_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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ठाकुरद्वारा मंदिर-चरथावल

मुजफ्फरनगर जनपद का चरथावल कस्बा छोटी काशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

सनातन धर्म के प्राचीन धर्मग्रंथों में चंद्रावल, चरित्रबल व चित्रावल जैसे कई नामों से वर्णित चरथावल कस्बा जनपद मुजफ्फरनगर में स्थित है। चरथावल की धार्मिक महत्ता का महाभारतकालीन इतिहास है। यहां क‌ई ऐसे धार्मिक स्थल है जो अन्य किसी भी जगह स्थापित नहीं हैं।

ठाकुरद्वारा मंदिर चरथावल के मौहल्ला पट्टी चौधरान में स्थित है। कई किवदंतियां एवं कथाएं इस मंदिर के बारे में बताई जाती हैं।

यहां के ठाकुरद्वारा मंदिर का संबंध श्री वृंदावन धाम के प्रसिद्ध श्री राधावल्लभ जी मंदिर एवं महाप्रभु श्रीहितहरिवंश जी से जुड़ा है।

मंदिर ठाकुरद्वारा का निर्माण कार्य पूरा हो जाने के उपरांत बताते हैं, आत्मदेव नामक ब्राह्मण को दिल्ली से बुलाकर इस मंदिर में पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। इतेहरी वंश से संबंद्ध आत्मदेव जी को धरती के गर्भ से एक अलौकिक श्री विग्रह मिला था।

उसी समय के अंतराल में श्री राधा रानी की प्रेरणा से महाप्रभु हरिवंश जी ने देववन (देवबंद) से वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में महाप्रभु हरिवंश जी रात्रि विश्राम करने के लिए चित्रावल(चरथावल) रुके।

इसी समय मंदिर ठाकुरद्वारा के पुजारी सिद्ध ब्राह्मण आत्मदेव जी को स्वप्न में आदेश हुआ कि वे अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह श्री हरिवंश जी के साथ कर दें और अपने पास के अलौकिक श्री विग्रह को भी उन्हें समर्पित कर दें।

उसी समय महाप्रभु को भी स्वप्न में श्री राधा रानी का आदेश हुआ कि वे ब्राह्मण की दोनों पुत्रियों के साथ विवाह कर लें और आत्मदेव जी से प्राप्त अलौकिक श्री विग्रह को वृंदावन धाम ले जाकर स्थापित करें।

हरिवंश महाप्रभु राधा रानी को अपने इष्ट के साथ गुरु भी मानते थे। रसिक वाणियों में यह कहा गया है कि हरिवंश जी को हित की उपाधि राधा रानी ने मंत्र दान करते समय दी थी।

हरिवंश महाप्रभु जी ने स्वप्न में प्राप्त श्री राधा रानी के आदेशानुसार आत्मदेव ब्राह्मण कि दोनों पुत्रियों के साथ विधिवत विवाह किया।

बाद में उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों और कन्यादान में प्राप्त श्री राधा वल्लभ लाल जी के अलौकिक श्री ग्रह को लेकर वृंदावन के लिए प्रस्थान किया।

वृंदावन पहुंचकर महाप्रभु श्री हित हरिवंश जी ने संवत १५६२ की कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी के दिन श्री वृंदावन धाम में श्री राधा नौवल्लभ लाल जी के श्री विग्रह को विधिवत प्रतिष्ठित किया।

आज भी वृंदावन के प्रसिद्ध श्री राधा वल्लभ लाल जी के मंदिर में वही अलौकिक श्री विग्रह विराजमान हैं।

** इस स्थान का पौराणिक संबंध है। रामायणकाल में इस स्थान का नाम चित्रावल था। रामायणकाल में भगवान राम के छोटे भाई भरत जी ने चित्रावल के टीले पर के वनों में कुछ दिन व्यतीत किए थे,वही स्थान वर्तमान समय में चरथावल के नाम से जाना जाता है।

किवदंती है कि कालांतर में चित्रावल के टीले पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया था उस मंदिर के पास में ही भरत जी की पादुकाओं के स्थल का भी निर्माण कराया गया था।

** वास्तुकला के इस बेजोड़ भव्य एवं विशाल मंदिर का निर्माण किसने कराया इस बारे में कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलता। इसके वर्तमान वास्तुशिल्प के अनुसार अनुमान है कि मुगल काल में श्री ठाकुरद्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार करके भव्यता प्रदान की गई थी। इसके बारे में एक प्रसंग किवदंती के रूप में प्रचलित है। –

* कहते हैं मुगल काल में उस समय बादशाह जहांगीर का शासन था। यह तो स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सकता कि बादशाह जहांगीर कहां किस प्रयोजन से जा रहे थे या वह कहीं से वापस राजधानी लौट रहे थे। उस यात्रा के दौरान रात्रि विश्राम के लिए बादशाह जहांगीर का पड़ाव चरथावल में हुआ था। विश्राम के बाद बादशाह जहांगीर का काफिला यहां से आगे की यात्रा के लिए रवाना हो गया।

