सांस्कृतिक – धार्मिक रूप से इस क्षेत्र गंगा जमुना की धरती का सबसे बड़ा व भव्य आयोजन।

सनातन भारतीय संस्कृति की एकता का प्रतीक कांवड़ – यात्रा

श्रद्धा , उमंग और उत्साह का संगम है कावड़ यात्रा।

दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन कावड़ यात्रा।

सनातन हिंदू आस्था का प्रतीक बन चुकी श्रावण माह की शिवरात्रि पर सावन की दस्तक होते ही शिव भक्तों में उत्साह का संचार होने लगता है। बाबा भोलेनाथ को कावड़ लाकर जल चढ़ाने के लिए बाबा भोले के भक्त निकल पड़ते हैं।

लाखों शिव भक्त अपने इष्ट भगवान भोले शंकर का जलाभिषेक करने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश , गंगोत्री का आध्यात्मिक सफर तय कर अपने अपने अभीष्ट शिवालयों की ओर बढ़ चलते हैं।

हरिद्वार से लेकर जयपुर तक केसरिया रंग की छटा बिखर जाती है। पग पग पर केसरिया रंग की कांवड़ दिखाई देने लगती हैं। चारों ओर ओम नमः शिवाय व बम बम की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगती है।

कावड़ यात्रा देश के सबसे बड़े क्षेत्र मे फैला हुआ एक विराट धार्मिक आयोजन है। रंग बिरंगी तरह-तरह की कांवडों का बड़ा ही सुंदर दृश्य दिखाई देता है।

कावड़ियों की अटूट धारा सामाजिक समरसता और विश्व बंधुत्व की भावना को भी प्रदर्शित करती है।

इस अविरल धारा में विराट हिंदू समाज के दर्शन किए जा सकते हैं। गंगाजल लेकर आ रहे शिव भक्तों में ऊंच-नीच और छोटे बड़े का कोई भेद नजर नहीं आता है।

हरिद्वार से कांवड़ यात्रा शिव भक्ति के रूप में निकली कांवड़ियों की अटूट धारा सामाजिक समरसता और विश्व बंधुत्व की भावना को भी प्रदर्शित करती है।

हरिद्वार से गंगाजल लेकर आ रहे शिव भक्तों में ऊंच-नीच अमीर गरीब और छोटे बड़े का कोई भेदभाव नजर नहीं आता है।
विश्व की सबसे लंबी धार्मिक यात्राओं में गिनी जाने वाली इस कावड़ यात्रा में विराट हिंदू समाज के दर्शन भी होते हैं।

सनातन हिंदू धर्म के अन्य बड़े धार्मिक तीर्थ स्थलों जैसे माता वैष्णो देवी शिर्डी के साईं बाबा मंदिर वे अन्य धार्मिक स्थलों पर जितने श्रद्धालु वर्ष भर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं उससे कहीं अधिक शिव भक्त एक पखवाड़े तक चलने वाली कावड़ यात्रा में शामिल हो जाते हैं। अब तो इस कावड़ यात्रा में शामिल होने वाले शिव भक्तों की संख्या लाखों के स्थान पर करोड़ों में पहुंच गई है।

शिव भक्तों की वेशभूषा लगभग एक जैसी होती है।
रंग बिरंगी कांवड़ को धारण किए हुए इन शिव भक्तों की कोई जाति बिरादरी नहीं होती और न ही इनमें किसी तरह के अगड़े पिछड़े का भेद दिखाई देता है।

कंधे पर कावड़ में गंगाजल धारण करते ही इनकी पहचान केवल भोले के रूप में होती है।

कांवड़ यात्रा के क्षेत्र में लगने वाले हजारों कावड़ सेवा शिविरों में इन शिवभक्त भोलो की सेवा समान रूप से की जाती है। इन सेवा शिविरों में करोड़पति उद्यमी व्यापारी तक कावड़ियों की सेवा कर उनका पुण्य बांटने के लिए लालायित रहते हैं। सेवा शिविर में आने वाले शिवभक्त भोलो की सेवा केवल शिव भक्त के रूप में होती है।

