___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मां भागीरथी गंगा के पावन तट पर स्थित ऋषिकेश एक पुरातन तीर्थ स्थल है। यहां पर अनेक पौराणिक स्थान है जिनके दर्शनों से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

** श्री भरत मंदिर। –

ऋषिकेश का यह अति प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का पुराणों में वर्णन है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान हृषिकेश(नारायण) की एक ही शालिग्राम शिला से निर्मित भव्य चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि तिरुपति बालाजी, श्रीबद्रीनाथजी तथा भरत मंदिर में स्थापित भगवान हृषिकेश की प्रतिमाएं एक ही शालिग्राम शिला से निर्मित की गई हैं।

शताब्दियों पहले विरोधियों के आक्रमण के डर से मंदिर के पुजारियों ने इस प्रतिमा को मायाकुंड में छिपा दिया था। बाद में जब आदि जगद्गुरु शंकराचार्य यहां पर पधारे तब उन्होंने भगवान ऋषिकेश की प्रतिमा को मायाकुंड से निकालकर इस मंदिर में फिर से स्थापित किया। आदि शंकराचार्य ने वसंत पंचमी के दिन प्रतिमा को पुनर्स्थापित किया था। तब से यहां वसंतोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है। प्रतिवर्ष वसंत पंचमी के दिन यहां एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक उत्सव शोभा यात्रा व मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

** ऋषिकेश के प्राचीन पांच शिव मंदिर –

शिव पुराण में ऋषिकेश के क्षेत्र में पांच मंदिरों का उल्लेख किया गया है। जिनमें सोमेश्वर महादेव मंदिर, नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर, वीरभद्रेश्वर महादेव मंदिर, चंद्रेश्वर महादेव मंदिर तथा पातालेश्वर महादेव मंदिर यह पांच पौराणिक शिव मंदिर हैं।

* सोमेश्वर महादेव मंदिर –

ऋषिकेश में यह मंदिर हरिद्वार से ऋषिकेश में प्रवेश करते समय ही सबसे पहले सोमेश्वर महादेव का प्राचीन पौराणिक मंदिर आता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का उल्लेख किया गया है। कहा जाता है पहले गंगा जी इस मंदिर से सटकर ही बहा करती थी।

* नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर –

यह पौराणिक मंदिर ऋषिकेश से लगभग 12 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित है। इसी स्थान पर भगवान शिव विषपान करके समाधिस्थ हो गए थे। श्रावण मास में शिव भक्तों की भारी भीड़ यहां जलाभिषेक करने के लिए उमड़ती है।

* वीरभद्रेश्वर महादेव मंदिर –

ऋषिकेश से 4 किलोमीटर दो गंगा जी के तट पर यह पौराणिक मंदिर स्थित है इस स्थान को भगवान शिव की तपस्थली के रूप में जाना जाता है।

* चंद्रेश्वर महादेव मंदिर –

ऋषिकेश में यह पौराणिक मंदिर चंद्र एवं भागा तथा गंगा जी इन तीन नदियों की धाराओं के बीच में भगवान चंद्रेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि गौतम ने अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर चंद्रमा के उदय न होने पर उसे श्राप दे दिया था। गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा ने इस स्थान पर भगवान शिव की उपासना की थी। इसीलिए यहां स्थापित शिवलिंग को चंद्रेश्वर महादेव कहा जाता है।

वर्षा ऋतु में जिस समय चंद्र एवं भागा वर्षाकाल की नदियों एवं गंगा जी में भारी मात्रा में जल आ जाता है। तब इन तीनों नदियों का जल कई बार भगवान चंद्रेश्वर महादेव के मंदिर को अपनी धाराओं में बहाकर ले जाता है। पुनर्निर्मित मंदिर में श्रद्धालु भक्त बड़ी संख्या में जलाभिषेक के लिए आते हैं।

* पातालेश्वर महादेव मंदिर –

ऋषिकेश में यह मंदिर प्राचीन भरत मंदिर के परकोटे के भीतर लगभग ८ फुट भूमि के नीचे पातालेश्वर महादेव शिवलिंग स्थापित है। श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र इस मंदिर में श्रावण मास में प्रतिदिन दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आकर जलाभिषेक और पूजा अर्चना करते हैं।

ऋषिकेश के अन्य पौराणिक एवं प्राचीन तीर्थस्थल –

* ऋषि कुंड –

पौराणिक ऋषि कुंड ऋषिकेश में गंगा जी के त्रिवेणी घाट पर स्थित है। इस स्थान के बारे में पौराणिक कथा है कि कुब्ज ऋषि के तप से प्रसन्न होकर अदृश्य यमुना नदी ने अपने जल से ऋषि को तृप्त किया था। इस कुंड में यमुना नदी के जल का अदृश्य स्रोत बताया जाता है। ऋषि कुंड में स्नान का बहुत महत्व बताया गया है। ऋषि कुंड के पश्चिमी तट पर रघुनाथ मंदिर है। उनके चरणों में तीन छिद्र बने हुए हैं, जिनसे जल निकलकर ऋषि कुंड में आता रहता है।

* रघुनाथ मंदिर –

रघुनाथ मंदिर एक दर्शनीय मंदिर है।

* वराह मंदिर –

ऋषिकेश में यह मंदिर त्रिवेणी घाट से कुछ पहले ही मार्ग में यह मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार वराह रुप का है। वस्तुतः इस मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के वराह अवतार यहां शिला रूप को प्राप्त हुए थे।

** ऋषि कुंड –

पावन गंगा जी के त्रिवेणी घाट के निकट ऋषि कुंड स्थित है। ऋषिकेश का यह प्रमुख कुंड है।

मान्यता है प्राचीन काल में वट वृक्ष के नीचे ऋषियों ने अखंड तपस्या के तपोबल से जल निकाला जिससे भीषण सूखे से त्रस्त हिमालय के जन-जन को पीने के लिए जल मिला, उसी समय से इस स्थान को ऋषि कुंड के नाम से जाना जाता है। यह भी प्राचीन मान्यता है यहां गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम है। इससे भी इसका महत्व बढ़ गया।

प्राचीन ऋषि कुंड के साथ-साथ ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का विशाल मंदिर बना हुआ है

तीर्थयात्री इस कुंड पर अपने पूर्वजों का तर्पण व पिंडदान आदि भी करते हैं।

इस कुंड के बारे में यह भी कहा जाता है कि कभी इसमें सतरंगी रंग दिखाई देते थे। लेकिन इस समय ऋषि कुंड का जल साफ नहीं है।

* मायाकुंड

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