_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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भागवत कथा – मोक्ष की भूमि
जहां शुकदेव देव जी ने राजा परीक्षति को 7 दिन श्रीमद भागवत कथा सुनाई।

शुक तीर्थ (जनपद मुजफ्फरनगर)

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ऋषियों – महऋषियों – सिद्ध संत-महात्माओं की तपोस्थली रहा शुकतीर्थ (जो पहले शुक्रताल के नाम से जाना जाता था) श्रीमद् भागवत कथा की उद्गम स्थली है।शुकतीर्थ को पुराणों के अनुसार सनातन धर्म के मोक्ष दायक अड़सठ तीर्थों में से सर्वश्रेष्ठ मोक्ष दायक तीर्थ स्थान माना गया है।
पांडवों में अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र महाराजा परीक्षित को इसी स्थान पर मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
इसी स्थान पर वट वृक्ष के नीचे बैठकर महर्षि शुकदेव ने महाराजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा का उपदेश सुनाकर मानव मात्र को भक्ति ज्ञान और वैराग्य के द्वारा ईश्वर प्राप्ति का सुलभ मार्ग बताया था।

मान्यता है कि महर्षि शुकदेव जी आज भी यहां प्रत्यक्ष रूप में है।

महर्षि शुकदेव ने इसी पावन स्थान पर जिस वटवृक्ष के नीचे राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई थी, वह अत्यंत प्राचीन कालीन वटवृक्ष आज भी मौजूद है। श्रीमद्भागवत
कथा की बही अमृत की रसधार से यह वट वृक्ष भी अमर हो गया।

भगवान श्री कृष्ण इस धरा धाम से अपने धाम पधार गए थे। वीर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का राज पाट सौंप कर पांचो पांडव द्रोपदी सहित स्वर्गारोहण को चले गए थे। महाराजा परीक्षित संपूर्ण पृथ्वी का एक क्षत्र शासन कर रहे थे ।
एक दिन राजा परीक्षित धनुष बाण लेकर शिकारार्थ वन गए। उस समय कलयुग का प्रादुर्भाव हो चुका था। कलियुग द्वारा प्रार्थना किए जाने पर राजा परीक्षित ने अपने राज्य में उसे केवल पांच स्थान रहने के लिए दिए थे, जिनमें से एक स्वर्ण भी था।कलियुग ने सर्वप्रथम राजा परीक्षित के धारण किए हुए स्वर्ण मुकुट में ही वास किया था।

राजा परीक्षित वन में शिकार को ढूंढते हुए दूर तक निकल जाने पर भूख प्यास से व्याकुल थे, उन्हें बड़ी जोर से प्यास लगी थी। राजा जल को खोजते खोजते शमिक ऋषि के आश्रम में पहुंचे। राजा परीक्षित ने ऋषि से पीने के लिए पानी मांगा। ऋषि शमिक इंद्रिय, प्राण, मन और बुद्धि के निरुद्ध हो जाने से संसार से ऊपर उठ गए थे। वे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति-इन तीनों अवस्थाओं से परे निर्विकार भाव से आंखे बंद किए समाधि में बैठे थे। अतः उन्होंने राजा द्वारा जल मांगने पर कोई उत्तर न दिया। राजा का गला प्यास से सुखा जा रहा था। किसी ने उन्हें भूमि पर भी बैठने के लिए नहीं कहा और न ही उन्हें सत्कार प्राप्त हुआ।
कहते हैं कि राजा परीक्षित उस समय सोने का मुकुट धारण किए हुए थे। अतः सिर पर स्वर्ण मुकुट धारण किए हुए होने से उसके कलियुगी प्रभाव के कारण राजा की बुद्धि विचलित हो गई थी। उन्हें अच्छे बुरे का विवेक नहीं रहा था।
उस समय राजा परीक्षित भूख प्यास के कष्ट को सहन नहीं कर पा रहे थे। इसलिए एकाएक उन्हें ऋषि के प्रति ईर्ष्या और क्रोध उत्पन्न हो गया। वहां से लौटते समय राजा ने पास ही एक मरा सांप पड़ा देखा। स्वर्ण मुकुट के प्रभाव एवं
कलियुगी बुद्धि होने से उनके मन में अनर्थकारी विचार उठा और उन्होंने अपने धनुष के अग्र भाग से वह मरा सांप उठाकर महर्षि शमिक के गले में डाल दिया और अपनी राजधानी को लौट गए।
महर्षि शमिक के तेजस्वी पुत्र श्रृंगी ऋषि जो अभी छोटे बालक ही थे अन्य ऋषि कुमारों के साथ कौशिकी नदी के तट पर खेल रहे थे। जब कुछ बालको के द्वारा अपने पिता शमिक का राजा द्वारा अपमानित होने का समाचार सुना, तो उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने योग बल से संपूर्ण बातों को जान लिया। क्रोध से उनके नेत्र लाल हो गए। उस ऋषि कुमार ने कौशिकी नदी के जल से आचमन करके राजा परीक्षित को शाप दे दिया, अपनी वाणी रूपी कठोर शब्दों का प्रहार करते हुए इस प्रकार कहा-