बादशाह के काफिले के प्रस्थान के बाद इधर से गुजर रहे प्रेमराज को एक काली गठरी सी दिखाई दी। जिसमें बड़ी मात्रा में सोने की अशर्फियां आदि भरे हुए थे। प्रेमराज ने उस गठरी को उठा लिया परंतु उनका मन परेशान हो गया। वे बार-बार सोचने लगे कि इतनी धनसंपदा इस स्थान पर किसकी रह गई है।

प्रेम राज ने अंततः पता लगाया कि इस स्थान पर बादशाह जहांगीर के काफिले ने रात्रि विश्राम किया था। उसने बादशाह जहांगीर के दरबार में पहुंचकर उस गठरी को बादशाह के सामने प्रस्तुत करके सारा वृत्तांत सुनाया।

बादशाह जहांगीर प्रेमराज की इमानदारी को देखकर बहुत खुश हुआ। जहांगीर वार्तालाप के दौरान प्रेमचंद की ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा एवं तर्कबुद्धि की क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने प्रेमराज को अपने दरबार में दरोगा के पद पर पदारूढ कर दिया।

कहते हैं कि बादशाह जहांगीर के द्वारा अपनी राजधानी आगरा से एक बड़े मार्ग को बनवाने का निर्णय लिया गया। उस न‌ए बनने वाले मार्ग के बीच में आगरा के कई प्रतिष्ठित एवं प्रभावशाली व्यक्तियों के महल और भवन भी थे। बादशाह जहांगीर के फरमान को बदलवाना उन सब के लिए संभव नहीं था। बादशाह के इस निर्णय से व्यथित लोगों की दयनीय स्थिति को देखकर दरोगा प्रेमराज द्रवित हो उठे और उन्होंने उस मार्ग के बनने से प्रभावित हो रहे लोगों को एक युक्ति सुझायी।

जब दरोगा प्रेमराज की सुझायी युक्ति के अनुसार वह सब प्रतिष्ठित लोग घरों के आवश्यक सामान को लादकर रुदन की स्थिति में महल के नीचे से जा रहे थे।

एकाएक महल के नीचे से कोलाहल की स्थिति और करुण रुदन की आवाज आई, बादशाह की बेगम ने यह कर्ण विदारक दृश्य सुना और देखा। उन्होंने दरोगा प्रेमराज को तुरंत अपने सामने पेश होने का आदेश दिया और फिर प्रेमराज से इसका कारण पूछा।

दरोगा प्रेमराज ने बेगम को अपने शब्दों में ढालकर बादशाह सलामत के निर्णय के आदेश को और उसके कारण प्रभावित हो रहे प्रतिष्ठित लोगों के बारे में बतलाया।

नए मार्ग के बनने से प्रभावित होने वाले प्रतिष्ठित लोगों की बातें जानकर बादशाह की बेगम बहुत द्रवित हुई और उन्होंने कहा कि जिससे अनेकों लोग प्रभावित होते हो ऐसा राजमार्ग नहीं बनेगा। बेगम ने प्रेमराज को उन्हें अपने घरों में वापस भेजने का आदेश दे दिया।

बाद में खुश होकर सभी प्रतिष्ठित पीड़ित व्यक्तियों ने उन्हें बहुत सा धन दिया। प्रेमराज के धन नहीं लेने के बहुत अनुनय विनय के बाद भी जब वह नहीं माने तो विवश होकर आखिर में प्रेम राज को वह धन लेना पड़ा। परंतु इस धन का क्या करना चाहिए, इस असमंजस में प्रेमचंद पड़ गए। बहुत सोच-विचार के बाद प्रेमचंद ने वह सब धन खजाने में जमा करा दिया।

राजसूत्रों से बादशाह जहांगीर को मालूम हुआ कि दरोगा प्रेमराज ने बहुत सा धन खजाने में जमा कराया है। जहांगीर ने मालूम किया कि वह धन उनके द्वारा किस मद में जमा किया गया है। पूरे वाक्ये का पता चलने के बाद बादशाह प्रेमराज की इमानदारी और राज के प्रति सत्यनिष्ठा का कायल हो गया। बादशाह ने उस धन को दोगुना करके प्रेमराज को देने का आदेश दे दिया।

लेकिन उससे पहले दरोगा प्रेमराज अवकाश पर अपनी जन्मभूमि चरथावल आ चुके थे। तब बादशाह ने अपने कारिंदो को आदेश दिया की इस धन को प्रेमराज को वहीं पर जाकर उन्हें सौंप कर चले आओ।

घोड़ों और ऊंटों पर लदा हुआ वह धन जब तक चरथावल पहुंचा। उससे पहले ही दरोगा प्रेमराज अवकाश का समय बिताकर राजधानी आगरा वापस आ चुके थे।

धन लेकर आए बादशाह के आदमियों के द्वारा बहुत आग्रह करने पर भी प्रेमराज के परिजनों ने वह धन लेने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।

