__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सतकुंभा तीर्थ –

यह तीर्थ स्थान हरियाणा के यमुनानगर जनपद के उत्तरी सीमा क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश के कालाअंब के निकट झंडा गांव के पास ऊंची पहाड़ी के ऊपर अवस्थित है। इसका वर्णन स्कंद पुराण में और महाभारत में भी है। यहां पर पंचमुखी शिवलिंग के भी दर्शन होते हैं।

सतकुंभा तीर्थ एक महाभारतकालीन तीर्थ स्थान है। किंवदंतियों के अनुसार कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने पांडव भाइयों के साथ हस्तिनापुर पर बहुत वर्षों तक राज्य किया। उसके उपरांत अभिमन्यु के पुत्र एवं अर्जुन के पौत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का राज्य सौंपकर पांचो पांडव भाइयों ने द्रौपदी सहित स्वर्गारोहण के लिए हिमालय जाने के लिए प्रस्थान किया।

हिमालय में जाने से पहले पांडवों ने मन में विचार किया कि उन्होंने कुरुक्षेत्र के महाभारत के युद्ध में अपने कुल के सदस्यों सहित न जाने कितने वीरों का जाने- अनजाने में रक्त बहाया है, उस पाप का प्रायश्चित किस प्रकार हो?

किसी संत ने उन्हें बताया कि यदि सभी पांडव एक साथ फाल्गुन मास की अमावस्या से पहले ७ नदियों के जल में स्नान कर ले तो उनके युद्ध के समय किए गए सभी पापों का प्रायश्चित हो जाएगा लेकिन उस दिन एकत्रित जल में पांचों पांडवों से पहले और कोई भी स्नान न करें।
संत के कथनानुसार सभी पांडव भाई निश्चित तिथि फाल्गुन मास की अमावस्या के दिन प्रातः काल के समय ७ नदियों के जल को एकत्रित करने के लिए जिस भी नदी के तट पर जाते वहां भगवान शंकर को उनसे भी पहले अपने कमंडल में जल इकट्ठा करते हुए पाते।
सभी पांडवों ने मन में विचार आया कि यदि भगवान शंकर ऐसे ही उनसे पहले नदी का जल एकत्रित करते रहेंगे तो उन्हें फिर से अगले एक वर्ष तक फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि की प्रतीक्षा करनी होगी, परंतु पांडव अगले एक वर्ष तक प्रतीक्षा नहीं करना चाहते थे।

पांडवों ने भगवान शंकर से ही उनके एकत्रित किए हुए जल को छीन लेने का निश्चय किया। इसके लिए पांडवों ने भगवान शंकर का पीछा किया और उनका पीछा करते- करते सभी पांडव शिवालिक की इन्हीं पहाड़ियों में आ गए।
उस समय इस स्थान पर एक चरवाहा अपने पशुओं को घास चरा रहा था। कहा जाता है कि भगवान शंकर ने पांडवों को भ्रमित करने के लिए एक भैंसे का रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर पांडवों की आंखों से ओझल हो गए परंतु भीम की दृष्टि उस स्थान पर घास चर रहे पशुओं के बीच एक भैंसे के ऊपर रखे हुए कमंडल पर पड़ी। भीम ने मन में विचार किया कि यह कमंडल भगवान शंकर का ही है और उन्होंने इस समय‌ एक भैंसे का रूप धारण कर लिया है।

भीम उस स्थान पर स्थित संकरी घाटी के दोनों और अपने घुटने रख कर लेट गए इसी से आज भी इस स्थान को ‘गोडाडाहनी’के नाम से जाना जाता है।

भीम को देखकर भैंसे का रूप धारण किए हुए शंकर जी पीछे की ओर दौड़ने लगे। सभी पांडवों ने एक पहाड़ी स्थान पर उन्हें पकड़ लिया लेकिन उनका कमंडल एक पत्थर पर गिर कर टूट गया।
भगवान शंकर ने अपने वास्तविक रूप में आकर पांडवों को आशीर्वाद दिया तब पांडवों ने भगवान शंकर को बताया कि उनका सारा परिश्रम निष्फल हो गया अब उन्हें एक और वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पडेगी।
भगवान शंकर ने पांडवों को आश्वस्त करते हुए कहा कि तुम्हें एक और वर्ष तक प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, कमंडल में एकत्रित यह सात नदियों का जल यहां पाषाण पर गिरकर भी कभी समाप्त नहीं होगा। सभी पांडव मिलकर इस जल में स्नान करो और हिमालय की यात्रा पर जाओ। पांडवों ने उस जल में स्नान करके हिमालय की ओर प्रस्थान किया

मान्यता है कि उसी समय से ही पाषाण से यह सात धाराएं अविरल बहती चली आ रही हैं। जब अन्य सब स्थानों पर तालाब कुएं आदि सूख जाते हैं, उस समय भी यह सात धाराएं निरंतर बहती रहती हैं।

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