बागपत जनपद में छपरौली से मात्र 4 किमी और बड़ौत कस्बे से 18 किमी की दूरी पर बसा कुरड़ी गांव पुरातात्विक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

इस गांव का प्राचीन नाम फूलशहर भी था। इस गांव का यह नाम छपरौली की फूल कंवर महिला के नाम पर पड़ा था। कहते हैं कि फूल कंवर का विवाह राजस्थान में हुआ था। लेकिन कोई विवाद होने पर वह अपने मायके लौट आई थी। पुराने समय में यह बात सामाजिक रूप से ठीक नहीं मानी जाती थी। फूल कंवर के परिजनों व समाज ने उस महिला को स्वीकार नहीं किया तो फूलकंवर छपरौली के पास इसी स्थान पर रहने लगी थी। उस महिला के नाम पर पहले इस गांव को फूलशहर और आज के समय में कुरड़ी गांव के नाम से जाना जाता है।

कुरड़ी नाम पढ़ने के पीछे एक और बात भी बताई जाती है की 850 वर्ष पहले कम्हू जाति के लोगों ने इस स्थान को एक कूड़ी पर बसाया था। इसी से इसको
कम्हुखेड़ा और बाद में कुरड़ी नाम से जाना गया।

कुरड़ी गांव में एक प्राचीन टीला है। यह अपने अंदर पुरातात्विक महत्व के अवशेषों को दबाए हुए है। इस प्राचीन टीले पर सिंधु सभ्यता, गुप्त और कुषाण कालीन प्रमाण प्राप्त हो चुके हैं।

गांव के इसी टीले पर भगवान शिव और यमुना देवी का मंदिर स्थापित है। इस मंदिर के बारे में बताया जाता है कि हरियाणा से आए जग्रम ऋषि ने 1572 ई. में इसका निर्माण करवाया था। उसी समय का एक पत्थर मंदिर के मुख्य द्वार पर लगा हुआ है। जो स्वयं इस मंदिर की प्राचीनता बताता है। मंदिर की दीवारों और छतों पर बहुत ही सुंदर चित्रकारी की गई है। जिसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। हर वर्ष भगवान शिव और यमुना मैया की पूजा करने के लिए एक बड़े मेले का आयोजन भी किया जाता है।

कुरड़ी गांव की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल गांव में अजित नाथ दिगंबर जैन मंदिर तथा मस्जिद एक भी दीवार पर बने हुए हैं। यहां जब भी कोई धार्मिक कार्यक्रम होता है तो दोनों समुदाय के लोग उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और सौहार्द की मिसाल प्रस्तुत करते हैं।

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