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यहीं संभल में कलयुग के अंत में भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा।

सनातन धर्म में कल्कि को भगवान विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, पृथ्वी पर जब पाप की सीमा पार होने लगेगी, तब दुष्टों के संहार के लिए भगवान विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा।

भागवत पुराण के १२वें स्कंध के अध्या २ में कल्कि अवतार की कथा विस्तार से बताई गई है। जिसके अनुसार इसी संभल ग्राम में भगवान विष्णु का अंश रूप में कल्कि अवतार होगा।

गंगा-यमुना की धरती के महाभारत क्षेत्र के इस संभल नगर का सतयुग में नाम ‘सत्यव्रत’ था, त्रेता में ‘महद्गिरि’, द्वापर में इसका नाम ‘पिङ्गल’ और कलयुग में ‘संभल’ है।

यह एक पौराणिक तीर्थ स्थल है। पुराणों में इस स्थान पर ६८ तीर्थ और १९ कूप का वर्णन है।

संभल में तीन मुख्य शिवलिंग बताए गए हैं –

पूर्व में चंद्रेश्वर महादेव, उत्तर में भुवनेश्वर महादेव और दक्षिण में सम्भलेश्वर महादेव ।

प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल चतुर्थी और पंचमी को संभल के इन तीर्थों और कूपों की  परिक्रमा दी जाती है। यह परिक्रमा २४कोस(७२ किमी) लंबी होती है। इस परिक्रमा को देने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

यहां के प्रत्येक तीर्थ के दर्शन और स्नान तथा प्रत्येक कूप की यात्रा भाद्रपद मास में होती है। इस यात्रा को   ‘बनकरना ‘ कहां जाता है।

संभल पौराणिक एवं ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। शताब्दियों तक इस नगर पर विदेशी हमलावरों ने आक्रमण किए और इस नगर को तहस-नहस किया।

संभल का एक इलाका ऊपरी कोट कहलाता है। जो पुराने जमाने की खासी ऊंची टेकरी है। इस अपरकोट की परत दर परत में हजारों वर्ष पुरानी कई सभ्यताओं का बेशकीमती इतिहास छिपा हुआ है। इस इलाके ने शताब्दियों तक कितने ही युद्ध देखे हैं।

12 वीं शताब्दी के दौरान पहले यह नगर दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की राजधानी था। बाद में पृथ्वीराज अपनी राजधानी दिल्ली ले जाने के बाद यह उसके राज्य का महत्वपूर्ण आउटपोस्ट बन गया। उस समय आल्हा- उदल यहां के प्रमुख रक्षक थे। कहते हैं कि उदल ने एक ही छलांग में एक दीवार पर चक्की का एक पाट टांग  दिया था।  आज भी दीवार पर चक्की का पाट टंगा है। आल्हा उदल की शौर्य गाथा आज भी गाई जाती है।

पृथ्वीराज चौहान के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने यहां दो भयंकर युद्ध सैयद सालार मसूद के खिलाफ लड़े थे। इस बात के कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है और व्यापक रूप से यह एक किवदंती के रूप में माना जाता है।

बाद में कई मुस्लिम सुल्तानों ने यहां आक्रमण कर इसे अपनी सल्तनत में शामिल किया। यहां के प्राचीन पौराणिक मंदिरों को ध्वंस कर उनका रूप परिवर्तन किया।

यहां एक अति विशाल अति विशाल और प्राचीन मंदिर है जो हरिहर मंदिर कहलाता है। परंतु इस समय उसका रूप परिवर्तित कर दिया गया है।

श्री कल्की विष्णु मंदिर  –

इस प्राचीन श्री काल्कि विष्णु मंदिर के इतिहास से कुछ बहुत ही रोचक व अनोखी बातें जुड़ी  हैं। यह मंदिर अपने वास्तु शास्त्र, अपने श्री विग्रह, अपनी वाटिका, इस मंदिर के साथ स्थित भगवान शिव के कल्केश्वर रुप और मंदिर के शिखर पर बैठने वाले तोतों के कारण के कारण अद्भुत है। मंदिर में विराजमान  श्री विग्रह के वक्ष स्थल से निकलता तेज अलौकिक एवं दर्शनीय है। मुख्य मंदिर के निकट ही स्थित शिवालय में भगवान शंकर की मूछों वाली प्रतिमा भी अपने आप में अकेली है।