क़ुलाड्गार राजा ने मेरे पिता का अपमान करके मर्यादा का उल्लंघन किया है। इसलिए आज से सातवें दिन मेरी प्रेरणा से तक्षक नाग उसे डस लेगा, जिससे वह मर जाएगा।
(भागवत पुराण)
इसके पश्चात ऋषि कुमार श्रृंगी अपने आश्रम आए और पिता के गले में मरा सांप पड़ा देख दुखी होकर जोर जोर से रोने लगे। अपने पुत्र का रोना सुनकर महर्षि शमिक की समाधि भंग हो गई। महर्षि ने धीरे धीरे अपनी आंखें खोली तो उन्होंने अपने गले में पडा हुआ मरा सर्प देखा। उस सर्प को गले से उतार कर फेंकने के बाद महर्षि ने अपने पुत्र से पूछा, बेटा तू रो क्यों रहा है क्या किसी ने तुम्हारा अपकार किया है। पिता के द्वारा पूछने पर ऋषि कुमार ने सरल स्वभाव से सारा वृतांत बतला दिया। महर्षि शमिक राजा को दिए हुए श्राप को सुनकर बड़े दुखी हुए।महर्षि शमिक ने अपने पुत्र के द्वारा दिए हुए श्राप की प्रशंसा नहीं की अपितु उन्होंने श्राप की निंदा ही की। वे जानते थे कि राजा परीक्षित पर कलियुग का प्रभाव था और वह श्राप योग्य नहीं थे। उन्होंने कहा अरे अज्ञानी बालक तूने बड़ा भारी पाप कर डाला। दुख है कि एक साधारण सी गलती पर तूने राजा को बहुत बड़ी सजा दी है। कुछ भी हो बेटे वे श्राप के योग्य कदापि नहीं थे। उधर, वन से राजधानी में अपने महल में पहुंचने पर राजा परीक्षित ने स्वयं जब अपना स्वर्ण मुकुट शीश से उतारा तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ और लगा कि उन्हें उनकी धृष्टता का फल मिलना चाहिए। महाराजा परीक्षित एकांत में बैठे इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि इतने में ही शमिक ऋषि का भेजा हुआ उनका शिष्य राजा के पास आया और उसने राजा परीक्षित को श्रंंगी के श्राप संबंधी सब समाचार सुनाया। यह सुनकर राजा ने उस श्राप को वरदान समझा। मृत्यु उनसे केवल सात दिवस की दूरी पर थी। राजा को वैराग्य हो गया था।

राजा परीक्षित अपने बड़े पुत्र जन्मेजय को राज्य सौंप कर तथा समस्त आसक्तियों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति के लिए भागीरथी गंगा के दक्षिणी तट पर उत्तर दिशा की ओर नंगे पैर पैदल – पैदल चल पड़े। राजधानी हस्तिनापुर से काफी दूर पहुंच कर राजा ने गंगा के किनारे वन में ऊंचे टीले पर एक विशाल वटवृक्ष को देखा। राजा परीक्षित पवित्र गंगा के किनारे इसी वटवृक्ष की शीतल छाया में भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करके यह संकल्प लेकर बैठ गए की अब मैं मरण काल पर्यंत यही रहूंगा।
उधर उनकी प्रजा, साधू-सन्यासी और बंधु बांधव सब खोजते खोजते वहां आ पहुंचे। धीरे धीरे संपूर्ण ऋषि मुनियों का एक बहुत बड़ा समाज वहां एकत्रित हो गया। त्रिलोकी को पवित्र करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव ऋषि मुनि अपने शिष्यों के साथ तीर्थाटन हेतू पधारे थे। भागवत पुराण में वर्णन है कि

