनेक कष्ट उठाकर भी राम रतन दास जी धर्म प्रचार में लगे रहे। इनकी प्रेरणा से लाखों भक्त जनों ने श्री कृष्ण प्रणामी मत को स्वीकार किया।

भगवान कृष्ण प्रणामी संप्रदाय के संत श्री कृष्ण की लीला एवं उनके उपदेश जनसाधारण तक पहुंचाते हैं और धार्मिक कार्यक्रम में श्री कृष्ण की ‘बांसुरी’ तथा श्री राधा जी के ‘मुकुट’ के चिन्हों की पूजा अर्चना होती है।

संत राम रतन दास जी ने शेरपुर में विशाल निजानंद आश्रम की स्थापना की जो इस समय भव्य रूप ले चुका है।आश्रम में हर वर्ष वैशाख शुल्क सप्तमी, अष्टमी और नवमी को यहां विशाल मेला एवं प्रमुख ध्वज गांव वालों की ओर से विशेष रूप से लगाया जाता है।

यहां शेरपुर में संत राम रतन दास जी की समाधि बनी हुई है। श्रद्धालु भक्त सबसे पहले उन्हें ही प्रणाम करके मनोकामनाएं मांगते हैं। सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना संत जी शीघ्र ही पूरा करते हैं। समाधि के निकट ही उनका पवित्र निशान ‘पंजे’ का विशाल ध्वज है। जो मेले के दिन ही चढ़ाया जाता है। इसके पास तारतम्य भवन है, जहां भक्तों को ‘मंत्र’ दिया जाता है। आश्रम में विशाल और भव्य श्री राधा कृष्ण का मंदिर बना हुआ है। जहां दिन रात श्रद्धालु भक्त भजन कीर्तन करते रहते हैं।

वैशाख शुल्क सप्तमी, अष्टमी और नवमी को लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्तजन अपने-अपने वाहनों से यहां आते हैं। इस अवसर पर संत जी की सवारी व ध्वज धूमधाम से एवं धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ निकाली जाती है। उसके बाद प्रसाद का वितरण होता है। इस अवसर पर यहां विशाल भंडारे का भी आयोजन किया जाता है।

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जड़ौदा पांडा गांव-
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बाबा नारायण दास जूड़ मंदिर-

इस मंदिर का वार्षिक उत्सव प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के अंतिम रविवार के दिन मनाया जाता है। विभिन्न प्रदेशों हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश के कई जनपदों से सुबह भोर होने से पहले ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु बाबा की समाधि पर पहुंचकर श्रद्धा सुमन अर्पित कर प्रसाद चढ़ाकर माथा टेकते हैं और मनोकामनाएं मांगते हैं।

मंदिर की मान्यता के बारे में बताया जाता है कि लगभग 800 वर्ष और बाबा नारायण दास का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था मैं अपने भाइयों में सबसे छोटे थे और बचपन से ही उनका मन प्रभु के प्रति आस्थावान था उनका मन कृषि कार्यों में नहीं लगने के कारण उनके अन्य भाइयों ने उन्हें गांव से खेत पर खाना पानी आदि लैला ने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी एक दिन उनके भाइयों ने उन्हें गांव से पानी भरकर लाने के लिए मिट्टी का करवा दिया जिस समय वह गांव से पानी लेकर जंगल की ओर लौट रहे थे उस समय उनके भाइयों की नजर उनके ऊपर पड़ी उन्होंने उनका विशाल रूप देखा मिट्टी का करवा भी उनके सिर पर काफी ऊंचाई पर रखा हुआ था उनका यह रूप देखकर उनके सारे भाई हतप्रभ रह गए जिस समय बाबा नारायण दास को उनका विशाल रूप अपने भाइयों के द्वारा देखे जाने का आभास हुआ तो उन्होंने अपने अति प्रिय घोड़े वह कुत्ते के साथ वही जंगल में ही जीवित समाधि ले ली थी उसके बाद से ही उनकी समाधि पर प्रति वर्ष किसी उत्सव की तरह प्रसाद एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है।

बाबा नारायण दास जुड़ मंदिर लगभग 80 बीघा घने वन के बीच स्थित है। यहां बाबा नारायण दास भव्यता के साथ समाधिस्थ हैं। समाधि के चारों ओर अनेक प्रजाति के फल, फूल, बेल और लताओं के अलावा कीमती वृक्ष इस मंदिर की सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाबा नारायण दास की समाधि के अलावा यहां प्राचीन शिव मंदिर, कुआं, तालाब, मां दुर्गा का मंदिर, हनुमान जी का मंदिर और विशाल हवन कुंड बना हुआ है। इस हवन कुंड में श्रद्धालु गण नित्य हवन यज्ञ करके भजन कीर्तन करते हैं। मंदिर के पुजारी सेवादारों सहित बहुत से संत महात्मा मंदिर प्रांगण में सेवा करते हैं।

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मौरा गांव – बड़गांव ( जनपद सहारनपुर)

अपना अपने परिवार के सदस्यों का और अपने महापुरुषों का जन्मदिन तो हर कोई मनाता है। लेकिन सहारनपुर जनपद के बड़गांव के पास मौरा गांव के लोग प्रतिवर्ष अपने गांव का जन्मदिन मनाते है। इस दिन गांव वाले अपने गांव के बड़े बुजुर्गों को सम्मानित करते हैं।

इस दिन गांव के लोग अपने गांव के ही ओमकारेश्वर मंदिर में हवन यज्ञ करते हैं। उस वर्ष गांव को स्थापित हुए जितने वर्ष हो गए उतने दीपक जलाकर और प्रसाद बांट कर भगवान शिव से गांव की सुख समृद्धि की कामना करते हैं। इस गांव के रहने वाले इस दिन किसी नए अच्छे कार्य को करने का भी संकल्प लेते हैं। सन 2019 में मौरा गांव ने अपना 675 जन्मदिन मनाया।

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नानौता
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मंदिरों और मजारों का कस्बा नानौता की ऐतिहासिकता पर शायद ही कोई आसानी से यकीन करें लेकिन सहारनपुर जनपद का नानौता कस्बा अपने आप में एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक संस्कृति को समेटे हुए हैं। इसे एक पौराणिक कस्बा स्वीकार किया जाता है और इसकी पौराणिकता का काफी महत्व भी बताया जाता है। नानौता कस्बे को धार्मिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कस्बों की श्रेणी में भी गिना जाता है। नानौता कस्बे को लगभग 500 वर्ष पहले नानू नामक एक हिंदू गुर्जर ने बसाया था।

नानौता ही नहीं उसके आसपास की 10 – 12 किलोमीटर की परिधि में बसे हुए और भी कई गांव अपनी धार्मिक व प्राचीनता के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इनमें से कुछ गांवों का संबंध तो महाभारत काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है।

नानौता में दादा मियां जी का एक प्राचीन मजार है। बताया जाता है कि दादा मियां के चमत्कार से प्रभावित होकर बादशाह सिकंदर लोदी ने इस मजार के गुंबद का निर्माण कराया था। इस मजार के बारे में यह भी बताया जाता है कि यदि कोई पशु दूध नहीं देता हो तो उसका स्वामी पशु सहित यहां मजार पर आकर मन्नत मांगे तो उसका पशु दूध देना शुरू कर देता है। हर जुम्मेरात को स्थानीय एवं आसपास के इलाके बहुत श्रद्धालु यहां जियारत करने आते हैं।
यहां एक और अन्य मजार हजरत मौलाना याकूब की भी दिल्ली रोड पर स्थित है। इसके साथ ही सूफी इलाही बक्स की मजार भी लोगों की आस्था का केंद्र है।

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विश्व प्रसिद्ध मुस्लिम शिक्षा संस्थान दारुल उलूम के संस्थापक मौलाना मौ. कासिम साहब नानौता के ही रहने वाले थे।
यह भी बताया जाता है कि देश विदेश में प्रसिद्ध अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खां और देवबंद के दारुल उलूम के संस्थापक मौलाना कासिम साहब के उस्ताद हजरत मौलाना ममलूक सिद्दीकी भी नानौता कस्बे के ही रहने वाले थे।