यह कावड़ यात्रा सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रतीक है। कांवड़ यात्रा सामाजिक समरसता के साथ साथ विराट हिंदू समाज को भी प्रदर्शित करती है।

हरिद्वार से लेकर मुजफ्फरनगर, मुजफ्फरनगर से दिल्ली हरियाणा व मुजफ्फरनगर से पानीपत व उससे आगे तक के मार्गो पर शिव भक्तों की जो अटूट श्रंखला बनती है वह विराट सनातन हिंदू समाज और संस्कृति को प्रदर्शित करती है।

सभी छोटे-बड़े कावड़ सेवा शिविरों में शिव भक्तों की सेवा भाव से जमकर सेवा और सत्कार किया जाता है।

भक्ति के इस अविरल प्रवाह ने जाति जनित संकीर्णता के दायरो को पूरी तरह से ध्वस्त कर डाला है।

केसरिया बनियान अंगोछा पहने लाखों लोगों की पहचान सांसारिक जीवन में कुछ भी हो लेकिन इस समय वे केवल कांवड़िए है। इस वेशभूषा में किसी की आर्थिक सामाजिक पहचान ढूंढना किसी सूरत में संभव नहीं है।

कंधे पर कावड़ में गंगाजल धारण करते ही इनकी पहचान केवल भोले के रूप में होती है।

यह अनूठा परिदृश्य हिंदुत्व की समरसता और एकता के अटूट बंधनों का प्रतीक है।

हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं से हजारों जल धाराएं जैसे गंगा की कल कल धारा में आत्मसात हो जाते हैं ठीक वैसे ही गंगा के समानांतर बहने वाली कंधों पर कांवड़ में गंगाजल रखें शिव भक्तों की इस भागीरथी में उत्तर भारत के विभिन्न प्रदेशों से आए शिव भक्त एकाकार हो जाते हैं। उन्हें न किसी का नाम जानने की जरूरत है और न उसका धाम जानने की कि वह कहां से आया है।

श्रावण मास शिव भक्तों के लिए सदा से भगवान शंकर की आराधना का पर्व काल रहा है।

सनातन धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रावण महीने को भगवान शंकर का महीना माना जाता है।

सावन मास में भगवान शंकर की आराधना करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। माना जाता है सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल कनखल आते हैं। भूलोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।

सनातन संस्कृति का मूल तत्व है शिव। शिव ही सत्य है, सुंदर है और संपूर्ण है। शिव सृष्टि के आदि और अंत हैं। प्रलय काल में संपूर्ण सृष्टि जिनमें लीन हो जाती है और पुनः सृष्टि काल में जिन से प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। संसार की संपूर्ण ऊर्जा का प्रतीक शिवलिंग है।

श्रावण मास शिव को अति प्रिय है। इसीलिए पूरे श्रावण मास शिव की पूजा होती है। पूरे श्रावण मास श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार हर वर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्री हरि भगवान विष्णु शयन करने चले जाते हैं। इसके बाद फिर कार्ति आईओक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निंद्रा त्याग देते ।

इस समय सृष्टि के संचालन का कार्य भगवान भोलेनाथ के हाथ में आ जाता है। धर्म शास्त्रों में इस समय को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है।

शास्त्र कथाओं के अनुसार श्रावण मास में भगवान शंकर अपनी ससुराल कनखल में दक्षेश्वर बनकर निवास करते हैं। पूरे श्रावण भगवान शंकर दक्षेश्वर के रूप में कनखल में विराजते हैं। इस मास में जो भी व्यक्ति भगवान शिव की आराधना करता है वह विशेष फल को प्राप्त करता है।

श्रावण माह के शुरू होने से पहले आषाढ़ मास की पूर्णिमा से ही हरिद्वार में लाखों की संख्या में कांवड़िए गंगाजल लेने के लिए उमड़ पड़ते हैं।

करोड़ों श्रद्धालु श्रावण के माह में हरिद्वार पहुंचते हैं।

कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति हमारी सनातन धार्मिक आस्था और त्यागमयी संस्कृति का प्रतीक है।

