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________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि. मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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यह मसूरी की आबो-ओ-हवा ही थी जिसे देखकर अंग्रेजों ने इसे विकसित कर इसे पहाड़ों की रानी का खिताब दिया।सन 1827 में अंग्रेजी फौज के सिरमौर राइफल्स के अधिकारी कैप्टन यंग जब इस क्षेत्र की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों में सैर-सपाटे व शिकार के लिए आए तो उन्हें यहां खास किस्म की झाड़ियां दिखाई दी,स्थानिय ग्रामिणों ने उन्हें बताया कि ये मंसूर की झाड़ियां हैं। ये ही मंसूर की झाड़ियां अब इस स्थान पर अप्राप्य हैं, लेकिन धीरे-धीरे दुनिया भर में इस क्षेत्र का नाम इसी झाड़ी के नाम पर मंसूरी प्रसिद्ध हो गया।

कैप्टन यंग इस पहाड़ी को देखकर ऐसा मोहित हुआ कि उसने यहां एक बंगले का निर्माण करवाया। अक्सर इस स्थान पर कैप्टन यंग से मिलने उनके मित्र आते रहते थे तो उन्होंने भी यहां एक बंगला बनवाया, बस इसी प्रकार धीरे-धीरे मसूरी बसती चली गई।

कहते हैं कि अंग्रेजों के शासन के दौरान सन 1813 में सुदर्शन शाह नामक सरदार ने देहरादून और मसूरी के इस इलाके को ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सैन्य अधिकारी मेजर हैदर हियरसे को कुछ शर्तों के आधार पर हस्तांतरित कर दिया था। सन 1814 में गोरखा और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध के बाद मसूरी का यह क्षेत्र पूरी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में आ गया।

यहां का वातावरण अंग्रेजों को अपने घर विलायत की तरह का ही लगता था।इसका कारण भी था यहां के पहाड़ों पर वैसी ही हवाएं चलती हैं जैसी कि विलायत में सुलभ थी। मसूरी एक तरह से अंग्रेजों की गृह नगरी बन गई थी। इस पहाड़ी पर अब भी उनके पुराने बंगले देखे जा सकते हैं।

मसूरी को अंग्रेजों ने बसाया था, तब यह उनका अपना नगर था। ‌ इस स्थान के प्रति उनका अपना अपनत्व था। इसके सौंदर्य को सुरक्षित रखने के लिए वे सदैव प्रयत्नशील कहते थे।

कहते हैं कि मसूरी हिमालय पर्वत श्रृंखला में सबसे हरी-भरी पहाड़ी है। मसूरी के जंगलों की हरियाली ही इसका आकर्षण था जिसे अंग्रेजों ने बड़े प्यार से संवारा था। उस समय यहां कोई एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकता था। यहां उनके समय में कोई भारी वाहन तक नहीं आने दिया जाता था। यदि कोई नियमों की अवहेलना करता था तो उस को कठोर दंड दिया जाता था।

अंग्रेजों ने इस नगर को आदर्श नगर का रूप दिया था, यहां की स्वच्छता देश भर में प्रसिद्ध थी।

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