__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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द्वापर युग के अंतिम समय में धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र की पावन धरा पर कौरवों और पांडवों के बीच १८ दिन तक महाभारत का महासमर हुआ था। महाभारत का महासमर कुरुक्षेत्र की धरती पर ही क्यों लड़ा गया। इसके बारे में यहां आने वाले हर तीर्थयात्री और पर्यटक के मन में आम जिज्ञासा होती है कि इस धरती में ऐसी क्या विशेषता थी जिससे महाभारत का युद्ध यहीं पर लड़ा गया।

कौरव और पांडवों के बीच निश्चित दिखाई दे रहे युद्ध को नहीं होने देने के लिए अंतिम प्रयास के रूप में पांडवों की ओर से भगवान श्रीकृष्ण उनके दूत बनकर हस्तिनापुर के राजदरबार में आए। लेकिन जब दंभी दुर्योधन ने पांडवों को युद्ध के बिना सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से मना कर दिया तब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध होना निश्चित हो गया। कौरवों और पांडवों दोनों पक्षों की ओर से युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई।

कौरव और पांडवों दोनों पक्षों के बीच जब धर्मयुद्ध होना निश्चित हो गया तब यह प्रश्न उठा कि यह युद्ध किस भूमि पर हो। दोनों पक्षों में विचार होने लगा की युद्ध में दोनों तरफ की १८ अक्षौहिणी सेनाओं की विशाल संख्या वाली सेना के लिए विशाल निर्जन भूमि तथा पर्याप्त मात्रा में जल,भोजन और ईंधन आदि की व्यवस्था का होना भी अवश्यक था।

महाभारत के युद्ध की विनाशलीला को देखते हुए अनेक देशों के राजा-महाराजाओं ने अपने राज्य की भूमि युद्ध स्थल के रूप में प्रयोग होने की अनुमति नहीं दी जबकि उनमें से कई के पास इस तरह की निर्जन भूमि और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध थे।

यह कहीं लिखित में तो नहीं लेकिन लोक मान्यता है कि कुरुक्षेत्र की पावन भूमि महाभारत के महासमर के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने चुनी थी।
मान्यता है कि श्री कृष्ण और अर्जुन महाभारत के युद्ध स्थल को खोजते खोजते कुरुक्षेत्र के वन प्रदेश में जा निकले। उस समय इस स्थान पर मंदिर, सरोवर, कूप, तीर्थस्थान आदि तो थे ही, यहां खेती-बाड़ी भी होती थी। यहां के एक स्थान पर श्री कृष्ण ने देखा कि एक किसान अपने खेत में पानी दे रहा था कि अकस्मात उसके खेत की मेंड टूट गई और उस स्थान से खेत का पानी बाहर बहने लगा। किसान ने खेत की मेंड मिट्टी डालकर ठीक करने की बहुत कोशिश की लेकिन पानी की तेज धार मिट्टी को फिर से बहा देती थी। तब किसान ने निकट ही खेलते अपने बच्चे को उस स्थान पर लिटा दिया। पानी बहना रुक गया लेकिन वह बच्चा मर गया। बाद में किसान अपने बच्चे को वैसा ही उस स्थान पर छोड़कर चला गया। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा पार्थ युद्ध के लिए यही स्थान उपयुक्त है।

किसान के इस असामान्य व्यवहार को देखकर श्री कृष्ण को उस स्थान के इतिहास को जानने के बारे में जिज्ञासा हुई। उन्हें पता लगा कि यह स्थान सदा से ही युद्ध का स्थान रहा है और सतयुग में यह तीर्थ स्थान था। महर्षि विश्वामित्र एवं महर्षि वशिष्ठ ने पहले यहां तपस्या की थी लेकिन बाद में इसी धरती पर दोनों के बीच परस्पर युद्ध भी हुआ था।
भगवान परशुराम जी ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार इसी धरती पर २१ बार क्षत्रियों का वध करके उनके रक्त से यहां के ५ बड़े कुंड भरे थे और क्षत्रियों के उस रक्त से अपने पितरों का तर्पण करके प्रतिशोध लिया था। भगवान परशुराम जी के द्वारा भरे गए रक्त के कुंड भी यहीं पर है और समन्तपंचक तीर्थ के नाम से जाने जाते हैं।

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