देहरादून से लेकर दिल्ली फरीदाबाद से करनाल और  राजस्थान तक के पांच राज्यों के कोई 70 जिलों के करोड़ों शिवभक्त श्रद्धालु गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं।

भगवान भोलेनाथ के प्रति मन में आस्था के साथ शिव भक्तों की बढ़ती अटूट श्रंखला से हाईवे पर भक्ति की अविरल धारा बहती है।

हरिद्वार से दिल्ली तक के लगभग 200 किलोमीटर का हाईवे कांवड़ यात्रा में पूरी तरह से शिवमय नजर आता है, तो हरिद्वार से मुजफ्फरनगर होकर पानीपत तक का लगभग 175 किलोमीटर का मार्ग भी भगवान शिव के जयकारों से गूंज उठता है।

कांवड़ यात्रा में भाग लेने वाले कांवड़ियों को कई नियमों का पालन करना होता है।
जैसे वह चारपाई पर नहीं सोएंगे। तेल साबुन का प्रयोग नहीं करेंगे। सात्विक भोजन करेंगे। शुद्धता का विशेष ध्यान रखेंगे

कांवड़ियों के साथ साथ उनके परिजनों को भी नियम संयम से रहना पड़ता है।

कावड़ लाने वाले बहुत से शिवभक्त कांवड़िए अपनी मनोकामना पूरी होने पर कांवड़ लेकर आते हैं और बहुत से शिव भक्त ऐसे होते हैं जो केवल भगवान भोले को प्रसन्न करने के लिए कांवर लेकर आते हैं।

कांवड़ लाने की परंपरा युगो से चली आ रही है। कई प्रकार की किंवदंतिया कावड़ लाने के बारे में प्रचलित है। त्रेता युग में श्रावण मास में ही श्रवण कुमार ने कांवड़ यात्रा शुरू की थी।

भगवान परशुराम ने अपने आराध्य देव शिव को प्रसन्न करने के लिए कांवड़ में गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था।

आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए श्रावण मास में शिव भक्त कावड़ में गंगाजल भरकर पैदल यात्रा कर शिव मंदिरों में गंगाजल चढ़ाते हैं।

कांवड़ यात्रा के लिए प्रशासन विशेष तैयारियां करता है।

श्रावण माह के शुरू होने में अभी कई दिन होते हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान के दूर के इलाकों के स्थानों पर कांवड़ में पवित्र गंगाजल लाने वाले श्रद्धालुओं का क्रम शुरू हो जाता है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान के दूर के इलाकों के कांवड़िए आषाढ़ मास की द्वितीय तिथि को जगन्नाथ रथ यात्रा वाले दिन से कावड़ में गंगाजल लेकर प्रस्थान कर देते हैं। ये श्रद्धालु लगभग 25 दिन की कठिन पैदल यात्रा पूरी करके अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचकर महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

कांवड़ पदयात्रा शुरू होते ही सड़कों पर बम भोले के जयकारे गूंजने लगते हैं।

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में प्रतिवर्ष होने वाली कांवड़ यात्रा गुरु पूर्णिमा से शुरू होती है। कांवड़ यात्रा देश के सबसे बड़े क्षेत्र में फैला हुआ धार्मिक आयोजन है। हरिद्वार से शुरू होने वाली कावड़ यात्रा का क्षेत्र पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली तक फैला हुआ होता है। करोड़ों शिव भक्त कावड़ में गंगाजल लेकर भगवान भोलेनाथ का जय जयकार करते हुए पैदल ही शिवालयों की ओर आगे बढ़ते हैं। कांवड़ियों के बम भोले के जयकारे चारों ओर गूंजने लगते हैं। जैसे जैसे महाशिवरात्रि का पर्व नजदीक आता जाता है कांवरियों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

कावड़ यात्रा में सबसे पहले राजस्थान के कांवड़ियों के जत्थे जय भोले, बम बम के जयकारों के साथ निकलना शुरू हो जाते हैं।

