__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १००कि.मी.के दायरें में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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महाभारत काल के महान योद्धा बर्बरीक की पौराणिक कथा बहुत ही रोचक है।

महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था। पांडवों को भगवान श्री कृष्ण का साथ मिला हुआ था और यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरवों के पास भले ही सेना अधिक शक्तिशाली और अधिक संख्या में हो लेकिन जीत पांडवों की ही होगी।

महाभारत युद्ध कौरवों और पांडवों के मध्य होना अपरिहार्य हो गया था। कुरुक्षेत्र में होने वाले इस महायुद्ध में सभी द्वीप-देशों के राजा वीर योद्धा इकट्ठा हो रहे थे। ऐसे समय में यह समाचार बर्बरीक को भी प्राप्त हुआ। चौदह वर्षीय धनुर्धर बर्बरीक की भी महाभारत के महासमर में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई।

बर्बरीक महाबली पांडव भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे।

दुर्योधन से जुए में हारने के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला था। पांडव बारह वर्षों के वनवास के दौरान वनों में रह रहे थे। वनवास में महाबली भीम पर अनार्य राक्षसी हिडिंबा आकर्षित हुई। हिडिंबा ने भीम से एक निश्चित अवधि के विवाह और संतान की इच्छा प्रकट की।

हिडिंबा के एक पुत्र पैदा हुआ। जन्म के समय सिर पर केशों के न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। घटोत्कच का विवाह प्रागज्योतिषपुर की राजकुमारी कामकटंकटा से हुआ। घटोत्कच का पुत्र कड़े और बर्बराकार घुंघराले बालों वाला पैदा हुआ। कड़े और घुंघराले बालों से उसका नाम बर्बरीक अर्थात बब्रुवाहन रखा गया। भगवान श्री कृष्ण ने भी भीम के पौत्र बर्बरीक को नया नाम सुहृदय दिया।

बाल्यकाल से ही बहुत वीर और महान योद्धा बर्बरीक ने युद्ध कला अपनी मां से सीखी थी। बर्बरीक ने गुप्ततीर्थ क्षेत्र में कठोर तप और साधन‌ओं से अनेक सिद्धियां और दिव्यास्त्र प्राप्त किए। उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न कर उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त करके ‘तीनबाणधारी’का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव ने भी उन्हें प्रसन्न होकर धनुष प्रदान किया था जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था।

उनकी मां ने उन्हें हमेशा कमजोर और हारने वाले की तरफ से लड़ने की शिक्षा दी थी और वह हमेशा इसी सिद्धांत पर लड़ते भी थे।

बर्बरीक महाभारत के युद्ध में शामिल होने के लिए चलने से पहले अपनी माता से आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचे तब उन्होंने अपनी मां को वचन दिया की युद्ध में जो पक्ष कमजोर और हार रहा होगा वह उनकी ओर से लड़ेगें। अपने लीले घोड़े, जिस का रंग नीला था पर सवार होकर बर्बरीक अपने तूणीर में तीनों बाण और धनुष के साथ महाभारत की युद्धभूमि कुरुक्षेत्र की ओर अग्रसर हुए।

कुरुक्षेत्र पहुंचते-पहुंचते रात होने पर वह एक चट्टान पर सो गए। सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने चट्टान पर समाए न समा रहे घुंघराले बाल वाले दैत्याकार अकेले एक योद्धा को देखा। जिसके पास केवल मात्र तीन बाण चौंकाने वाले थे। उसकी श्वासों से कांपती चट्टान को देखकर कर श्रीकृष्ण ने उसका परिचय जानना उचित समझा। जब वह तरुण योद्धा बर्बरीक जागा तो एक ब्राह्मण का वेश धारण किए श्रीकृष्ण ने उससे पूछा कि वह कहां जा रहा है। स्वाभाविक उत्तर मिला कि वह कुरुक्षेत्र जा रहा है। श्री कृष्ण ने उस तरुण योद्धा से पूछा कि वह किसके पक्ष में लड़ेगा। बर्बरीक ने ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण को बताया कि वे हारने वाले पक्ष की और से लड़ेगा क्योंकि उन्हें ही उसकी आवश्यकता होगी।

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के तुणीर में केवल तीन बाण होने पर हंसकर पूछा कि उसके पास केवल तीन बाण हैं। उनसे वह महाभारत के युद्ध में भला कैसे लड़ेगा? श्री कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि उसके पास यह अजेय बाण हैं। वह एक बार में ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है, और सारी सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान उसके तरकश में लौट आएगा, और यदि तीनों बाणो का प्रयोग युद्धभूमि में किया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा। उसने यह भी बताया कि उसे शत्रुओं के मर्मस्थल को जानने की सिद्धि हासिल है।