संभल की तरह ही यह मंदिर भी पौराणिक है। संभल नगर के केंद्र में स्थित इस मंदिर का उल्लेख पौराणिक तीर्थों मंदिरों और कूपों साथ मनुश्री कल्कि मंदिर के नाम से किया गया है।

श्री कल्की विष्णु मंदिर का वर्तमान स्थिति का संबंध होलकर साम्राज्य से है। बताते हैं एक समय रामपुर रियासत के नवाब के निमंत्रण पर  इंदौर रियासत के राजा अपने दल  के साथ रामपुर जा रहे थे। लेकिन मार्ग के बीच उनका दल रास्ता भटक गया और वह संभल के निकट पहुंच गया। उधर से गुजर रहे एक ब्राह्मण को मंत्री जी ने बुलाकर राजा के समक्ष मार्ग के विषय में जानकारी प्राप्त की। बाद में राजा ने उस ब्राह्मण से उनका परिचय पूछा और यह पूछा कि वह क्या कार्य करते हैं। तब ब्राह्मण ने अपना नाम व पता बताने के साथ कहा कि वह ज्योतिष का कार्य करते हैं। उन ब्राह्मण के ज्योतिषी का कार्य करने पर राजा ने उनसे कहा की वह उनकी रामपुर यात्रा के संबंध में कुछ बताएं। इस पर पंडित जी ने इंदौर के राजा को बताया कि उनके रामपुर यात्रा के प्रवास की समाप्ति पर रामपुर के नवाब उन्हें एक भूरे रंग का हाथी भेंट में देंगे।

इसके बाद इंदौर के राजा रामपुर पहुंचे। विधि का अद्भुत संयोग इंदौर के राजा की रामपुर की यात्रा समाप्ति पर विदाई के समय रामपुर के नवाब ने उन्हें भूरे रंग का हाथी भेंट में दिया। राजा बहुत विस्मित होकर उन्हीं पंडित के विषय में सोचने लगे। लौटते समय राजा अपने पूरे दल के साथ संभल पहुंचे और अपने मंत्री के द्वारा उन पंडित को खोज कर बुलाया। राजा ने उनसे कहा कि हे ब्राह्मण श्रेष्ठ आपकी कही भविष्यवाणी बिल्कुल सत्य हुई। नवाब रामपुर ने हमें भूरे रंग का हाथी ही भेंट में दिया है। हम आपकी ज्योतिष विद्या से बहुत प्रभावित हैं और चाहते हैं कि आप सपरिवार हमारे साथ इंदौर चलें और वहां हमारे राज ज्योतिषी बन कर रहें। राजा के बहुत आग्रह करने पर वह ब्राह्मण राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर उनके साथ सपरिवार इंदौर आ गए। इंदौर रियासत में रहते हुए उनका काफी समय व्यतीत हुआ। राजा के देहांत के बाद महारानी ने इंदौर राज्य का शासन स्वयं संभाला।

काफी समय बीतने के बाद उन पंडित को अपने जन्म स्थान संभल की स्मृति प्रबल हो उठी और उन्होंने महारानी से वहां जाने की अनुमति मांगी। महारानी ने उन्हें संभल जाने की अनुमति देते हुए कहा कि वह अपने गृह नगर के लिए कुछ मांगना चाहते हैं तो बताएं। पंडित ने तब महारानी से कहा अगर आप कुछ देना ही चाहती हैं, तो संभल के प्राचीन पौराणिक  कल्कि मंदिर का जीर्णोद्धार करवा दें। महारानी ने पंडित की बात को मानकर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और इस प्रकार पौराणिक श्री कल्की विष्णु मंदिर ने अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया।

 

 

 

 

 

 

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