“उस समय वहां पर अत्री, वशिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्ठनेमी,भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम,
उत्थय, इंद्रप्रमद, इधमवाह, मेधातिथि, देवल, आर्ष्टीषेन,
भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य,
भगवान व्यास, नारद तथा इनके अतिरिक्त और भी कई श्रेष्
देवर्षि, ब्रह्मर्षि, तथा अरुणादि राज ऋषियों का शुभागमन हुआ।,
आगे भागवत पुराण में वर्णन है कि-

“उसी समय पृथ्वी पर स्वेच्छा से विचरण करते हुए किसी से कुछ भी अपेक्षा न रखने वाले व्यास नंदन भगवान श्री शुकदेव जी महाराज दैवयोग से वहां प्रकट हो गए।,
सोलह वर्ष की अवस्था और दिगंबर वेष में श्रेष्ठ देवताओं के समान उन गूढ़ तेजस्वी मुनी को देखते ही उनकी महिमा को जानने वाले महर्षियों ने उन्हें पहचान लिया और वे सब के
सब अपने अपने आसन छोड़कर उनके सम्मान के लिए उठ खड़े हुए।
सब के द्वारा सम्मानित होकर शुकदेव मुनि एक ऊंचे श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। तब राजा परीक्षित ने हाथ जोड़कर बड़ी मधुर वाणी में शुकदेव जी से पूछा-“जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिए। उस व्यक्ति का क्या कर्तव्य है।,
इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर में शुकदेव जी ने जो उपदेश राजा परीक्षित को दिए, वहीं श्रीमद्भागवत की कथा है।

जिस स्थान पर सर्वप्रथम शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को
श्रीमद्‌भागवत की कथा सुनाई थी,वहीस्थान शुकतीर्थ(शुक्रताल) नाम से प्रसिद्ध है।

सात दिन तक निरंतर कथा सुनकर अंत में राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से कहा, भगवन! आपने मुझ पर कृपा करके भगवान श्री हरि का जो चरित्र सुनाया, उससे मैं कृतकृत्य हो गया हूं। आपके द्वारा उपदेश किए हुए ज्ञान से मेरा अज्ञान दूर हो गया। अतः अब मुझे तक्षकादि किसी भी मृत्यु से भय नहीं है। अब मुझे आत्मा और ब्रह्म की एकता का साक्षात्कार हो गया है। हे महामुने! अब आप मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं अपनी वाणी बंद कर लूं, अपने चित्त को श्री विष्णु भगवान के स्वरूप में विलीन करके अपने प्राणों का त्याग कर दूं।
इसके बाद श्री शुकदेव जी परीक्षित को आशीर्वाद देते हुए तथा उनसे विदा लेकर वहां से प्रस्थान कर गए।
राजा परीक्षित गंगा जी के तट पर बैठे हुए थे। उनका संशय तो पहले ही मिट चुका था। तक्षक के आने से पहले ही वे समाधि में ब्रह्म स्वरूप हो गए थे।
सातवां दिन पूर्ण होने जा रहा था। संध्या का समय था। उधर शमिक मुनि के पुत्र श्रृगीं ने राजा को जो श्राप दे दिया था, वह भी पूरा होना था।

