_______जानिए – – –

मुजफ्फरनगर जनपद (उ. प्र.-भारत) के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और शौर्य स्थल के बारे में – – –

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देहरादून के दर्शनी गेट स्थित शहीद प्रद्युमन शाह की समाधि पर खुड़बुड़ा युद्ध स्मारक उन 83 शहीदों के शौर्य की याद कराता है जो 14 मई सन 1804 को इसी देहरादून के खुड़बुड़ा रणक्षेत्र में अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए वीरता से लड़ते हुए शहीद हुए थे। (ऐतिहासिक पुस्तकों के अनुसार लड़ाई 26 जून 1804 तक चली थी)

खुड़बुड़ा रणक्षेत्र में 14 म‌ई 1804 को हुए युद्ध में अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए गोरखों से 52 गढों के देश गढ़वाल के 54 वें महाराजा प्रद्युमन शाह निर्णायक युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे। प्रद्युमन शाह ने अपनी मातृभूमि व क्षेत्र की अखंडता के लिए अपना बलिदान दिया तथा अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने सिंहासन तक को बेच दिया था।

प्रतिवर्ष खुड़बुड़ा युद्ध के 83 वीरों की आत्मा की शांति के लिए शहीद महाराजा स्मारक निर्माण समिति द्वारा यज्ञ का आयोजन किया जाता है और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

गढ़वाल के महाराजा प्रद्युम्न शाह की राजधानी श्रीनगर (गढ़वाल) के पास चांदपुर गढ़ी में थी। इन्हीं महाराजा के शासन काल के समय सन 1803 में भीषण भूकंप आया था जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई और हजारों लोग आपदा के शिकार हुए। राज्य में अफरा-तफरी मची हुई थी। आपदा के ऐसे समय में ही गोरखाओं ने गढ़वाल पर अचानक आक्रमण कर दिया। महाराजा प्रद्युम्न शाह ने किसी तरह सहारनपुर में गहने आभूषण आदि बेचकर डेढ़ लाख रुपयों का इंतजाम करके सेना को खड़ा किया। देहरादून के खुड़बुड़ा इलाके में महाराजा और गोरखाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में जहां गोरखा सैनिक बंदूकों से लैस थे लेकिन गढ़वाल के सनिकों के पास लड़ने के लिए सिर्फ तलवारें थी। इस युद्ध में 14 मई 1804 के दिन महाराजा प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए।

यह युद्ध 26 मई 1804 तक चला था जिसमें एक हजार सैनिक तथा 26 अन्य छोटी-छोटी रियासतों के राजा भी वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस युद्ध के बाद देहरादून के इलाके पर गोरखाओं का कब्जा हो गया।

देहरादून की यह धरती आक्रमणों, अत्याचारों, बलिदानों और विश्वासघातों की गवाह है।

गोरखाओं से गढ़वाल को मुक्त कराने के लिए प्रद्युम्न शाह के पुत्र महाराजा सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से हाथ मिलाया। सन1815 में यहीं देहरादून के पास खलंगा के किले पर अंग्रेजों और गोरखाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। लेकिन गढ़वाल नरेश की सहायता के लिए आई अंग्रेजों की फौज ने 11 साल बाद गोरखों से खंगला के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। साथ ही गढ़वाल और कुमायूं के नरेशों को उनका राज्य लौटाने के बजाय अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी संपूर्ण कुमायूं एवं देहरादून और मसूरी सहित आधे से अधिक गढ़वाल को भी हड़प ग‌ई थी। महाराजा सुदर्शन शाह को दून सहित गढ़वाल का हिस्सा अंग्रेजों को देना पड़ा और उन्होंने स्वयं के राज्य की राजधानी टिहरी में स्थापित की।

सुदर्शन शाह ने ही खुड़बुढ़ा में अपने पिता की स्मृति में स्मारक बनवाया। यह स्मारक गुरु रामराय दरबार साहिब के दर्शनी गेट वाले बाजार के हिस्से में है। पहले इस स्मारक की देखभाल दरबार साहिब के हाथों में थी। अब यह स्मारक चारों ओर भवनों से घिर गया है।

प्रतिवर्ष खुड़बुड़ा युद्ध के 83 वीरों की आत्मा की शांति के लिए यहां शहीद महाराजा स्मारक निर्माण समिति द्वारा यज्ञ का आयोजन किया जाता है और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उत्तराखंड से पर्यटन मंत्री ने कहा कि सरकार शहीद स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा जो इस युद्ध में शहीद हुए वीर सैनिकों व उनसे संबंधित सत्य प्रमाणों की जांच करेगी और उसके आधार पर सरकार आगे काम करेगी।

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