महाभारत महापुराण में तत्कालीन धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक आदर्शों और ऐतिहासिक घटनाओं का अमूल्य एवं अक्षय संग्रह है।

महाभारत कौरव पांडवों के पारस्परिक राजनीतिक संघर्ष का इतिहास तो है ही, परंतु साथ ही वह भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के सर्वांगीण विकास की गाथा भी है। इसमें तत्कालीन धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक, सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं का अमूल्य एवं अक्षय संग्रह है। भारतीय वीरता, साहस, शौर्य और नैतिक आदर्शों की उज्जवल गाथाएं इस महाकाव्य में है, इतिहास एवं चरित्र चित्रण की यह खान है।

भारतीय संस्कृत साहित्य की यह सर्वोत्कृष्ट कृति है। संस्कृत के कई अन्य विद्वानों तथा भारतीय भाषा के अनेक कवियों और लेखकों ने इसकी कथाओं के आधार पर अनेक ग्रंथ और काव्य लिखकर इसकी महत्ता और श्रेष्ठता मानी है। साहित्यकारों के लिए यह अनुपम काव्य ग्रंथ है। यह भारतीय साहित्य की अमर कृति है।

    महाभारत समस्त दर्शनों का सार , स्मृतियों का विवेचन ग्रंथ एवं पंचम वेद माना गया है। महाभारत में श्रेष्ठ धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों का समावेश होने से इसे हिंदू धर्म का धर्मशास्त्र और वृहत कोष कहा गया है।

कृष्ण आज भी विष्णु के अवतार माने जाते हैं, युधिष्ठिर आज भी सत्य के प्रतीक माने जाते हैं, भीष्म, अर्जुन, भीम, द्रोपदी, कुंती, विदुर, द्रोणाचार्य —–आदि की गाथाएं आज भी भारतीय जनजीवन को परिप्लावित करती है। मानव जीवन की ऐसी कोई समस्या या पहलू नहीं है जिस पर इसमें स विस्तृत विवेचना न हो।

इन श्रेष्ठ उच्च चरित्रों और उनके आदर्शों का अनुकरण कर कई व्यक्तियों ने अपने चरित्र को उन्नत किया। इसमें वर्णित श्रेष्ठ आदर्श सदियों से भारतीयों को प्रेरणा दे रहे हैं। सदियों से भारतीय अपने सुख दुख में प्रेरणा लेते रहे हैं।

भारत के बाहर जहां कहीं भी हिंदू संस्कृति का प्रसार हुआ वहां महाभारत का भी प्रसार हुआ। संपूर्ण भारत और भारत के बाहर मलाया, इंडो चीन जावा-सुमात्रा में महाभारत के अनेक दृश्य कलाकारों के विषय रहे हैं। भारतीय संस्कृति का यह प्रकाश -स्तंभ है जिसके पुनीत आलोक में सनातन संस्कृति का भव्य रूप दृष्टिगोचर होता है।

० भारत के बाहर कंबोडिया में पांचवी और छठी शताब्दियों के शिलालेखों में महाभारत का धार्मिक ग्रंथ के रूप में उल्लेख मिलता है।

 

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