__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

यकीन करना भले मुश्किल हो लेकिन कड़वा सच है कि पतितपावनी यमुना नदी साल के साल लगभग सुखी ही पड़ी रहती है। केवल कुछ दिन ही होते हैं जहां हम इस नदी में भरपूर पानी देख सकते हैं।

यह देश की शायद एकमात्र नदी है जिसे नहरों को जिंदा रखने के लिए स्वयं को सूखना पड़ता है। जानकार मानते हैं यमुना नदी की दुर्दशा की असली वजह यमुना बेसिन के राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे का वह समझौता है जो सन 1994 में हुआ था। इस समझौते के तहत यमुना बेसिन के पांच राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान व दिल्ली ने तय किया कि वे अपनी सिंचाई एवं पेयजल की जरूरतों के लिए यमुना के पानी का इस्तेमाल करेंगे।

लेकिन अपने अपने सियासी हित साधने की जल्दबाजी में यह तक नहीं देखा गया कि इस समझौते के बाद यमुना नदी का क्या हाल होगा।

भारतीय संस्कृति की सबसे पवित्र नदियों में से एक यमुना नदी यमुनोत्री से जल लेकर यमुनानगर के पास ही पर्वतों से नीचे धरती पर उतरती है और यहीं यमुना पर बैराज बनाकर उसका लगभग सारा पानी डायवर्ट कर दिया जाता है और इस नदी को सूखा रख दिया जाता है। दुनिया में शायद ही और कोई उदाहरण नहीं मिलेगा की एक जीवित नदी को मृत कर दिया जाता है। एक धार्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व की नदी विशेष रुप से जिसका सनातन हिंदू धर्म के लिए बहुत अधिक महत्व है उसको जीते जी मार दिया गया।

समझौते के अनुसार हथिनी कुंड बैराज पर उपलब्ध यमुना के जल का लगभग 80 प्रतिशत पानी हरियाणा पश्चिमी यमुना नहर में और 15 प्रतिशत पानी उत्तर प्रदेश पूर्वी यमुना नहर में डायवर्ट कर लेते हैं। इसके बाद लगभग 5 प्रतिशत पानी ही बचता है। जो बैराज के केवल एक खुले हुए गेट से आगे बहता है।

यह पानी इतनी पर्याप्त मात्रा में नहीं होता है कि एक नदी के रूप में बह सके। यमुना नदी बैराज से थोड़ा आगे तक बह कर ही सूख जाती है। यमुना के अपने मौलिक जल की अविरलधारा शायद ही दिल्ली तक पहुंचती हो। दिल्ली की सीमा से ठीक पहले पश्चिमी यमुना नहर का पानी दोबारा यमुना में मिलने से इसकी दशा कुछ सुधरती है लेकिन यह पानी भी वजीराबाद में रोकने के बाद यमुना का मौलिक जल स्तर शून्य हो जाता है।

यमुना नदी धार्मिक महत्व की नदी है। अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी एवं अन्य धार्मिक पर्व-त्योहारों के अवसर पर आसपास के श्रद्धालु यमुना जी में स्नान करने के लिए आते हैं। लेकिन उस समय भी हथिनी कुंड बैराज से पानी नहीं छोड़ा जाता यमुना तब भी सुखी ही रहती है। जो श्रद्धालु यमुना जी में स्नान करने के लिए आते है वे निराश होकर लौट जाते हैं। यमुना का एक बूंद पानी भी उनको नसीब नहीं होता कि वह पर्व के अवसर पर स्नान कर सकें या अपना कोई धार्मिक संस्कार संपन्न कर सकें।

सूर्य की पुत्री यमुना के जल से अभिषेक के लिए ब्रज मंडल के मथुरा-वृंदावन के हजारों देवालयों में श्रीविग्रह के लिए हर प्रातः यमुना नदी से जल भरकर ले जाया जाता है। लेकिन यह यमुना का मौलिक जल न होकर दिल्ली वालों के सीवर का व प्रदूषित पानी होता है। जिससे भक्तों और संतों को बहुत पीड़ा होती है।

ब्रज में यमुना नदी में यमुना जी का मौलिक जल लाने की मांग बहुत वर्षों से की जा रही है उनकी मांग है कि यमुना जी में यमुना का पानी लाया जाए।

वैज्ञानिकों का भी कहना है कि यमुना का जल उसकी सहनशक्ति से बहुत अधिक मात्रा में प्रदूषित है। यमुना एक मृत नदी घोषित हो चुकी है। पूरे ब्रजमंडल की भावुक मांग है कि यमुना में यमुना जी का जल लाया जाए।

पूरे वर्ष में शायद मानसून का समय ही वह समय होता है जब प्रकृति यमुना नदी में इतना पानी भर देती है कि यमुना नदी पर बनाया गया हथिनी कुंड बैराज उस पानी को रोक नहीं पाता तब यमुना नदी सब बंधन को तोड़कर रौद्र रूप में आती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *