________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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जहां विशाल व मनोरम गंगनहर है उस जमाने की अजूबा थी गंगनहर।

गंग नहर
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गंगा यमुना के ऊपरी दोबाव में राजधानी दिल्ली से हरिद्वार तक की यात्रा में राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर इस क्षेत्र से गुजरती गंग नहर, इसकी मुख्य शाखाएं, उप शाखाएं देखने को मिल जाएंगी।
गंग नहर देखने में विशाल और बहुत ही मनोरम है। इस नहर की शाखाओं और उप शाखाओं को भी हरियाली के महासागर स्वरूप हरे-भरे खेतों के बीच से बहते देख कर मन आनंदित हो उड़ता है।
गंग नहर के बिना हरी-भरी और धन्य-धान्य से भरपूर इस क्षेत्र की धरती की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि इस जीवनदायनी
गंग नहर की उत्पत्ति की कहानी भी बहुत ही रोचक है।

उन्नीसवीं सदी का समय भारत में अकाल और भुखमरी की अनेकानेक घटनाओं का समय था। जब 1838 में भयंकर सूखा पड़ा, तो देश के अन्य भागों के साथ साथ गंगा यमुना के इस दोआब मैं भी मौत का तांडव पसर गया। देश में उस समय अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था। भीषण अकाल में राहत कार्यों में कंपनी सरकार के एक करोड़ से अधिक रुपए खर्च हो गए थे। इस भारी खर्च से कंपनी सरकार घबरा गई इस समस्या से जूझने के लिए हर स्तर पर विचार विमर्श किया गया।

कर्नल प्रॉबी कॉटले ने हरिद्वार से गंग नहर निकालने का एक प्रस्ताव कंपनी सरकार को भेजा। कंपनी सरकार ने कॉटले की रिपोर्ट पर विचार के लिए तीन इंजीनियरों की एक कमेटी बना दी।
तीन सदस्यीय कमेटी ने रिपोर्ट दे दी की गंग नहर बने लेकिन उसका उपयोग सिंचाई के लिए नहीं, बल्कि आने जाने के लिए नेवीगेशन कैनाल के रूप में हो।
कॉटले का फिर से अंतिम रिपोर्ट देने के लिए कहा गया। कॉटले ने फिर रिपोर्ट बनाई और इस बार जलमार्ग और सिंचाई दोनों कार्यों के लिए गंग नहर बनाने का मध्य मार्ग निकाला।
इसी बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने लॉर्ड हार्डिंग को नया गवर्नर जनरल बना कर भारत भेजा। लॉर्ड हार्डिंग ने गंग नहर के निर्माण स्थल हरिद्वार और रुड़की का दौरा किया और अंत में इस योजना को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी।
इस विशाल परियोजना को पूरा करने में शुरू में कई बाधाएं आई।
अंग्रेज हिंदुस्तान के मलेरिया से बहुत घबराते थे। नेहरों के किनारे के इलाकों में नेहरों के रिसाव के कारण मलेरिया बहुत फैलता था। इसलिए गंग नहर जैसी नेहरों का निर्माण करा कर अंग्रेज और अधिक मुसीबत मोल लेना नहीं चाह रहे थे।
कॉटले से बेहद लगाव रखने वाले लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन ने सरकार को लिखा कि यदि मलेरिया से हजारों लोग मरते हैं, तो अकाल से लाखों लोग और पशु मरते हैं। इसके अलावा कंपनी सरकार को लाखों रुपए की मालगुजारी से भी हाथ धोना पड़ता है। थॉमसन ने पग पग पर कॉटले को बढ़ावा दिया और विरोधियों की आलोचनाओं से उनका बचाव किया। थॉमसन ने बार बार सरकार को लिखा कि गंग नहर योजना लाभकारी है।
कॉटले धुन के पक्के व्यक्ति थे। वे कोई प्रशिक्षित इंजीनियर, शिल्पी या नहर कार्य के विशेषज्ञ नहीं थे। लेकिन उनकी जिज्ञासा, विकास की सोच और अपने काम के प्रति समर्पण ने उन्हें एक कुशल इंजीनियर, शिल्पी और नहर कार्य के विशेषज्ञ से भी बढ़कर बना दिया।
कॉटले ने कभी पैदल तो कभी घोड़े पर लगातार छह माह तक पूरे क्षेत्र का सघन भ्रमण किया। गंग नहर की विशाल परिकल्पना को कागज पर उतारा। इस परियोजना से तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार को परिचित करवाया और अंततः अंग्रेज सरकार को इस परियोजना पर धन खर्च करने के लिए तैयार कर लिया।
अप्रैल 1842 में नहर की खुदाई शुरू हुई। नहर बननी शुरू हुई तो हरिद्वार के संतो ने नहर बनाने का विरोध किया। संतो की चिंता यह थी कि नहर के निर्माण होने से हरिद्वार से हो कर बहने वाली पवित्र गंगा की अविरल धारा रुक जाएगी।
कॉटले ने संतो के साथ बैठक कर उन्हें समझाया कि वह बांध के बीच एक स्थान छोडेंगे, जिससे गंगा हमेशा बहती रहेगी। कॉटले ने संतो को हरिद्वार में गगां के किनारे पक्के घाट बनाने का भी वचन दिया और कॉटले ने इसे पूरा भी किया।
देश की संस्कृति और संतो का सम्मान करते हुए कॉटले ने बांध बनाने की शुरूआत भगवान गणेश जी की पूजा के साथ किया।