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नानौता में मोहल्ला सरावज्ञान स्थित 500 वर्ष प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर इस प्राचीन जैन मंदिर में भगवान महावीर की मुख्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
मोहल्ला अफगान में लगभग 150 वर्ष पुराने जैन चैताल्य के रूप में मंदिर है।

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नानौता के मोहल्ला कानूनगोयान में प्राचीन शिव मंदिर है। यहां हर साल महाशिवरात्रि और जन्माष्टमी पर भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। मोहल्ला सरावज्ञान का शिव मंदिर और हनुमान मंदिर भी श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र है।

नानौता की लगभग 100 वर्षों से मंचित होती आ रही रामलीला भी इसकी सांस्कृतिक धरोहर है।

नानौता ने समय के साथ प्रगति के सोपान भी तय किए हैं दिल्ली सहारनपुर के मुख्य मार्ग की अच्छी लोकेशन पर नानौता के स्थित होने से भी इसको लाभ मिला है। कुछ दशक पहले यहां लगाई गई चीनी मिल ने भी इस इलाके के ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुधारने में अहम भूमिका निभाई है इसके अलावा यहां और भी कई फैक्ट्रियां स्थापित की गई है। जिनमें बड़ी संख्या में ग्रामीण युवक नौकरिया कर रहे हैं। यहां स्थापित नर्सिंग होम द्वारा आधुनिक चिकित्सा सुविधा और पब्लिक स्कूलों में अच्छी शिक्षा के द्वारा नगर के विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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गांव सोना अर्जुनपुर – (नानौता से 12 किलोमीटर दूर)

नानौता के गांव सोना अर्जुनपुर में प्रसिद्ध बाबा तीर्थ स्थल है। यहां स्थित दिव्य तालाब व सिद्ध बाबा का मंदिर जन श्रद्धा का बड़ा केंद्र है। सिद्ध तालाब में स्नान करने से इंसान के समस्त वायु रोग दूर हो जाते हैं इस बात की मान्यता दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यह भी मान्यता है कि इसमें स्नान करने से गठिया और चर्म रोग दूर हो जाते हैं। इसी जन भावना से लोग मेले में स्नान भी करते हैं और अपने साथ तालाब की गीली मिट्टी भी साथ ले जाते हैं।

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बरसी गांव – नानौता से केवल 7 किलोमीटर दूर बरसी गांव में स्थित शिव मंदिर का संबंध महाभारत काल से बताया जाता है। किवदंती है कि भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र जाते हुए कुछ समय के लिए यहां रुके थे और उन्होंने इस भूमि की समानता ब्रजभूमि से की थी। बाद में दुर्योधन ने भी यहां शिव मंदिर की स्थापना की थी। हर वर्ष महाशिवरात्रि पर यहां मेला लगता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां जल चढ़ाने के लिए आते हैं।

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नानौता के निकट गांव टिकरौल में एक हजार वर्ष पुराना मंदिर का पता उस समय लगा जब इस स्थान की सफाई ग्रामीणों के द्वारा की जा रही थी। मंदिर जर्जर हालत में है। बताया जाता है कि इस मंदिर की सफाई के दौरान एक शिलालेख भी मिला है इस पर श्री गणेशाय नमः संवत १०२४ आदि अंकित है।

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गंगा यमुना का संगम गांव कुआं खेड़ा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में शायद यह ऐसा पहला स्थान है जहां गंगा और यमुना का मिलन हो रहा है। यहां गंगा नहर का जल यमुना नहर के जल में आकर मिलता है। नानौता के कुआं खेड़ा के पास गंगा यमुना का संगम स्थल धीरे धीरे प्रसिद्ध हो रहा है। यह संगम स्थल नानौता कस्बे के पास दिल्ली सहारनपुर हाईवे से 6 किलोमीटर दूर स्थित है। धार्मिक पर्व और त्योहारों के अवसर पर यहां संगम में स्नान करने के लिए आने वाले वाले श्रद्धालुओं की संख्या धीरे धीरे बढ़ रही है। सरकार यदि यहां जन सुविधाएं स्थाई रूप से उपलब्ध कराए तो यह स्थान एक सुंदर धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है।

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