__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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खरड़ गांव –

जनपद मुजफ्फरनगर में बुढ़ाना कस्बे के पास स्थित सिसौली-फुगाना मार्ग पर मेरठ करनाल राजमार्ग से कुछ हटकर बसा खरड़ गांव।

कहते हैं इस गांव को 500 वर्ष से भी पहले गठवाला खाप के ही लिसाड़ से आए लोगों ने बसाया था।

यह भूमि पौराणिक महाभारतकालीन है। पौराणिक खांडव वन क्षेत्र में यहां खरड़ गांव से सटी एक बहुत ही प्राचीन अब तक की अनछुई वन देवभूमि स्थित है। जनश्रुति है और लोगों की आस्था-विश्वास है यहां स्थित इस प्राचीन वन में भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के साथ चलते-चलते विश्राम किया था। हजारों बीघे में स्थित यह वन खंड देशभर में खरड़ जूड़ के नाम से जाना जाता है।

पौराणिक खांडव वन क्षेत्र के खरड़ जूड़ नाम से जाने जाने वाले इस वन क्षेत्र में कदम्ब के विशाल वृक्ष हैं।

इसी वन के बीच सैकड़ों बीघा भूमि पर बना एक विशाल तालाब है।

जन श्रुति के अनुसार उस समय जहां-जहां भगवान श्री कृष्ण के कदम पड़े, वहां कदम्ब के पेड़ उग आए थे।

ग्रामीणों की इस वन क्षेत्र की भूमि के प्रति इतनी आस्था है कि वे कुछ दशकों पहले तक न तो इस जूड़ से लकड़ी काटने थे और न ही यहां की मिट्टी उठाते थे। यहां तक की ग्रामीण इस वन क्षेत्र से वृक्षों की टूटी हुई सूखी लकड़ियों को भी अपने घर नहीं ले जाते थे।

इस जूड़ को नहीं छेड़ने की आस्था के कारण ही शिक्षा ऋषि स्वामी कल्याण देव ने इस स्थान पर बालिका विद्यालय बनवाने पर विचार नहीं किया था। प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह और उनकी पत्नी गायत्री देवी भी यहां चीनी मिल लगवाने से इंकार कर चुकी थी।

इस देवभूमि पर समरगिर, हरिद्वारगिर तथा बनखंडी जैसे अनेक संतों ने यहां तपस्या में लीन हो समाधि ली है। यहां प्राचीन मंदिर और साधु संतों की समाधि स्थित है।

इस स्थान की प्राचीनता का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में भूमि में मिट्टी को खोदा गया तो महाभारत कालीन शैली में भूमि की सतह से कई फीट नीचे एक प्राचीन कुएं के अवशेष मिले थे। जो विशेष प्रकार की ईटों से बना हुआ था। लोगों का मानना है कि इस प्रकार की ईंटें उन्होंने पहले कभी भी आसपास के इलाके में नहीं देखी हैं। यहां मिली ईंटें काफी बड़ी है जिनकी लंबाई 1 फीट 3 इंच है तथा चौड़ाई में 10 इंच के लगभग है।

जिस स्थान पर यह प्राचीन कुंआ मिला है वह स्थान इस क्षेत्र में जूड़ के नाम से जाना जाता है। महाभारत कालीन स्थान होने के कारण लोगों की धारणा है कि यहां उत्खनन कराए जाने पर पुरातन काल की जानकारी उपलब्ध होने की संभावनाएं बहुत अधिक हैं।

यह वनक्षेत्र जंगल में कदम्ब के वृक्षों पर उछल-कूद करते बंदरों से विशेष पहचान बनाए हुए हैं। आस्था के कारण देशभर से लोग इस जूड़ में रहने वाले बंदरों के झुंडों को चने, केले व भोजन खिलाने के लिए आते हैं।

लेकिन अब कदम्ब के वृक्षों में बसी प्राचीन गाथाएं अवैध कटान की भेंट चढ़ रही हैं। तालाब का जल सूखने से और वृक्षों की कटान से यहां के बंदरों के अस्तित्व को भी खतरा है।

लोगों ने इस वन खंड की हजारों बीघे जमीन को काटना शुरू कर दिया जिससे यह वन खंड अब बहुत कम क्षेत्र में रह गया है। अवैध कटान से कदम्ब के वृक्ष लुप्त हो रहे हैं और जो मौजूद हैं वह भी देखरेख के अभाव में सूख रहे हैं।

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खरड़ वाली शीतला माता – जयेष्ठ माह का दशमी मेला

किसान इंटर कॉलेज, खरड़ के निकट माता शीतला देवी के मंदिर पर तीन दिवसीय भव्य देवी मेला का आयोजन किया जाता है।

800 वर्षों पुरानी परंपरा का प्रतीक दशमी मेला जयेष्ठ माह दशमी तिथि के अवसर पर गंगा दशहरा के दिन मनाया जाता है।

स्थानीय एवं आसपास के गांवों के ग्रामीणों में इस मेले के प्रति भारी उत्साह रहता है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा हरियाणा से आए हुए हजारों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस अवसर पर नाचते गाते हुए श्रद्धालु माता के दर्शन करते हैं। प्रतिवर्ष अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाली माता शीतला देवी पर उनके अनन्य भक्त नारियल दूध तथा चुनरी भेंट स्वरूप प्रदान करते हैं।

शीतला माता मंदिर के परिसर में ही स्थापित काली माता एवं मंदिर के चारों ओर स्थित ११ मंदिरों में श्रद्धालू लाइनों में लगकर प्रसाद चढ़ाकर पूजा करते हैं और माता का आशीर्वाद लेते हैं।

अनेक ऐसे परिवार प्रतिवर्ष मेले में आते हैं जो कभी इस क्षेत्र के मूल निवासी थे और बाद में यहां से जाकर अन्य प्रदेशों में बस गए। यहां आकर महिलाएं अपने बालकों की सुखी जीवन की शीतला माता से कामना करती हैं।

* खरड़ गांव में हजारों वर्ष पुरानी एक बनी है जिसका संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है।

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* आजाद हिंद फौज के महान स्वतंत्रता सेनानी चौधरी जहान सिंह मलिक खरड़ गांव के मूल निवासी थे।

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