_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

_____________________________________________

कुंभ भारतवर्ष की सनातन संस्कृति का महानतम धार्मिक पर्व और सनातन काल से चली आ रही हमारी गौरवशाली भारतीय परंपरा की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। इस महापर्व के आयोजन के पीछे सनातन धर्म के ऋषियों एवं मनीषियों की गहरी वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और विश्वबंधुत्व के सामूहिक प्रयास की भावना रही है।

प्राचीन काल से ही भारत की महान संस्कृति में तीर्थों के प्रति और वहां होने वाले पर्व विशेष के प्रति बहुत ही आदर तथा श्रद्धा भक्ति की भावना रही है। भारत की सनातन संस्कृति में किसी पुण्य पर्व धार्मिक कार्य संस्कार अनुष्ठान तथा उत्सव समारोह आदि के आयोजन मात्र प्रदर्शन के लिए या स्वयं की तुष्टि और मनोरंजन आदि की दृष्टि से नहीं के जाते अपितु ऐसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों को करने का मुख्य उद्देश्य आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की भावना होती है। इस प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान और पर्वों के आयोजन में शास्त्रों में बताई गई प्राचीन भारतीय संस्कृति की गरिमा के निर्वहन का सुप्रयास भी निहित रहता है।

प्राचीन काल में सनातन धर्म के तत्ववेता ऋषियों द्वारा मोक्ष की कामना तथा लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर गंगा आदि नदियों के तटों के पवित्र स्थलों पर ऋषि-महर्षि ,साधु-संत और विद्वतजनों का समागम राष्ट्रीय तथा पारलौकिक व्यवस्था पर विचार विमर्श करने तथा इन पवित्र स्थलों पर आयोजित पर्वों के अवसर पर ज्ञान सत्र के आयोजन, धर्मचर्चा तथा भगवत लीला के कथा प्रसंग के श्रवण हेतु था। इससे समाज में नवीन चेतना का संचार होता था और देश काल एवं वातावरण में धर्म का महत्व स्थापित होता था। इस प्रकार के आयोजन भारतीय समाज को बिग तन से बचाते थे। समाज में आत्मीयता एवं धार्मिक सौहार्द का वातावरण बनता था

ग्रह नक्षत्रों के अद्भुत संयोग से कुंभ का आयोजन बारह वर्षों के बाद अलग-अलग विशिष्ट स्थलों पर होता है। भारतवर्ष में प्रचलित सभी पर्वों में कुंभपर्व को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। ‌ कुंभ परंपरा में उत्तर एवं मध्य भारत के चार तीर्थस्थलों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एवं नासिक के साथ-साथ दक्षिण भारत के कुंभकोणम में भी बारह वर्षों के अंतराल पर कुंभ पर्व का आयोजन किया जाता है।

ज्योतिषविद्या एवं खगोलविद्या के सिद्धांतों के अनुसार बारह वर्षों के अंतराल पर आयोजित होने वाले कुंभ महापर्व में लाखों-करोड़ों आस्थावान लोग शामिल होते हैं। महाकुंभ पर्व के आकर्षण और गंगा की श्रद्धा से कोई अछूता नहीं है। नर- नारी, आबाल-वृद्ध, धनी-निर्धन सभी चुंबकीय आकर्षण की भांति गंगा तट पर स्नान करने के लिए हरिद्वार की ओर खींचे चले आते हैं। श्रद्धालुओं के लिए कुंभ में आने का कोई कष्ट मायने नहीं रखता। सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर से यात्रा कर श्रद्धालु तीर्थयात्री हरिद्वार पहुंचते हैं। इस पुण्य भूमि पर कदम रखते ही श्रद्धालु तीर्थयात्री एक अपूर्व रोमांच से भर उठता है। यह रोमांच केवल गंगा स्नान कर कुंभ महापर्व के अमृत लाभ प्राप्त करने का ही नहीं है अपितु दुर्लभ संतों के दर्शनों का भी होता है। देश का कोई ऐसा कोना या प्रांत ऐसा नहीं होता जहां से श्रद्धालु तीर्थयात्री हरिद्वार न पहुंचते हों। इतना ही नहीं विदेशी श्रद्धालु भी महाकुंभ पर्व के आकर्षण में खींचे चले आते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *