_____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र_

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लोनी जनपद गाजियाबाद में दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसा एक घनी आबादी वाला कस्बा है। यह गाजियाबाद जिले की एक तहसील है। दिल्ली से सहारनपुर जाने वाले रास्ते पर उत्तर दिशा की ओर स्थित लोनी शहर गाजियाबाद से 15 किलोमीटर दूर पड़ता है।

आजकल लोनी कहे जाने वाले इस पौराणिक क्षेत्र का नाम लोनी पडने के पीछे कई मान्यताएं हैं।

किंवदंतियों के अनुसार लोनी गांव का अस्तित्व भगवान राम के समय में भी था। उस समय इस स्थान पर लवणासुर नामक दानव का राज चलता था। लवणासुर ने यहां के राजा लोककर्ण जिन्हें शुभकर्म भी कहा जाता था, को परास्त करके उनके महल और राज्य पर कब्जा कर लिया था।

लवणासुर के आतंक के कारण यहां कोई भी वैदिक कर्मकांड और अनुष्ठान पर रोक थी। लवणासुर की क्रूरता के चलते साधु- संत व अन्य लोग उससे तंग थे। लवणासुर के आतंक से आमजन को छुटकारा दिलाने के लिए भगवान राम ने अपने सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न को लवणासुर का सहार करने के लिए अ यहां भेज कर उसके आतंक को समाप्त कराया था।

एक दंतकथा के अनुसार लोन्न नाम के राजा ने इस नगर की स्थापना की थी और यहां एक किले का निर्माण कराया था।

यह भी बताते हैं कि प्राचीन काल में इस स्थान का नाम लवणम था। लवण संस्कृत का शब्द है। संस्कृत में नमक को लवण कहा जाता है। कहते हैं यहां की जमीन में नमक की मात्रा अन्य स्थानों से अधिक पाई जाती है। इसलिए नमकीन स्थान या क्षेत्र होने के कारण इस स्थान को लवणम कहा जाने लगा। समय बीतने के साथ बोलने में सुविधानुसार यह लवणम से लोन व लोनी बन गया।

इस क्षेत्र के बारे में यह भी मान्यता है कि कौरवों द्वारा पांडवों को लाक्षागृह में षड्यंत्र से जलाकर मार डालने से बचने के बाद पांडव यहां के घने वनों में कुछ समय रहे थे। उस समय यह स्थान लवणम के नाम से जाना जाता था।

गाजियाबाद के मोहन नगर से लगभग 2 किलोमीटर उत्तर में हिंडन नदी के तट पर भारतीय पुरातत्व द्वारा कासेरी नामक टीले पर किए गए उत्खनन से लोनी, गाजियाबाद और इस क्षेत्र के विभिन्न पौराणिक तथ्यों के आधार पर जो प्रमाण मिले हैं। उनसे पता चलता है कि हमारी पौराणिक युग की वह सभ्यता यहां लगभग 2500 ईसा पूर्व तक भी मौजूद थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को मिले साक्ष्यों के आधार पर यह साबित हुआ है कि पौराणिक रूप से आहार क्षेत्र, गढ़मुक्तेश्वर, ऊंठगांव सहित यहां के अन्य कुछ इलाके भी महाभारत युग से जुड़े हुए हैं और लोनी के उसके किले और रामायण काल के लवणासुर की कथा पर मुहर लगाते हैं। इसके अलावा ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर सबसे बड़े सबूत गाजियाबाद के गजेटियर में भी लोनी के किले का नाम लवणासुर ही बताया गया है।

चौथी शताब्दी के समय सम्राट समुद्रगुप्त ने यहां के कोटकुलजम को यानी कोट वंश के राजा को भयंकर युद्ध में हराकर विजय प्राप्त की थी। इतिहास में आज भी उस युद्ध को कोट के युद्ध के रूप में जाना जाता है। सम्राट समुद्रगुप्त ने अपनी उस विजय के बाद यहां अश्वमेघ यज्ञ भी करवाया था।

 

12 वीं शताब्दी के समय यह स्थान चौहान वंश के महान राजा पृथ्वीराज चौहान के शासन का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र और प्रमुख हिस्सा हुआ करता था। अपने शासनकाल में पृथ्वीराज चौहान लोनी के समुद्रगुप्त काल के किले और गाजियाबाद के कोट वंशीय किले का भी जीर्णोद्धार कराया था।

पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के उस किले के अवशेष आज भी लोनी में देखे जा सकते हैं।

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद यहां का शासन दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों के कब्जे में आ गया।

भारतीय इतिहास के कुख्यात अफगानी क्रूर लुटेरे तैमूर ने भी भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्से में जबरन प्रवेश करके, इसी क्षेत्र से आते हुए दिल्ली सल्तनत पर हमला किया था। तैमूर ने भारत में अपनी लड़ाई शुरू करते हुए लोनी के उसी किले में उत्पात मचाते हुए सभी कीमती वस्तुओं को लूट लिया और किले के मुख्य हिस्से को ध्वस्त करवा दिया।

बाद में इस क्षेत्र पर मुगलों का शासन रहा सन 1789 में दिल्ली पर शासन करने वाले बादशाह ने यहां के किले में क‌ई तरह के बदलाव करवाए। उसने इस किले में एक पिछाड़े और‌ एक जलाशय का निर्माण करवाकर तथा इस किले की ईटों और अन्य सामानों का इस्तेमाल भी अन्य निर्माण कार्यों में करवाकर इस किले का मूल इतिहास ही नष्ट करवा दिया।

मुगल शासन के दौरान लोनी और गाजियाबाद का पूरा क्षेत्र मुस्लिम शासकों के लिए सुकून – आराम, अय्याशी और शिकार के लिए पसंदीदा स्थान के रूप में बहुत लोकप्रिय था।

दिल्ली के नजदीक होने के कारण यह क्षेत्र किसी भी युद्ध – लड़ाई के समय लड़ाई के मैदान के रूप में तब्दील हो जाया करता था।

अंग्रेजी शासनकाल के दौरान क्रांतिकारियों ने भी यहां इस किले में कई बार गुप्त रूप से इकट्ठे होकर योजनाएं बनाई और बाद में उन्हें अंजाम तक पहुंचाया।

बाद में अंग्रेजों ने इन बागों को हथिया लिया और मेरठ के एक शेख इलाही बख्श को बेच दिया।

लोनी के प्राचीन ऐतिहासिक स्थानों की बात की जाए तो पृथ्वीराज चौहान के बनवाए किले के बचे-खुचे हिस्सों को आज भी यहां देखा जा सकता है। पृथ्वीराज के किले के अवशेषों को देखने के लिए आतुर बहुत से पर्यटक आज भी यहां आते हैं।

मुगल काल में बनाए गए खजरनी बाग, अलदीपुर बाग और रानप बाग आज भी यहां देखे जा सकते हैं। पहले दो बाग आखिरी मुगल बादशाहा बहादुर शाह जफर की बेगम जीनत महल ने लगवाए थे जिन्हें अंग्रेजों ने बेच दिया था।अबादी बाग के नाम से मशहूर रानप बाग की आकर्षक दीवारों को यहां के स्थानीय लोगों ने काफी नुकसान पहुंचाया लेकिन आज भी इसके कुछ भाग देखे जा सकते हैं।

सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन लोनी का इतिहास अपने आप में अनूठा है।

 

 

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