कांवड़ यात्रा में मुजफ्फरनगर शहर का नजारा पूरी तरह से बदल जाता है।

हरिद्वार से पवित्र गंगा जल लेकर लाखों शिव भक्त जब एक साथ नगर में होते हैं पूरा नगर शिवमय नजर आता है। सरकारी भवनों , बाजारों व कावड़ सेवा शिविरों में सब और रंग बिरंगी कावड़ लिए भगवा वेश धारी शिवभक्त ही नजर आते हैं

भगवान शिव का महाशिवरात्रि पर गंगाजल से अभिषेक करने की कामना को लेकर लाखों शिव भक्त अपने अपने गंतव्य की ओर आगे बढ़ते हैं।

हरियाणा में बागोट का शिव मंदिर, मेरठ में औघड़नाथ मंदिर व बागपत में पुरा महादेव मंदिर में लाखों की संख्या में शिव भक्त कावड़ गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इनके अतिरिक्त लाखों-करोड़ों शिव भक्त अपने अपने पास के शिवलिंग पर हरिद्वार से गंगाजल लाकर चढ़ाते हैं।

मुजफ्फरनगर से हरिद्वार रोड, मुजफ्फरनगर से खतौली मेरठ रोड , मुजफ्फरनगर से शामली रोड, मुजफ्फरनगर से शाहपुर बुढ़ाना रोड पर कांवरियों की कतार ही दिखाई देती है।

जनपद में व हाईवे पर सैकड़ों की संख्या में शिव भक्तों की सेवा के लिए जगह जगह कावड़ सेवा शिविर खुल जाते हैं, जिनमें निशुल्क भंडारे की व्यवस्था होती है। आम नागरिक भी शिव भक्तों की सेवा में जुट जाते हैं।

अन्य राज्यों से भी आकर श्रद्धालु यहां पर बड़े बड़े कावड़ सेवा शिविर लगाते हैं।

हरिद्वार से गंगाजल लेकर दिल्ली हरियाणा और राजस्थान आदि प्रदेशों के लिए जा रहे कांवड़ियो की भारी भीड़ दिल्ली देहरादून नेशनल हाईवे और चौधरी चरण सिंह गंग नहर कांवड़ पटरी मार्ग पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता । दोनों मार्ग शिव भोला से भर कर चलते हैं।

गंग नहर पटरी मार्ग पर भी शिव भक्तों की संख्या बढ़ती जाती है। राजस्थान दिल्ली के अधिकांश शिव भक्त इस मार्ग से गुजरते हैं।

भगवान भोलेनाथ के प्रति मन में आस्था के साथ शिव भक्तों की बढ़ती अटूट श्रंखला से हाईवे पर भक्ति की धारा बहने लगती है।

आस्था के पथ पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ता है। गंगोत्री गोमुख ऋषिकेश हरिद्वार से गंगा जल लेकर कांवड़ियों का जत्था श्रद्धा व उत्साह के साथ आगे बढ़ता है। हाईवे से लेकर शहर की रौनक बढ़ गई है। रंग बिरंगी कांवड आकर्षण का केंद्र बन रही है। सावन माह शुरू होते ही जनपद में शिव भक्तों की भीड़ उमड़ने से वातावरण शिव मय हो गया है।

नेशनल हाईवे पूरी तरह से कांवड़ियों की गिरफ्त में आ जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक से बढ़कर एक सुंदर सुंदर कावड़ वे झांकियों का रेला उमड पड़ता है जिसे देखने के लिए आसपास की लाखों की जनता राष्ट्रीय राजमार्ग पर डेरा डाल लेती है। डीजे की धुन पर शंकर पार्वती, राधा कृष्ण के रूप में भोले एक से बढ़कर एक सुंदर नृत्य को प्रदर्शित करते हैं।

भीड़ के चलते राष्ट्रीय राजमार्ग पर जगह जगह जाम की स्थिति बन जाती है।

हरिद्वार से गंगाजल ला रहे शिव भक्तों का सैलाब जब उमड़ता है तब सड़कें भोले के जयकारों से गूंज उठती हैं।

शिव भक्त कांवड़ियों का जत्था जब शिव के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ता है तब हाईवे , गंग नहर पटरी मार्ग, मेन रोड व अन्य मार्ग बम बम के जयकारों से गूंज उठते हैं।

