वह स्थान जहा महाभारत युद्ध के समय अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने गीता रूपी अमृत का संदेश सुनाया

 

कुरुक्षेत्र का नाम आते ही सनातन धर्म के अनुयायी के मन में श्रद्धा का ज्वार उमड़ आता है। जनमानस में उसकी पहचान महाभारत के युद्ध स्थल और उस स्थल के रूप में है जहां श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाया था।

पुराणों में कुरुक्षेत्र की महिमा का विस्तार से वर्णन है।

मत्स्य पुराण में कुरुक्षेत्र को सभी तीर्थों में श्रेष्ठ बताया गया है। इसके अनुसार महा पुण्य शाली तीर्थ कुरुक्षेत्र में प्रयाग आदि सभी तीर्थ समाहित हो जाते हैं।

धर्म शास्त्रों के अनुसार गंगा जी में केवल जल से मुक्ति होती है परंतु कुरुक्षेत्र में जल, थल और अंतरिक्ष तीनों में मुक्ति होती है।

महाभारत में बताया गया है -जो श्रद्धा पूर्वक कुरुक्षेत्र की यात्रा करता है, उसे राजसूय तथा अश्वमेघ -इन दोनों यज्ञों का एकत्र फल प्राप्त हो जाता है।

भागवत पुराण में कहा है कि -अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को अन्यतम कुरुक्षेत्र का सेवन करना चाहिए क्योंकि यहां पर किया गया धार्मिक कार्य व्यक्ति को सहस्र गुणा फल देने वाला होता है

पुराणों में बताया गया है कि कुरुक्षेत्र में दिया हुआ दान अक्षय होता है।

महाभारत, पदम पुराण तथा वामन पुराण में कहा गया है कि ब्रहम ऋषि यों से सेवित पावन कुरुक्षेत्र धर्मों की वेदी

है। जो व्यक्ति इस स्थान पर निवास करते हैं उनको किसी प्रकार का शोक नहीं होता। वे मानो स्वर्ग में निवास करते हैं।

पुराणों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को कुरुक्षेत्र में जाना चाहिए, क्योंकि कुरुक्षेत्र के दर्शन मात्र से सभी व्यक्ति पाप मुक्त हो जाते हैं।

यमुना नदी का पश्चिमी तट का भू क्षेत्र। यह एक पावन क्षेत्र है। पौराणिक काल में इस भू क्षेत्र में सरस्वती नदी के पवित्र तटों पर ऋषि यों ने सर्वप्रथम वेद मंत्रों का उच्चारण किया।

कुरुक्षेत्र को ब्रह्मा जी की वेदी कहा जाता है। ब्रह्मा जी तथा अन्यान्य देवी देवताओं ने यहां यज्ञों का आयोजन किया। इं

महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि विश्वामित्र ने इसी पवन भूभाग में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया था।

महाभारत में वर्णन है कि पावन सरस्वती नदी के तट पर ऋषि मुनि गण अपने आश्रमों में शस्त्रों विद्यार्थियों के साथ निवास करते थे तथा ये ऋषि आश्रम ही धर्म तथा संस्कृति की शिक्षा के सर्वोत्तम केंद्र थे।

कुरुक्षेत्र का ऋग्वेद और यजुर्वेद में अनेक स्थानों पर वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त अनेक पुराणों, स्मृतियों और महाभारत में इसका विस्तार से वर्णन किया गया ।

श्रीमद् भागवत के अनुसार यह स्थान भगवान विष्णु को बहुत अधिक प्रिय है। शतपथ ब्राह्मण मैं उल्लेख है कि कुरुक्षेत्र में देवी देवताओं ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था।

कुरुक्षेत्र को ब्रह्मा जी की वेदी कहा गया है

ब्रह्मा जी तथा अन्यान्य देवी देवताओं ने यहां यज्ञों का आयोजन किया।

यजुर्वेद में इसे इंद्र, विष्णु, शिव तथा अन्यान्य देवताओं की यज्ञ भूमि बता कर वर्णित किया है।

यह स्थान ब्रह्मा की उत्तर वेदी के नाम से विख्यात था।

 

वामन पुराण में विस्तार से वर्णन है –

महाराजा कुरु ने पावन सरस्वती नदी के किनारे यहीं पर सबसे पहले खेती करना आरंभ किया था। महाराजा कुरू ने अपने समस्त शरीर की बली देकर इस भूमि को कृषि योग्य बनाया था।

भगवान विष्णु ने महाराजा कुरू से अत्यंत प्रसन्न होकर उनसे उनसे वर मांगने को कहा। महाराजा कुरू ने निवेदन किया — हे भगवन ! जितनी भूमि मैंने जोती है, वह सब पुण्य क्षेत्र, धर्म क्षेत्र होकर मेरे नाम से प्रसिद्ध हो, भगवान शिव समस्त देवताओं सहित यहां वास करें तथा यहां किया हुआ स्नान, उपवास, यज्ञ, तप, शुभ और अशुभ -जो भी कर्म किया जाए वह अक्षय हो जाए ; जो भी यहां मृत्यु को प्राप्त हो, वह अपने पाप पुण्य के प्रभाव से रहित होकर स्वर्ग को प्राप्त हो।

भगवान विष्णु ने तथास्तु कहकर राजा को वरदान देकर उनके वचनों का अनुमोदन किया।

इन्हीं महाराजा   कुरू के नाम पर यह भूमि कुरुक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई।

 

आदि काल से ही कुरुक्षेत्र एक आध्यात्मिक एवं संस्कृति का क्रेंद्र रहा है। यह स्थान सनातन हिंदू धर्म के एक महान धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पवित्र भूमि दैविक

वरदानों से भरी पूरी है।

कुरुक्षेत्र का इतिहास वास्तव में संक्षिप्त रूप से भारतीय इतिहास ही है। अनेक ग्रंथों में यहां के बारे में अनगिनत कथाएं कहीं गई है।

प्राचीन कुरुक्षेत्र एक विस्तृत भू क्षेत्र था, जिसमें बहुत से शहर तथा गांव आबाद थे। यह लगभग 75 किलोमीटर लंबा तथा इतना ही चौड़ा विस्तृत भू क्षेत्र था।

पांडवों एवं कौरवों ने इसी भूमि को महा भारतीय समर का युद्ध क्षेत्र बनाया।

भगवान श्री कृष्ण ने संसार को विश्व को अपनी गीता का अमर संदेश इसी भूमि पर सुनाया।

महर्षि वेदव्यास ने इसी से संबंधित महाभारत के प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की ।

पांडवों की ओर से हस्तिनापुर की राज सभा में राजदूत के रूप में गए भगवान श्री कृष्ण को जब दंभी दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध के बिना सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से इंकार कर दिया तो दोनों ओर से युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई।

महाभारत का युद्ध जब अवश्यंभावी हो गया तो कौरवों पांडवों ने युद्ध के लिए अपने पूर्वजों की भूमि को ही चुना। यहां की भूमि इतनी कठोर पाई गई थी कि महाभारत के भयानक जनसंहार को झेल सके।

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