___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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कुशावर्त घाट – हरिद्वार

भगवान दत्तात्रेय की तपस्थली के रूप में विख्यात यह स्थान हरिद्वार पंचपुरी क्षेत्र के पांच मुख्य स्नान स्थलों में से एक है। इस स्थान की महिमा का वर्णन स्कंद पुराण व अन्य पुराणों में किया गया है –

* कुशावर्तं महातीर्थं दक्षिणे ब्रह्मतीर्थतः।

स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृ तर्पणम्।।

यदत्र क्रियते कर्म तत्तत्स्यात्कोटिसंख्यकम्।।

– ‘ब्रह्मकुंड से दक्षिण की ओर (एक फर्लांग की दूरी पर) कुशावर्त नामक महातीर्थ है। यहां स्नान दान जप, होम वेदादि पाठ, श्राद्ध तथा तर्पण आदि जो कुछ किया जाता है, वह करोड़ों गुना अधिक होता है।’

* गंगाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते

स्नात्वा तु कनखले तीर्थ पुनर्जन्मे न विद्यते ।।

– हरिद्वार, कुशावर्त,बिल्वकेश, नीलपर्वत तथा कनखल तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस स्थान पर दत्तात्रेय जी ने एक पैर पर खड़े होकर दस हजार वर्ष तक तप किया था। राजा भगीरथ जब गंगा जी को गंगोत्री से गंगासागर ले जाते हुए हरिद्वार आए तब गंगा जी भगीरथ के पीछे पीछे चलते हुए जब यहां से गुजरी तो यहां गंगा जी के प्रबल प्रवाह से दत्तात्रेय जी के कुश, चीर कमंडल और दंड भी बहने लगे। लेकिन दत्तात्रेय जी के तप के प्रभाव से गंगा जी इस स्थान से आगे नहीं बढ़ पाई और आवर्तमय(भंवर के रूप में) चक्कर काटती रही और उनकी सब चीजें भी उसी आवर्त में चक्कर लगाती रही।

जब दत्तात्रेय जी की आंखें खुली और उन्होंने देखा कि उनकी सब वस्तुएं गंगाजल में घूम रही हैं और भीग गई हैं, तब वे गंगा जी को भस्मा करने के लिए उद्धत हुए उस समय ब्रह्मा दी सभी देवता आकर उनकी स्तुति करने लगे राजा भगीरथ की प्रार्थना एवं गंगा जी ने क्षमा याचना की। तब ऋषि ने प्रसन्न होकर कहा आप लोग यहीं निवास करें गंगा ने मेरे कुश आदि को यहां आवर्ताकार घुमाया है इसलिए इसका नाम कुशा वृत्त होगा यहां पितरों को पिंड दान देने से उनका पुनर्जन्म न होगा ऋषि के प्रसन्न होने पर ही गंगा जी यहां से आगे बढ़ पाई। आज भी कुशावर्त घाट पर गंगा जी आवर्तमय होकर बहती है।

दत्तात्रेय जी की कुशा इस स्थान पर गंगा में बहने से ही यह घाट कुशावर्त घाट कहा जाता है।

पुराणों में इस स्थान पर पितरों के पिंडदान एवं तर्पण करने का बहुत माहात्म्य बताया गया है। मान्यता है कि यहां पितरों का श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा जाता है भगवान रामचंद्र नहीं भी इसी घाट पर अपने पुरखों का तीर्थ श्राद्ध किया था।
मेष की संक्रांति पर यहां पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ होती है

कुशावर्त घाट पर अपने पितरों को पिंडदान और श्राद्ध तर्पण करने के लिए श्रद्धालुओं की पूरे वर्ष भर भीड़ लगी रहती है। आज भी प्रतिमाह हजारों लोग यहां श्राद्ध करने के लिए आते हैं।

इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस स्थान पर गंगा जी के किनारे पक्का घाट व दत्तात्रेय जी का मंदिर बनवाया था।

कुशावर्त घाट के दक्षिण की ओर ‘रामघाट’ व ‘विष्णुघाट’ है।

* राम घाट पर वल्लभ संप्रदाय के महाप्रभु की बैठक है। ‌

* विष्णु घाट – विष्णु तीर्थ है। यहां पर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी। इस घाट पर राजा मानसिंह ने शिवालय व पक्का घाट बनवाया था।

* समुद्रेश्वर महादेव मंदिर –

यह मंदिर विष्णु घाट के पश्चिम दिशा में स्थित है। यह मंदिर उस स्थल पर बना था, काल के किसी चक्र में जहां खड़े होकर सभी समुद्रों ने कभी शिव की आराधना की थी। समुद्रेश्वर में स्वर्णमय शिवलिंग विद्यमान था। इस तीर्थ के पास बिल्केश्वर महादेव तीर्थ अभी भी विद्यमान है।

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