हरिद्वार से नहर बनाने का काम आगे बढते ही रूड़की के पास शिवालिक की पदाडियों से उतरने वाली अनगिनत जल धाराएं इस नहर के बीच बाधाएं बन रही थी। ये जलधाराएं नहर को छतिग्रस्त कर सकती थीं। इस बाधा को दूर करने के लिए कॉटले ने रूडकी में आधा किलोमीटर से अधिक इन
जलधाराओं की सामान्य ऊँचाई से अधिक ऊँची नहर का निर्माण किया। यह काम अपने आप में बहुत ही चुनौतीपूर्ण,
खर्मीला और श्रमसाध्य था, लेकिन इस तरह से काम करने के अलावा कोई दूसरा उपाय भी तो नही था।
हरिद्वार-रूडकी के बीच नहर निर्माण के दौरान सबसे कठिन काम था सोलानी अक्वेडक्ट का निर्माण। नीचे सोलानी नदी और उसके ऊपर से बहती हुई गंगनहर का निर्माण करना।
जिस तकनीक से इस सोलानी अक्वेडक्ट (जल सेतू) को बनाया गया वह आज भी अद्‌भुत है। इसे देखकर आज भी लोग दांतो तले ऊॅगली दबा लेते है। इसकी खास बात यह है कि इसमें नीचे से एक – एक बूंद पानी टपकता है और यह प्रक्रिया हर समय चलती रहती है। यह भी कहा जाता है कि जिस दिन यह पानी टपकना बंद हो जाएगा, यह जल सेतू टूट जाएगा।
यह सोनाली जल सेतु जिस स्थान पर बना है महा सोनाली नदी रेतीले आधार वाली जमीन पर बहती है। कॉटले के सामने यह प्रश्न था कि सोनाली के रेतीले आधार पर जल सेतु के लिए आधार स्तंभ कैसे स्थापित किए जाएं। इस समस्या का समाधान भारतीय राज-मिस्त्रियों ने कॉटले को समझाया कि सोनाली नदी में कुएं खोदकर उनमें स्तंभ बनाए जाएं। इस भारतीय तकनीक से यहां के राजमिस्त्री नदियों पर पुल बनाने का काम प्राचीन समय से कर रहे थे।
इस स्थान पर ऐसी ही और भी कई कठिनाइयां सामने आई लेकिन उन सबको दूर करते हुए गंग नहर के निर्माण का कार्य आगे बढ़ता रहा।

हरिद्वार में हर की पौड़ी से यह गंग नहर निकली तथा उसके बाद पथरी, रानीपुर, रतमाऊ, नदी पर गुजरती है। अपने आप में यह इकलौती मिसाल है जिसमें नहर चार नदियों के ऊपर से गुजरती है।
कर्नल कॉटले ने पूरे समर्पण और इमानदारी से अपने काम को अंजाम तक पहुंचाया। सर्दी, गर्मी, आंधी तूफान, बरसात,बीमारियों का सामना और अपने अधीनस्थ अधिकारियों
कर्मचारियों और मजदूरों से काम लेने में आने वाली कोई भी मुश्किलें उसे झुका नहीं सकी। इस दौरान कॉटले ने हरिद्वार से कानपुर तक घोड़े की पीठ पर कई कई बार चक्कर लगाए, कभी कभी वह बीस – बीस घंटे तक घोड़े की पीठ पर रहता था। नहर निर्माण के बारीक से बारीक मुद्दे पर ध्यान रखकर कॉटले ने अपने काम को अंजाम तक पहुंचाया।
गंग नहर की शुरुआत दरअसल भारत के एक बड़े भाग में खुशहाली की शुरुआत थी। अकाल और सूखे से एक बड़ी सीमा तक मुक्ति की शुरुआत थी।
हरिद्वार से लेकर मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, अलीगठ, एटा, आदि जिलों से होकर कानपुर तक गुजरती गंग नहर की 560 किलोमीटर की मुख्य शाखा और लगभग 4800 शाखाओं से 767 हजार वर्ग एकड़ भूमि को सिंचित करती है।
उस जमाने की अजूबा गंग नहर का औपचारिक उद्घाटन 8 अप्रैल 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने किया था।
यह एक विराट काम था। गंग नहर से लगभग लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है तो दिल्ली, नोएडा और कानपुर के पेयजल संस्थानों को पेयजल उपलब्ध कराती है।

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