_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मुजफ्फरनगर जनपद में अनेक स्थानों पर जैन समाज की प्राचीन धरोहर विद्यमान है।

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मुजफ्फरनगर शहर     – –

* श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर  – मुजफ्फरनगर का यह एक प्राचीन मंदिर है। मंदिर लगभग ३०० साल से भी पहले का बना हुआ है। कुछ लोग तो इस मंदिर को मुजफ्फरनगर शहर के बसने के समय का ही बताते हैं। यह भी किवदंती है कि इस शहर को बसाने वाले मुजफ्फर अली के किले की खुदाई के दौरान ही यहां भगवान शांतिनाथ की मूर्ति निकली थी।

* भगवान आदिनाथ मंदिर  –  इस मंदिर का निर्माण १८७७ में हुआ था। इस मंदिर की सुंदरता और भव्यता देखते ही बनती है। ठाकुरद्वारा, अबुपुरा स्थित इस मंदिर की दो फुट ऊंची मुख्य प्रतिमा भगवान ऋषभदेव की है।

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खतौली  —

मुजफ्फरनगर मेरठ के बीच खतौली नगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है यहां गंग नहर के समीप भगवान शांतिनाथ कुंठुनाथ वह हरनाथ जी की नसियां स्थित है

जैन धर्म शास्त्रों के अनुसार  हस्तिनापुर की बारह योजन शास्त्रीय परिधि में आने के कारण खतौली जैन तीर्थ नगरी आध्यात्मिक दिव्यता से भरपूर है। हस्तिनापुर की शास्त्रीय परिधि में आने व यहां की सुंदरता और सौम्यता को देखते हुए जैन तीर्थंकरों भगवान शांतिनाथ, कुन्थुनाथ, व अहरनाथ ने यहां कठोर तप किया था। उनकी स्मृति में यहां चरण चिन्हों को स्थापित कर निशियों का निर्माण कराया गया था। कालांतर में तीनों ही निशियां भूगर्भ में विलीन हो गई थी। पुणे काफी समय के पश्चात वर्तमान  तीनों नीतियां  भूगर्भ  से अतिशयपूर्ण ढंग से प्रगट हुई । प्राचीन काल से ही इनकी बड़ी मान्यता चली आ रही है जैन समाज को निशियों के प्रकट होने पर अपार प्रसन्नता हुई और यहां पर जैन मंदिर की स्थापना हुई। मंदिर परिसर में ही निशियों के उत्तर दिशा में अति प्राचीन कुआं है। निशियां जी मंदिर की महत्ता अन्य मंदिरों की अपेक्षा अधिक समझी जाती है।

श्री दिगंबर तीर्थ क्षेत्र निशियां जी मंदिर की बहुत प्रतिष्ठा है। मंदिर में जैन संतों के चरण चिन्ह भी बनाए गए हैं।

जैन धर्म के अनेक संत और ब्रह्मचारिणियां यहां प्रवास कर धर्म भावना में वृद्धि कर चुके हैं।

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खतौली में नौ प्रमुख जैन मंदिर है। हर मंदिर की अपनी एक विशेषता है। सैकड़ों साल पुराने इन जैन मंदिरों का जीर्णोद्धार करा कर इन्हें भव्य रुप दिया गया है।

* भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर –

यहां के सबसे प्राचीन जैन मंदिर में से एक खतौली नगर के बीच भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर कानूनगोयान है।

* छत्ते वाला मंदिर  –

कई सौ वर्ष  पुराने इस मंदिर में भगवान महावीर की दिव्य पाषाण प्रतिमा स्थापित है। जो अहिंसा एवं अपरिग्रह का संदेश देती है। यह मंदिर छत्ते वाला मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में ग्यारह फन मस्तक पर धारण किए हुए भगवान चंद्रप्रभ की अतिशय युक्त प्रतिमा विराजमान है और भगवान पार्श्वनाथ की संवत १०४१ की प्रतिमा भी इस मंदिर में विराजमान है।

* चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर  –

मौहल्ला सराफान स्थित यह मंदिर कई सौ वर्ष पुराना है। इसमें मूलनायक प्रतिमा भगवान चंद्र प्रभ की है। मंदिर में एक काष्ठ निर्मित एरावत हाथी भी है। जो अत्यंत मनोरम है तथा प्रत्येक रथ यात्रा महोत्सव की शोभा बढ़ाता है। मंदिर में हस्तलिखित शास्त्र रखे हैं।

* चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर  – पीसणोपाड़ा  –

बड़ा बाजार स्थित यह मंदिर पीसणोपाड़ा मंदिर के नाम से विख्यात है और लगभग पांच सौ साल पुराना है। मंदिर में भगवान पदमप्रभ और भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। मंदिर के इस नाम के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर के आसपास चारों ओर आटा पीसने वालों के घर थे। इसलिए इस स्थान को पीसणोपाड़ा कहा जाता है।

* जक्की वाला मंदिर  –

मिट्ठू लाल मौहल्ले मे दिगंबर जैन जक्की वाला मंदिर लगभग २०० वर्ष पुराना है।

* पदमप्रभ मंदिर  –

कानूनगोयान स्थित यह मंदिर भागीरथी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसमें भगवान पदमप्रभ की प्रतिमा है। मंदिर के संस्थापक श्री भागीरथी वर्णी जी कहे जाते हैं।

* पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर   –

गली घंटाघर काशीराम स्थित  यह मंदिर काफी भव्य है। इस मंदिर की स्थापना एक चैत्यालय के रूप में की गई है। मंदिर में मूल प्रतिमा भगवान पार्श्वनाथ की है।

* शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर  –

बड़ा बाजार स्थित इस जैन मंदिर की भव्यता देखने योग्य है।

* दिगंबर जैन मंदिर जानसठ रोड की स्थापना हुए अधिक वर्ष नहीं हुए हैं यह एक नवनिर्मित मंदिर है।

 

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दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र   –    वहलना

मुजफ्फरनगर जिला मुख्यालय से मेरठ की ओर लगभग 6 किलोमीटर दूर चल कर राष्ट्रीय राजमार्ग 58 से दायीं ओर   ( पश्चिमी दिशा) में लगभग डेढ किलोमीटर चलते ही पारस नगरी वहलना आती है।

पारस नगरी वहलना एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है। इस पावन तीर्थ स्थल पर प्राचीन मनोज्ञ ऐतिहासिक एवं अतिशयपूर्ण जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की नौ फन वाली मूल प्रतिमा स्थित है।

वहलना के दिगंबर जैन मंदिर में विराजित भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति के इतिहास  के बारे में विशेष अभिलेख तो प्राप्त नहीं है। लेकिन प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा भू भाग (तहखाने) से प्राप्त हुई थी। उसी तहखाने के ऊपर मूर्ति स्थापित करके एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया गया था। यही मंदिर आज साक्षी के रूप में जाना जाने लगा है।

पुराने अभिलेखों के अनुसार १०० -१५० वर्ष पहले वहलना नगरी में जैन समाज के लगभग  ३५० परिवार रहते थे। लेकिन समय के परिवर्तन के साथ यह सभी जैन परिवार शहरों में रहने चले आए।

अतिशय क्षेत्र वहलना पारस नगरी के रूप में प्रसिद्ध होने लगा। यहां का दिगंबर जैन मंदिर अब इतना आकर्षित व अद्भुत रूप में परिवर्तित हो चुका है कि उसकी शोभा देखते ही बनती है।

जैन मंदिर के बाहर उत्तर दिशा में एक विशाल पांडुक शिला बनी हुई है। यहां स्थापित मान स्तंभ भी अपनी चमक व भव्यता से श्रद्धालुओं को लुभाता है।

 

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तिस्सा गांव    –

( मुजफ्फरनगर से 20 किमी  व  भोपा कस्बे से मात्र 3 किमी दूर )

भोपा कस्बे के पास तिस्सा गांव में जैन धरोहर के रूप में एक विशाल मंदिर विराजमान है। इसके जैसा  प्राचीन एवं  भव्य जैन मंदिर  अन्यत्र दुर्लभ है ।१२०फीट ऊंचे शिखर वाला यह जैन मंदिर अपने अंदर अनेक चमत्कार और आश्चर्यजनक घटनाओं को संजोए हुए है।

