_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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मसूरी एक शीतल, सुरम्य, सुहावना और आकर्षक नाम है। चारों तरफ से पहाड़ों की चोटियों ने मसूरी को घेरा हुआ है। उत्तर की ओर हिमालय पर्वत की चोटियां बहुत ही आकर्षक लगती हैं, मानों क‌ई सुन्दर परियां स्वागत के लिए खड़ी हों।

मसूरी में पर्वतों पर चार हजार फुट की ऊंचाई पर चीड़ के पेड़ हैं और पांच हजार फुट की ऊंचाई पर ओक के पेड़ होते हैं। फिर छह हजार फुट की ऊंचाई पर रोडेन्ड़न, देवदार,मेंपिल और साइप्रस के पेड़ मिलते हैं तो इससे और ऊपर अखरोट और सिल्वर पर के पेड़ पाए जाते हैं।

युगों से यहां की पहाड़ी हवा में निरोगिता की शक्ति मिलती रही है, जो हिम कणों व वृक्षों से छन-छन कर आती है और मस्तिष्क के हर हिस्से को झंकृत कर देती है।

मसूरी, जो कभी सिर्फ अंग्रेजों की आरामगाह हुआ करती थी आज देश-विदेश के पर्यटकों में एक आकर्षक एवं मनोहारी पर्वतीय स्थल के रूप में लोकप्रिय है।

देवदार, बांज, जूनीपर के घने जंगलों के बीच बने बंगले प्रकृति का अलग ही सौंदर्यशास्त्र रचते थे। मसूरी का यह वैभव अभी कुछ दशक पुराना है।

बर्फ से लदे देवदार के वृक्ष, घने वन, निस्तब्ध शांति, पूर्णिमा की धवल चांदनी में नहाई मसूरी के गंधर्व नगरी जैसे मोहक रुप को महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने शब्दों में उतारा था।

मसूरी के सौंदर्य के मोहपाश में बंधे राहुल सांकृत्यायन ही नहीं बल्कि न जाने कितने अनगिनतत लोग जीवन भर इस नगर के सौंदर्य पर मुग्ध होकर यहीं के होकर रह गए। इसी सौंदर्य के सम्मोहन में बंधे हजारों-हजार लोग मसूरी पहुंचने के लिए ललकते रहते हैं।

मसूरी का हैप्पी वैली स्थान बहुत दिनों तक सुविख्यात लेखक राहुल सांकृत्यायन के आवास के रूप में जाना जाता रहा है। राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं में सन 1950 के आसपास के समय की मसूरी का वर्णन पढ़ना आज भी आज सा ही लगता है। उन्होंने उस समय की मसूरी का वर्णन इस तरह से किया है-“1945 के दिसंबर की तारीख है आज जितनी बर्फ पड़ी है शायद इस वर्ष की सबसे बड़ी हिमवृष्टि है। हैप्पी वैली मोहल्ले में आने जाने वाले बहुत कम ही है। इसलिए लोगों के पैरों में बर्फ को दबाकर रास्ता पकड़ा। वहां अछूती बर्फ पर डेढ़-दो सौ गज चलना पड़ा, सड़क पर पहुंचने में हमें कष्ट और थकावट मालूम हुई। सड़क से आज पच्चीस-पचास आदमी जरूर गुजरे थे। इसलिए उनके पैरों ने बर्फ को दबाकर एक फुट चौड़ा रास्ता बना दिया था। आमने-सामने से आने पर किसी को बगल में हाथभर बर्फ में धंसकर रास्ता छोड़ना पड़ता।”उस समय मसूरी में इतनी बर्फबारी होती थी।

पहाड़ों में सुरम्य स्थान मसूरी की खोज करने वाले कैप्टन यंग के आमंत्रण पर ही भारतीय सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन महासर्वेक्षक जॉर्ज एवरेस्ट मसूरी में अपना आवास बनाकर रहने लगे। बाद में उन्होंने यहां एक वेधशाला का निर्माण किया और अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे यहां आकर रहे और विश्व की सबसे ऊंची चोटी की ऊंचाई को मापा। उस पर्वत शिखर गौरी शंकर पर्वत को उनके सम्मानार्थ उनके नाम पर माउंट एवरेस्ट के नाम से नवाजा गया।

मोतीलाल नेहरू भी थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद मसूरी आया करते थे। वे बिमार रहते थे और मसूरी आकर कुछ दिन यहां रहने पर उन्हें स्वास्थ्य लाभ हो जाया करता था।

जवाहर लाल नेहरू भी इंग्लैंड से पढ़ाई पूरी करके आने के बाद पत्नी कमला व अपनी बेटी इंदिरा के साथ कुछ दिन मसूरी में रहने के लिए आए थे। कमला नेहरू। बिमार रहतीं थीं, मसूरी में उन्हें स्वास्थ्य लाभ होता था।

पर्वतीय नगरी मसूरी की यादों में क्रांतिकारी रासबिहारी बोस, गांधीजी, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की ओर से कानूनी लड़ाई लड़ने वाले जान लेंग, भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से लगाव रखने वाले कई आइरिश राजनीतिक कार्यकर्ताओं की स्मृतियां आज भी सुरक्षित हैं।

अंग्रेजों के समय के राजा-महाराजाओं की शानो शौकत तथा विलासप्रियता के अनेकों किस्सों के साथ गुलाबो-विल्सन से लेकर हैदरहर्सी व लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की पुत्री तक प्रेम की क‌ई कोमल कहानियां भी दर्ज हैं।

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