_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मुजफ्फरनगर जनपद में मंसूरपुर कस्बेनुमा गांव
है। यह गांव मुजफ्फरनगर-मेरठ मार्ग नेशनल हाईवे 58 पर जिला मुख्यालय से 13 किलोमीटर दूर स्थित है।

यह इलाका किसी समय मुजफ्फरनगर शहर को बसाने वाले मुजफ्फर खान की शिकारगाह हुआ करता था।

यह क्षेत्र गन्ने की पैदावार के लिए प्रसिद्ध है ‌। इस इलाके में गन्ने की पैदावार का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि मीलों-मीलों तक गन्ने के खेतों के घने जंगल ही दिखाई देंगे।

अक्टूबर महीने के बाद ऊंचे-ऊंचे गन्ने के खेत चंबल के बीहड़ों की ही तरह के लगते हैं एक बार इन खेतों के अंदर कोई घुस जाए तो उसे ढूंढ पाना भी मुश्किल हो जाएगा। आसपास बसे गांव भी तब ही दिखाई देते हैं जब तक कि कोई उस गांव में न पहुंच जाए।

वर्तमान समय में मंसूरपुर प्रसिद्ध चीनी मिल के साथ-साथ तरह-तरह की अनेकों फैक्ट्रियों के लिए भी जाना जाता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में छोटे-बड़े अनेकों कल- कारखानों के होने से यह एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र भी है।

मुजफ्फरनगर शहर को आबाद करने वाले सैयद अबुल मुजफ्फर खान सन 1633 में इराक से भारत आए थे। उस समय वह यहां के बादशाह की संतानों को तालीम देने लगे और एक के बाद एक ऊंचाई हासिल करते हुए एक दिन शाहजहां के दरबार में वह बड़े ओहदेदार बन गए।

मुजफ्फरनगर शहर को आबाद करने के साथ-साथ उन्होंने यहां और भी कई गांव बसाए थे, उन्हीं में से एक मंसूरपुर गांव भी था। उनके खानदान के लोग आज भी मंसूरपुर के मोहल्ला दरबार में रहते हैं।

सैयद मुजफ्फर खान ने अपने जीवित रहते ही मंसूरपुर में अपना मकबरा बनवा लिया था। आज उसकी हालत जर्जर हो चुकी है। मकबरे के दरो दीवार टूटकर खंडहर में बदल चुके हैं। गुंबद भी झर-झर कर गिर रहा है। ऐसी स्थिति में मुजफ्फरनगर शहर को बसाने वाले सैयद अबुल मुजफ्फर अली खां का नामोनिशान तक मिट जाएगा।

मंसूरपुर में सैयद अबुल मुजफ्फर अली खां का मकबरा तो है और उसमें तीन कब्रे भी बनी हुई है लेकिन सच तो यह है कि उन कब्रों में कोई भी दफन नहीं है। खुद सैयद मुजफ्फर अली खां भी नहीं क्योंकि उनके वंशज बताते हैं कि मुजफ्फर अली का इंतकाल लाहौर में होना बताया जाता है। जबकि उन्होंने अपना मकबरा अपने जीते जी ही बनवा लिया था।

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