______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के लगभग १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मणीकूट पर्वत – ऋषिकेश-हरिद्वार

पौराणिक तीर्थ स्थल ऋषिकेश और हरिद्वार के मध्य में पावन गंगाजी बहती हैं। इन दोनों पौराणिक तीर्थस्थलों के मध्य में गंगा जी के पूर्वी भाग में पर्वतमालाओं का शिखर मणिकूट पर्वत कहलाता है। प्राचीन मान्यता एवं जन श्रुतियों के अनुसार श्रद्धालु भक्तों का विश्वास है कि यह पूरा मनिकूट पर्वत पूजनीय है। यह प्राचीन समय से चला आ रहा जनविश्वास है, ऐसा विवरण किसी पौराणिक ग्रंथ या किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता है।

श्रद्धालु भक्त इसी प्राचीन विश्वास के अनुसार मणिकूट पर्वत की परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा यात्रा दुर्गम एवं कठिन है। इसलिए इसे बहुत कम तीर्थयात्री ही कर पाते हैं।

श्रद्धालु भक्त यह परिक्रमा वट वृक्ष से आरंभ करते हैं और बिंदवासिनी मंदिर,गौहरि-बुनाव से स्वर्गाश्रम फिर यहां से लक्ष्मण झूला- पांडव गुफा से गरुड़ चट्टी और कालीकुंड होते हुए वापस हिंडोला से वटवृक्ष पहुंचकर श्रद्धालु मणिकूट पर्वत की परिक्रमा का समापन करते हैं।

इस परिक्रमा मार्ग में कई प्रसिद्ध पौराणिक स्थान है।

* पांडव गुफा-

माना जाता है द्वापर युग में भीम द्वारा यहां हनुमान जी के सानिध्य में साधना की थी।

* गरुड़ चट्टी-

गरुड़ पुराण के शुभारंभ एवं गुरु बृहस्पति के गुरुत्व प्रदान एवं साधकों के लिए साधना करने के लिए का क्षेत्र।

* फूल चट्टी-

यह स्थान योगनियों की घाटी कहलाता है और यहां मणिकूट जलधारा और हेमवती हेबल नदी का संगम होता है।

* कालीकुंड –

यहां मां भुवनेश्वरी देवी और नीलकंठ महादेव के चरणों को धोने वाली नदी का झरना व कुंड है।

* पीपलकोटी –

यह पवित्र स्थान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जी की विश्राम स्थली है।

* हिंडोला दिउली –

यह स्थान माता भुवनेश्वरी की सहयोगी दैवीय शक्तियों का हिंडोलाखाल है।

* कुशाशील –

यह स्थान माता कुष्मांडा का विचरण क्षेत्र है और परिक्रमा का विरक्त क्षेत्र।

* विंदवासिनी –

यहां माता विंदवासिनी का मंदिर है और सिंह पर सवार माता का निर्जन क्षेत्र।

* गोहरी –

यह स्थान मोक्षद्वार , मणिकूट का गंगा तट का द्वार तथा नंदी जी का प्रिय क्षेत्र है।

*वैराज –

यह स्थान शिव भक्तों के द्वारा पूजित क्षेत्र है और वीरभद्र द्वार है।

* गणेश द्वार –

यह कुंभी चौड़ी है यहां पहले समय में गणेश पूजन होता था।

* भैरवी घाटी –

यह स्थान भगवान शिव के प्रधान गणों एवं शिव भक्तों की चौरासी कुटिया का क्षेत्र है।

वर्तमान समय में जो श्रद्धालु भक्त परिक्रमा करते हैं वह पांडव गुफा से गरुड़ चट्टी, फिर वहां से फूल चट्टी-कालीकुंड होते हुए, पीपलकोटी यहां से,दिउली-तैंडो व
विंदवासिनी होते हुए, बीज नदी, यहां से गोहारी,
वैराज व कुंभीचौड से होते हुए भैरवी घाटी नीलकंठ मार्ग पर परिक्रमा का समापन करते हैं।

नीलकंठ महादेव –

मणीकूट पर्वत पर ही नीलकंठ महादेव का मंदिर है। भगवान शंकर ने जब देवताओं और दैत्यों के द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को पीकर अपने कंठ में धारण कर लिया था। उस हलाहल विष की भीषण ज्वाला को शांत करने के लिए भगवान शिव पूरे त्रिलोकी में घूमे लेकिन उनके कंठ में स्थित हलाहल विष की ज्वाला शांत नहीं हुई। बाद में जब भगवान शंकर यहां नीलकंठ पर्वत पर आए तब यहां उनके कंठ में धारण किए हुए हलाहल विष की ज्वाला शांत हुई थी। उसी समय से भगवान शंकर यहां नीलकंठ महादेव के रूप में विराजमान है।

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