किसी समय एक नगरी के रूप में विख्यात रहा तिस्सा गांव को देखते ही श्रद्धालु भाव विभोर हो जाते हैं। ३०० वर्ष से भी पुराने इस मंदिर के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं। मंदिर की भव्यता एवं अतिशय संपन्नता के कारण श्रद्धालुओं की  सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

बा अदब आना यहां, हर फर्द को दरकार है।

साहबो यह शाहन शाहे जैन का दरबार है।।

यह पंक्तियां इस  मंदिर के एक द्वार पर लिखी हैं।

इस जैन मंदिर में तीन मनोहारी वेदियां स्थित हैं। प्रथम वेदी में पाषाण की भगवान पार्श्वनाथ जी की अतिशयपूर्ण प्रतिमा विराजमान है। इस प्रतिमा पर संवत १५४८ का उल्लेख मिलता है।अन्य दो वेदियों में मूलनायक तीर्थंकर श्रेयांसनाथ तथा तीर्थंकर महावीर स्वामी की प्रतिमाएं विराजमान है।

इस जैन मंदिर का शिखर अत्यंत विशाल है। भूतल से इसकी ऊंचाई १०८ फिट है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो हाथियों की मूर्तियां बनी है। मंदिर के द्वार पर कलात्मक चित्रकारी की गई हैं। इस द्वार को देखकर राजाओं द्वारा बनवाए गए भव्य मंदिरों की याद आ जाती है ।

तिस्सा के इस मंदिर में की गई सोने की नक्काशी अपनी अद्भुत चमक से बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेती है दीवारों पर चित्रकारी से पावापुरी, भदारगिरी, गिरनारजी, सोनागिरी, सम्मेद शिखर जी कैलाश पर्वत और हस्तिनापुर क्षेत्र के हस्त निर्मित नक्शे प्रदर्शित हैं। दीवारों पर हो रही चित्रकारी विशेष रूप से दर्शनीय है।

मंदिर में लगभग १२०हस्तलिखित प्राचीन ग्रंथ विराजमान है। इन ग्रंथों में आदि पुराण,  चन्दप्रभु पुराण और अर्थप्रकाश उल्लेखनीय हैं। ताड़पत्र पर हस्तलिखित ग्रंथ भी यहां उपलब्ध हैं।

बताते हैं कि सभागार के दाएं ओर वाले कमरे में नाग नागिन का जोड़ा निवास करता है। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि यह जोड़ा कभी किसी को कुछ नहीं कहता है और ऐसे ही खुला घूमता रहता है।

बताते हैं कि यहां मंदिर में रात्रि को देवतागण आकर पूजा अर्चना करते हैं। उनके नाचने एवं गाने की आवाजें लोगों ने स्वयं सुनी है।

यहां के बारे में यह भी बताया जाता है कि एक बार कीर्तन मंडली के सदस्य चमड़े से मढ़ी ढोलक ले आए थे तो यहां का दरवाजा नहीं खुला जब मंदिर प्रांगण से वह ढोलक बाहर चली गई तो दरवाजा अपने आप खुल गया। यह घटना मंदिर की पवित्रता को दर्शाती है।

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श्री अतिशय क्षेत्र  बिहारी  गांव   –

जनपद मुख्यालय मुजफ्फरनगर से जानसठ रोड पर लगभग 12 किमी की दूरी पर स्थित गांव सिखेड़ा से दाहिनी ओर 2 किलोमीटर चलने पर बिहारी गांव आता है, जहां पर यह अतिशय युक्त मंदिर शोभायमान है।

दिगंबर जैन मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ जी की अतिशय युक्त अत्यंत महिमाशाली श्वेत संगमरमर से बनी सप्तफन युक्त तीन प्रतिमाएं प्रथम कटनी में विराजमान है। सैकड़ों साल पुरानी यह मूर्ति इस अतिशय क्षेत्र में श्रद्धालु भक्तों की आस्था का केंद्र है। यहां विराजित भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा वि. संवत २५४ की है ।अर्थात यह प्रतिमा अट्ठारह सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी है। प्रतिमाओं के एक ओर पद्मासन चौबीसी चिन्ह सहित विराजमान है जो संवत१५४८ की है। प्रतिमा में २६ छोटी मूर्तियां है। जिनमें १० मूर्तियां खड़गासन तथा १६ मूर्तियां पद्मासन में शोभायमान है। यह प्रतिमा अत्यंत प्राचीन तथा पांडवकालीन है।