तभी श्रृंगी ऋषि के श्राप से प्रेरित तक्षक नाग ब्राह्मण का वेष धारण करके राजा को काटने के लिए इस शुक स्थल की ओर चल दिया, जिस स्थान पर राजा परीक्षित गंगा तट पर बैठे हुए थे।
उस समय कश्यप नामक एक गरीब ब्राह्मण वैद्य था, जो भयानक से भयानक सर्प के काटने से ठीक करने की चिकित्सा जानता था। जब उस ब्राह्मण वैद्य को तक्षक नाग के द्वारा राजा को डसने की बात पता चली । वह कश्यप वैद्य, तक्षक नाग के द्वारा राजा को डसने के बाद राजा परीक्षित का जीवन बचाने के लिए और राजा से धन प्राप्ति की इच्छा से इस स्थान की ओर चल दिया जहां राजा परीक्षित गंगा किनारे विराजमान थे।
रास्ते में कश्यप वैद्य की भेंट ब्राह्मण का वेष धारण किए हुए तक्षक नाग से हुई। कश्यप वैद्य से वार्तालाप में तक्षक नाग को जब यह पता चला कि यह ब्राह्मण भयानक से भयानक सर्प विष को ठीक करने की चिकित्सा जानता है और उसके द्वारा राजा को डसने पर राजा परीक्षित को फिर से जीवित करने के लिए ही वह वहां जा रहा है। इस पर तक्षक नाग ने अपने वास्तविक रूप में आकर कश्यप वैद्य से कहा-मैं ही तक्षक नाग हूं, मेरे काटे की कोई औषधि नहीं है। तुम लौट जाओ कश्यप।
कश्यप वैद्य पर उसकी बात का कोई असर नहीं पडा। तब तक्षक नाग ने कहा कि तुम्हें मेरी बात का विश्वास न हो तो मेरी शक्ति को देखो। यह कहकर तक्षक नाग पास के विशाल पीपल के पेड़ से लिपट गया और पेड़ के तने में अपने जहरीले दांत गड़ा दिए। देखते ही देखते वह विशाल पीपल का पेड़ जलकर राख की ढेरी में बदल गया।
यह देख कर कश्यप वैद्य ने भी तक्षक नाग से कहा अब मेरी शक्ति को भी देखो, मैं अभी इस विशाल पेड़ को हरा भरा कर देता हूं। यह कहकर कश्यप वैद्य ने दिव्य मंत्रोचार के द्वारा अभिमंत्रित गंगाजल राख की ढेरी पर छिड़का तो राख से पुणः पीपल का विशाल पेड़ फिर से पूर्ववत स्थिति में हरा भरा होकर लहरा उठा।
ऐसी शक्ति को देख कर तक्षक नाग आश्चर्यचकित रह गया। तक्षक नाग ने कश्यप वैद्य को लालच दिया और खूब सारा धन देकर उस गरीब वैद्य को बीच रास्ते से ही मोड़ दिया।

जिस स्थान पर कश्यप वैद्य और तक्षक नाग की भेंट हुई थी, उस स्थान को भेंटाहेडी कहा जाने लगा, जो कालांतर में भेड़ाहेडी हो गया और वर्तमान समय में वह भोकरहेड़ी के नाम से जाना जाता है।

जिस स्थान से तक्षक नाग ने कश्यप वैद्य को वापस मोड़ा था उसका नाम मोड़ना पड़ा। जो कालांतर में मोरना हो गया।

मोरना और भोकरहेड़ी यह दोनों छोटे कस्बे वर्तमान में शुकतीर्थ के निकट ही कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

भागवत पुराण के अनुसार क्योंकि तक्षक नाग में अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बदलने की शक्ति थी। अतः कश्यप ब्राह्मण को वापस भेजने के बाद तक्षक नाग ने स्वयं ब्राह्मण के वेष में छिपकर राजा परीक्षित के पास गया और अपने वास्तविक तक्षक नाग के रूप को धारण कर राजा परीक्षित को डस लिया।
राजा परीक्षित तो तक्षक नाग के डसने से पहले ही ब्रह्म में स्थित हो चुके थे। अब तक्षक की विषाग्नि से उनका निर्जीव शरीर सबके देखते ही देखते भस्मीभूत हो गया।
इस प्रकार राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त हुआ।

शुकतीर्थ जहां यह श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ संपन्न हुआ। यह स्थान पतित पावनी गंगा जी का दक्षिण किनारा है जहां ऊंची पहाड़ी पर उसी श्रीमद्भागवत कथा का साक्षी वही प्राचीन वटवृक्ष है जिस की शीतल छाया में ८८ हजार ऋषि-मुनियों के बीच बैठकर महाराजा परीक्षित ने महर्षि शुकदेव से सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान किया था।
प्राचीन समय में यह स्थान एक एकांत वन था। यहां का वातावरण इतना शांत है कि यहां आने वाले साधकों का मन स्वाभाविक रूप से भगवान की ओर प्रवृत हो जाता है।
यह स्थान सिद्ध संत और महात्माओं की तपोभूमि रहा है ‌ यहां का कण-कण भक्ति और तपस्या के रस में भीगा हुआ है जो यहां पधारने वाले श्रद्धालु भक्तों के अंतःकरण में प्रवेश कर उनको भगवतचिंतन में डुबोकर भक्ति भाव से भाव विभोर कर देता है तथा उन्हें अलौकिक आनंद का अनुभव होता है।

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