________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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बाबा काली सिंह का मंदिर – सिसौली कस्बा

मुजफ्फरनगर जनपद में खीर खाने वाले पशुओं के देवता बाबा काली सिंह जी का मंदिर इसी जनपद के सिसौली कस्बे के डीएवी और जनता कॉलेज के बीच गांव अलावलपुर-माजरा के निकट जिला मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर स्थित है।

अपनी तरह का देशभर में अकेला प्राचीन बाबा काली सिंह मंदिर एक विशेष पहचान रखता है। संभवत भारत का यह एकमात्र ऐसा स्थल है, जहां प्रत्येक रविवार को हजारों श्रद्धालु आकर मंदिर परिसर में ही खीर और रोटी बनाकर प्रसाद चढ़ाते हैं।

इस क्षेत्र में इस मंदिर की बहुत अधिक मान्यता है। सिसौली के इस प्राचीन मंदिर में शुक्ल पक्ष के रविवार को डमरु और डुगडुगी की थाप पर झूमते श्रद्धालुओं को देखा जा सकता है।

अपने नए जीवन में प्रवेश कर सुखमय जीवन की मंगल कामनाएं करते नवविवाहित जोड़े तथा किसान और पशुपालक अपने दुधारू पशुओं के स्वस्थ होने की दुआ मांगने यहां काली सिंह के मंदिर पर आते हैं।

मंदिर परिसर के विशाल मैदान में हर रविवार के दिन सैकड़ों चूल्हों पर बड़े-बड़े बर्तनों में श्रद्धालु यहां खीर बना कर श्रद्धा पूर्वक मंदिर में चढ़ाते हैं।

बाबा काली सिंह के मंदिर की मान्यता इतनी अधिक है कि स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा आसपास के जनपदों और दिल्ली, हरियाणा तथा पंजाब आदि प्रांतों के अलावा देशभर से रविवार को हजारों श्रद्धालु अपने पशुओं की सलामती के लिए प्रार्थना करने के लिए अपने 7 कैनो-बाल्टियों में दुधारू पशुओं का दूध लेकर यहां पहुंचते हैं और मंदिर परिसर में ही ईटों के चुल्ले पर खीर बनाकर पशुओं के देवता काली सिंह को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में बांटते हैं।

कस्बा सिसौली के बाबा काली सिंह का मंदिर देश का ऐसा मंदिर है, जहां लोग अपने दुधारू पशुओं की सलामती के लिए प्रार्थना करने के लिए आते हैं। शुक्ल पक्ष के रविवार के दिन बड़ी संख्या में महिलाएं यहां बाबा काली सिंह के मंदिर के चौखट पर पहुंचती हैं। मंदिर परिसर में ही बने सैकड़ों अस्थाई चुल्हों पर अपने साथ लाए गए दूध की खीर बनाकर बाबा काली सिंह को भोग लगा कर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि ऐसा करने से उनके पशुओं के साथ-साथ उनके दूध का सेवन करने वालों का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है तथा उनके घर परिवार में सुख शांति बनी रहती है।

श्रद्धालुओं का यह भी कहना है कि अपने साथ लाए गए दूध की खास बात होती है कि यह कई दिन के सफर के बावजूद भी खराब नहीं होता है यदि दूध में कोई मिलावट हो तो मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही फट जाता है।

इस प्राचीन मंदिर में सदियों से पशुओं की सलामती के लिए इस प्रकार की पूजा की परंपरा चली आ रही है। यहां काली सिंह नाग के नाम पर मंदिर बनाया गया है। मान्यता है कि यहां कोई भी सर्प किसी व्यक्ति को नहीं काटता और न ही कोई नुकसान पहुंचाता है। यहां के श्रद्धालु भी सांपों के प्रति आदर रखते हैं।

यह मंदिर कई सौ वर्ष प्राचीन है कहावतों और कथाओं के अतिरिक्त इसकी स्थापना के बारे में कोई प्रमाण नहीं है। मान्यता के अनुसार ही यहां दूध अथवा दूध से बनी खीर चढ़ाने से लोगों के दुधारू पशु, घर, खेत- खलियान व परिवार कुशल रहेंगे ऐसा श्रद्धालुओं का विश्वास है।

प्रचलित किवदंती के अनुसार कहा जाता है कि राजा बासक की सात संताने थी। जिनके नाम भूरि सिंह, हरि सिंह, जौहर, फूल सिंह, नाहर, पाटमदे तथा काली सिंह थे। सबसे छोटा होने के कारण काली सबका लाड़ला था। काली बहुत प्रतिभाशाली बलवान और पराक्रमी था।

काली सिंह का ठिकाना सिसौली कस्बे के पास के ही जंगल में था। वह स्थान आजकल नंद की सिसौली के बाहरी मार्ग पर स्थित है। कहते हैं कि सिसौली की स्थापना करने वाले नंद को काली सिंह ने उनके प्रति गोपनीयता रखने की बात कही थी लेकिन नंद ने ऐसा नहीं किया।

एक बार किसी साहूकार की बारात इस मार्ग से होती हुई गुजरी। रास्ते में बारात की गाड़ियों के हिचकोले खाने तथा रथ के धंसने और घोड़ों के बिदकने से बारातियों में हाहाकार मच गया इससे बारात का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

जब नंद को यह सब बात पता चली तो वह बहुत घबराया तथा काली सिंह के पास आकर माफी मांगी। साहूकार भी रोने लगा, यह सब देख कर काली सिंह को उन पर तरस आ गया। साहूकार ने वहां बाबा का थान बनाने का वायदा किया। कहते हैं उसके बाद बारात सकुशल आगे बढ़ी।

इस मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की मान्यता पहले से अधिक बढ़ती जा रही है लोगों की मान्यता है कि यहां मांगी गई मन्नत अवश्य पूरी होती है। श्रद्धालु कोई नया कार्य शुरू होने से पूर्व मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हैं।

यहां मंदिर में बाबा के साथ उनकी माता की भी पूजा की जाती है। मंदिर के सामने से ही होकर जा रहे सिसौली-मुंडभर मार्ग पर बाबा काली सिंह के भाई भूरि सिंह का भी मंदिर है।

बाबा काली सिंह मंदिर के अंदर कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। एक छोटे मंदिर में 3 फुट वर्गाकार और डेढ़ फुट ऊंचा एक पक्का चबूतरा जैसा थान बना है जिस पर प्रसाद चढ़ाया जाता है।

आसपास के क्षेत्र में जब भी किसी परिवार में कोई मांगलिक कार्य होता है तो वह सबसे पहले बाबा काली सिंह के मंदिर में जाकर दूध और प्रसाद चढ़ाता है।किसी के परिवार में शादी-विवाह होने पर माता पहले दिन शाम के समय बाबा के मंदिर में न्योता देने जाती है। घर में नववधू के आने पर पूरा परिवार नव युगल को लेकर बाबा के मंदिर में आते हैं। इस परंपरा को गठजोड़ खुलवाना कहा जाता है।

पशुपालक का जब कोई पशु दूध देने में आनाकानी करता है, तब पशुपालक अपने मन में मंदिर में दूध चढ़ाने की इच्छा व्यक्त करता है और उसका पशु दूध देना शुरू कर देता है।

मंदिर के बारे में क‌ई चमत्कारीक घटनाएं भी स्थानीय लोग बताते हैं। बाबा के मंदिर में शुक्ल पक्ष के हर रविवार को मेले की परंपरा सदियों पुरानी है।

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