__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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लक्खीमल शाह व उसके वफादार कुत्ते की मिसाल पूरे भारत में कथाओं में और किताबों में प्रचलित है।

मुजफ्फरनगर जनपद में एनएच 58 पर मंसूरपुर क्षेत्र के नरा गांव में लक्खीमल शाह और उसके वफादार कुत्ते की समाधि स्थित है।

दंत कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में नरा गांव का नाम नरवरगढ़ था। यहां ढोला नाम के राजा की रियासत थी। यहीं लक्खीमल बंजारा रहता था। यह भी किवदंती है कि उसके पास लाखों की संख्या में ऊंट, भेड़, घोड़े-खच्चर व बकरियां थी। इसी कारण लोग उसे लक्खी बंजारा कहते थे।

पुराने समय में उबड़-खाबड़ रास्ते होने के कारण दूर-दूर के स्थानों पर माल व सामानों को ढोने का काम गधों एवं खच्चरों के द्वारा ही किया जाता था। लक्खी बंजारा भी अपने हजारों की संख्या में घोड़े-खच्चरों के द्वारा देश के विभिन्न भागों में वस्तुओं के क्रय-विक्रय का बड़ा व्यापार करता था।

एक बार लक्खी बंजारे को व्यापार में बड़ा घाटा होने पर उसने एक सेठ से कर्ज लिया। तंगी की हालत में वह कर्ज नहीं उतार पा रहा था। जब वह लिए गए कर्ज की रकम नहीं लौटा पाया तो उसने साहूकार के पास अपना प्रिय वफादार कुत्ता यह कहकर सौंप दिया कि जब वह उधार की रकम लौटा देगा तब वह उसे वापस ले लेगा।

बताते हैं इसके कुछ दिनों बाद उस साहूकार के घर में डकैती पड़ी। चोर-डाकूओं ने उस साहूकार की सब धन-संपत्ति लूट ली। उस समय वह कुत्ता सब कुछ देखता रहा। बाद में जब चोर धन-संपत्ति लेकर चलने लगे तो कुत्ता भी उनके पीछे चल दिया। दिन निकल जाने के कारण उन चोर-डाकुओं ने लूटा हुआ सब माल गांव के पास तालाब के किनारे दबा दिया। उन चोरों के वहां से जाने के बाद बाद कुत्ता साहूकार के पास लौट आया।

साहूकार के पास आकर कुत्ता उसकी धोती को पकड़कर उसे तालाब की तरफ खींचकर ले गया। साहूकार को वहां उसकी सारी धन-संपत्ति मिल गई।

कुत्ते की समझदारी और वफादारी देख साहूकार प्रसन्न हो गया और उसने लक्खी बंजारे के नाम एक चिट्ठी लिखी कि दिया गया कर्ज माफ किया जाता है और कुत्ते के गले में वह चिट्ठी लटकाकर वापस लक्खी बंजारे के पास भेज दिया।

जब लक्खी बंजारे ने कुत्ते को वापस अपने पास आते देखा तो वह यह सोच कर आग बबूला हो गया कि कुत्ता उसका दिया हुआ वचन तोड़कर वापस आ गया। उसने बिना आगा-पीछा सोचे कुत्ते को गोली मार दी।

बाद में जब उसने कुत्ते के गले में लटकी हुई चिट्ठी पढ़ी और उसे पूरी घटना का पता चला तो उसका रो-रोकर बुरा हाल हो गया। पश्चाताप में उसने स्वयं को भी गोली मार ली थी। गांव के लोग बताते हैं कि दोनों कि एक दूसरे के प्रति लग्न, वफादारी और दोस्ती को देखकर यहां उन दोनों की समाधि एक साथ बना दी गई थी।

समय के साथ समाधियां कंकड़ों में बदल गई थी। कुछ वर्ष पहले बंजारा समाज के लोगों ने बंजारा सेवा समिति के तत्वाधान में नायक लक्खीमल शाह व उसके वफादार कुत्ते की समाधियों का जीर्णोद्धार स्तंभ के रूप में कराया था।

दूर-दूर से लोग वफादारी की मिसाल की गवाह इन समाधि को देखने के लिए यहां आते हैं।

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