धन लेकर गए राज कर्मचारियों ने वापस राजधानी आगरा आकर दरबार में सारी बातें बादशाह जहांगीर को बताई। बादशाह जहांगीर परिजनों के व्यवहार और सादगीपूर्ण जीवन की बात सुनकर बहुत प्रभावित हुआ।

बादशाह ने वापस आए धन को फिर से दुगना करके दरोगा प्रेमराज से कहा कि प्रेमराज मैं तुम्हारी निष्ठा और ईमानदारी का कायल हो गया हूं। यदि इस धन को तुम अपने पास नहीं रखना चाहते तो इसे किसी अच्छे काम में लगा दो। इस आशय के साथ बादशाह के द्वारा वह सब धन फिर चरथावल ही भेज दिया गया।

धन लेकर आए बादशाह के आदमियों के बहुत आग्रह और अनुनय विनय करने करने पर भी परिजनों ने वह धन स्वीकार करना नहीं चाहा। क्योंकि वह मानते थे कि वह धन बादशाह को पता नहीं शोषण के किस तरीके से प्राप्त हुआ होगा। इसलिए हम किसी भी पुण्य या धार्मिक कार्य में इस धन को नहीं लगाएंगे। उनकी धारणा थी क्योंकि इस धन को जिस भी अच्छे कार्य में लगाया जाएगा वह सफल नहीं होगा।

नगर के प्रमुख व्यक्तियों के द्वारा कहने पर कि बार-बार धन वापस करना बादशाह के आदेश का अपमान होगा। अतः उस धन से नगर की चारदीवारी व सात कुएं खुदवाने का निर्णय लिया गया।

* इसी तरह के कथानक में एक और प्रसंग बताया जाता है जो इस प्रकार है –

बादशाह जहांगीर के शासन के पास के ही एक राज्य का शासक बहुत ही क्रूर और निर्दयी था। वह अपनी रियासत की जनता से तरह-तरह के जुल्म करके अपने खजाने को भरता रहता था। उसके अत्याचार से दुखी उसके राज्य की जनता ने अपना दुख जहांगीर के दरबार में सुनाया।

बादशाह जहांगीर ने उस क्रूर राज्य के शासन को समाप्त करने की योजना बनाई। बादशाह ने उस राज्य के खजाने को लूटने का आदेश प्रेमचंद को दिया। लेकिन प्रेमचंद ने बादशाह का आदेश मानने से इंकार कर दिया क्योंकि वह मानते थे कि यह निरीह जनता के शोषण से इकट्ठा किया गया धन था। यह जिस काम में भी लगेगा वह सफल नहीं होगा।

परंतु बादशाह ने उसके खजाने को अपना बनाने का मन बना लिया था। अतः प्रेमचंद छुट्टी लेकर अपने घर चरथावल आ गए।

बादशाह के द्वारा लूटे गए उस राज्य के खजाने के कुछ अंश को घोड़ों और ऊंटो के द्वारा प्रेमचंद के पास भेजने का निर्णय लिया। परंतु धन लेकर आए बादशाह के आदमियों के बार-बार आग्रह करने पर वह धन स्वीकार कर लिया। उस धन से सात कुएं, सात महल तथा धन बच जाने पर ठाकुरद्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया और कस्बे की चारदीवारी भी बनवाने का निर्णय लिया गया। लेकिन कस्बे की जनता ने चारदीवारी बनाने का निर्णय गलत बताकर रोक दिया गया।

इन दोनों प्रसंगों में क्या सच है यह एक अलग विषय बनता है। परंतु यह सच है कि बादशाह जहांगीर के द्वारा चरथावल धन भेजा गया था। उस धन से सात महल,सात कुएं कस्बे की चारदीवारी तथा ठाकुरद्वारा मंदिर बनवाने का निर्णय लिया गया।

यह किवदंती सत्य पर खरी है की उस धन से सात कुएं खुदवाए गए, जिनका पानी खारा निकला और पीने योग्य नहीं था।

उस धन से बनवाए गए महलों में निवास करने वालों का या तो आगे वंश ही नहीं बढ़ा या वह पूरे जीवनभर धन की तंगी को झेलते हुए दिमागी रूप से व्यथित दुखित जीवन बिताते रहे।

* मंदिर ठाकुरद्वारा के प्रांगण में स्थित रामलीला मंच से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जनता को संबोधित किया था।

रामलीला मंच के सामने एक छोटे मंच पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पादुका चिन्ह आज भी विद्यमान हैं।

*अंग्रेजों के शासन के दौरान इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था। इसके बारे में मंदिर के बाह्य द्वार पर स्थित पत्थर पर अंकित है – जहांगीर के समय में निर्मित इस पावन मंदिर ठाकुरद्वारा का जीर्णोद्धार श्री मुस्तफा सिद्दीकी (डिप्टी कलेक्टर) के संरक्षण में श्री ज्वाला प्रसाद जिलाधिकारी द्वारा कराया गया।
मुस्लिम समुदाय के डिप्टी कलेक्टर ने भी ठाकुरद्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय आर्थिक सहयोग दिया था।

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