द्वितीय कटनी में भगवान आदिनाथ जी, शांतिनाथ जी, विमलनाथ जी, पार्श्वनाथ जी तथा चंद्रप्रभु भगवान की दो दो प्रतिमाएं विराजमान हैं।

प्रतिमाओं के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि विदेशी यमन आक्रमणकारियों से प्रतिमाओं की रक्षा करने हेतु  कंची तालाब में छिपा कर इन प्रतिमाओं की सुरक्षा की गई। संवत १५४८ में पुणः मंदिर का निर्माण कराकर उसमें पुणः मूर्तियों की प्रतिष्ठा हुई।

अतिशय क्षेत्र के रूप में बिहारी गांव विख्यात रहा है। इस क्षेत्र में सैकड़ों स्थानों पर सर्प के फन बने हुए हैं। जो पार्श्वनाथ प्रभु की स्मृति जागृत कर देते हैं। यह भी मान्यता है कि गांव की सीमा में श्रद्धालुओं को सर्प का विष नहीं चढ़ता है।

गांव में स्थित जिस कंची तालाब में प्रतिमाओं को छिपाया गया था। इससे इस तालाब का जल  भी अतिशय संपन्न हो गया। इसमें स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं ऐसी मान्यता है।

बिहारी गांव पांडव कालीन  है।  इसका  पुराना नाम अनूपशहर था। बताया जाता है कि यहीं पर पांडवों ने कौरवों के साथ जुआ खेला था I जिसमें कौरवों ने उन्हें बुहार (पराजित) कर दिया था। इसीलिए इस गांव का नाम बिहारी रखा गया।

जैन मंदिर के पास एक सुरंग है। जिसके विषय में बताया जाता है कि यह सुरंग हस्तिनापुर तक जाती है। वर्तमान में इस सुरंग को बंद कर दिया गया है।

प्रतिवर्ष अतिशय क्षेत्र बिहारी में भव्य रथयात्रा का आयोजन किया जाता है।

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दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र  सठेड़ी गांव –

खतौली कस्बे से बिल्कुल सटा हुआ सेठेड़ी गांव स्थित है।

गांव सठेड़ी में ऐतिहासिक अतिशय युक्त श्री १००८महावीर स्वामी दिगंबर जैन मंदिर महावीरांचल स्थित है। इस मंदिर का प्राचीन इतिहास  है l यहां विराजित पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति अपने आप में अनोखी बताई जाती हैं। पारसनाथ भगवान की सभी मूर्तियों में सर्प मूर्ति में भी अंकित मिलता है तथा यहां स्थापित मूर्ति में सर्प अलग से बना हुआ है। जिस पर भगवान पार्श्वनाथ का हाथ रखा हुआ है। इस मूर्ति पर इसके निर्माण का संवत १५९८ अंकित है मान्यता है कि इस प्रतिमा के दर्शन मात्र से कष्ट दूर होने लगते हैं ।मंदिर में भगवान महावीर और ५ अन्य प्रतिमाएं स्थापित हैं।

कहा जाता है कि यह गांव लगभग एक हजार साल पहले बसाया गया था। इस गांव में साहूकार और धनाढ्य लोगों का निवास हुआ करता था। इसी से गांव का नाम सेठेड़ी पड़ा।

कुछ वर्षों पूर्व यहां कुछ नव निर्माण के लिए खुदाई कार्य शुरू कराया गया। खुदाई के दौरान सभी उस समय हैरत में पड़ गए जब बड़े बुजुर्गों द्वारा किस्से कहानियों में सुनाई जाने वाली बात सभी की आंखों के सामने हकीकत बन कर आ गई। खुदाई में ऐतिहासिक जैन मंदिर के पीछे जमीन के नीचे एक लंबी सुरंग दिखाई दी। ग्रामीणों ने बताया यह सुरंग सेठेड़ी से सरधना तक जा रही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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