बर्बरीक के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण ने उसकी परीक्षा लेनी चाही और उनसे कहा कि हम दोनों जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं, इस घने पीपल के वृक्ष के सभी पत्तों को एक ही बाण से भेद कर दिखाओ तो मैं मान जाऊंगा कि हां तुम एक ही बाण से महाभारत के युद्ध का परिणाम बदल सकते हो। बर्बरीक ने श्रीकृष्ण की चुनौती को स्वीकार करके, भगवान का स्मरण कर बाण पीपल के वृक्ष के पत्तों की ओर चला दिया। बाण पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे धरती पर गिरे हुए पत्तों को भी छेद कर भगवान श्री कृष्ण के कदमों की ओर बढ़ा और उनके पैरों के चारों ओर घूमने लगा क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने एक पत्ता अपने पैरों के नीचे छुपा लिया था। तब श्रीकृष्ण को अपना पैर हटाना पड़ा। उग्र प्रचंड समुद्री तूफान की हुंकार भरते हुए बाण तरकस में लौट आया।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे की जीत पांडवों की ही होगी और यह देख कर भगवान श्री कृष्ण समझ गए की निश्चय ही कौरवों की हार के बाद माता को दिए वचन के अनुसार बर्बरीक कौरवों की और से लड़ेगा, पांडव बर्बरीक से जीत नहीं पाएंगे। जिससे अधर्म की जीत हो जाएगी

बर्बरीक की शक्ति का परिचय प्राप्त कर और अपनी कूटनीति और बुद्धि कौशल से योजना बनाकर ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान की अभिलाषा प्रकट की, इस पर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वह उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ हुआ तो अवश्य करेगा। तब काफी सकुचाते हुए श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया।

बर्बरीक समझ गए कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता, यह कोई महापुरुष हैं। उन्होंने कहा कि वह शीश देकर महाभारत का युद्ध कैसे देख पाएगा। वह शुरू से अंत तक महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं। उनका यहां आना बेकार जाएगा। बर्बरीक ने ब्राह्मण से कहा कि वह अपना वास्तविक परिचय दें।

इस पर श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं। बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से उनके विराट स्वरूप के दर्शन कराने के लिए कहा। श्री कृष्ण ने बर्बरीक की इच्छा पूरी की उन्हें अपने विराट स्वरूप के दर्शन कराए और आशीर्वाद दिया ‘कलियुग’ में तुम्हें बर्बरीक बभ्रुवाहन श्याम के नाम से पूजा जाएगा।

फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया।।बर्बरीक का सिर सुदर्शन चक्र से काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया। महाभारत युद्ध की समाप्ति तक युद्ध देखने की उनकी कामना श्रीकृष्ण के वरदान से पूर्ण हुई। उनका सिर युद्ध भूमि के समीप एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर सुशोभित किया गया। जहां से बर्बरीक का कटा सिर अठारह दिन तक कुरुक्षेत्र में हुए संपूर्ण महाभारत के युद्ध को देखता रहा और वीर गर्जना करता रहा।

पौराणिक आख्यान में बताया गया है कि महाभारत के युद्ध के समय पांडवों और कौरवों के महारथियों द्वारा चालाकी से एक दूसरे को मारने के समय बर्बरीक का सिर जोर से हंसता। उनकी इस हंसी की तुलना भूकंप के झटकों और ज्वालामुखी के फटने की दहलाने वाली आवाज से की गई है।

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों में ही विवाद होने लगा की युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है। किसका योगदान अधिक है तब श्री कृष्ण ने गर्वित पांडवों से कहा कि इसका निर्णय बर्बरीक करेंगे जो संपूर्ण महाभारत युद्ध के दृष्टा हैं। पांडव श्री कृष्ण सहित पर्वत शिखर पर हंसते बर्बरीक बभ्रुवाहन के पास गए और उनसे इस बारे में जानना चाहा।

बर्बरीक के सिर ने कहा कि उसने ‘संपूर्ण महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र को वीरों के सिर काटते व द्रोपदी के खप्पर को रक्त भरते हुए देखा। श्री कृष्ण ही युद्ध कर रहे थे और श्रीकृष्ण ही सेना का संहार कर रहे थे। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें केवल युद्धभूमि ने सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखाई दे रहा था। जो शत्रु सेना का संहार कर रहा था, जीत तो वास्तव में सुदर्शन चक्र की ही हुई।’

यह सुनते ही पांडवों का सारा गर्व चूर-चूर हो गया। बाद में हंसते हुए बर्बरीक बभ्रुवाहन के सिर को खाटू में पधारा गया। उनका धड़ रींगस में और चरण जैसलमेर के रामदेवरा में गए।

बर्बरीक को ही बभ्रुवाहन और खाटू श्याम जी कहा जाता है। खाटूश्याम जी महाभारत के तटस्थ दृष्टा और योद्धा बर्बरीक के हंसते सिर वाला पवित्र स्थल है। यहां बभ्रुवाहन का हंसता सिर कलात्मक संगमरमरी शिल्प के देवरे में स्थापित है। जहां लोक संगीत की रसधारा बहाते श्रद्धालु पदयात्रियों का अपने ‘हारे के सहारे’ खाटूश्याम के दर्शन करने के लिए तांता लगा रहता है।

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