दिल्ली व दिल्ली से लगे हरियाणा के इलाके के शिवभक्त श्रद्धालु डीजे लगी हुई बड़ी-बड़ी झांकी लगी हुई कावड में गंगाजल लेकर आते हैं।

हरिद्वार से दिल्ली व हरियाणा जाने वाली विशाल कावडों को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है।

शिवालयों की ओर बढ़ते शिव भक्त कांवड़ियों में इतना उत्साह होता है कि तपती धूप में वे नंगे पैर अपने गंतव्य की ओर आगे बढ़ते रहते हैं।

कावड़ियों में शिव भक्ति के साथ राष्ट्र भक्ति भी हिलोरे ले रही होती है। श्रद्धा के सैलाब में देश भक्ति की गंगा की धारा भी अविरल बहती है।

देश की सबसे बड़ी कांवड़ यात्रा में आस्था के साथ देश भक्ति का जज्बा भी हिलोरे मारता है।

हरिद्वार से आने वाली रंग बिरंगी कांवड़ों पर राष्ट्रीय ध्वज शान से लहराता है।

कांवड़ यात्रा में हर हर महादेव बम भोले के जय घोष के साथ साथ भारत माता की जय , वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए शिव भक्त शिवालयों की ओर आगे बढ़ते हैं।

तिरंगे से सजी कांवड़ शिव भक्तों की आस्था के साथ साथ देश भक्ति को दर्शाती हैं।

हरिद्वार से आती अधिकांश कांवड़ों पर लहराता हुआ तिरंगा देश प्रेम से ओतप्रोत कर देता है।

अद्भुत होता है वह दृश्य जब कोई शिव भक्तों का दल 100 से 150 फुट लंबा तिरंगे झंडे के साथ हरिद्वार से कावड़ में गंगाजल लेकर जिस जिस रास्ते से गुजरता है वहां वहां दर्शकों का हुजूम उमर पड़ता है। तिरंगे झंडे वाली विशाल कावड़ को देख कर हर कोई देश प्रेम से रोमांचित हो जाता है। हर हर महादेव के साथ भारत माता की जय से वातावरण गुंजायमान हो जाता है।

रात के समय हाईवे ही शिव भक्तों की सज्जा बन जाता है। जिसे सड़क पर जहां जगह मिलती है वह वही पर शिव भोले का नाम लेकर सो जाता है।

 

जैसे जैसे महाशिवरात्रि नजदीक आती जाती है शिव भक्तों का सैलाब भी वैसे वैसे उमड़ता जाता है।

दिल्ली हरियाणा राजस्थान के शिव भक्तों का सैलाब जब मुजफ्फरनगर से गुजर चुका होता है।

इसके बाद अब मेरठ बागपत बुलंदशहर हापुड़ और अन्य स्थानों में जलाभिषेक करने वाले भोले आने प्रारंभ हो जाते हैं।

बड़ी संख्या में कांवड़िए अपने अपने गांव देहात कस्बों में स्थापित शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। ये कांवड़िए जनपद के संपर्क मार्गो से अपने अपने गंतव्य को जाते हैं। ये रास्ते भी शिव के जयकारों से गुंजायमान हो उठते हैं।

अब स्थानीय कांवड़ियों का सैलाब उड़ने लगा है। हाईवे पर शिव भक्तों की लाइन टूटने का नाम नहीं लेती है।

गर्मी हो बरसात धूप हो या छांव हर हर महादेव बोल बम बोल बम आदि के जयकारों के साथ शिव भक्त लगातार आगे बढ़ते रहते हैं। मुजफ्फरनगर शहर व देहात शिवमय हो जाता है चारों ओर भोले के भजन ही सुनाई देते हैं।

दूसरे प्रांतों से आने वाले शिव भक्त कांवड़ियों की संख्या कम हो जाती है जबकि इस समय मेरठ बागपत शामली मुजफ्फरनगर के शिवभक्त कावड़ियों की संख्या बढ़ जाती है।

इस समय एक से एक सुंदर विशाल व रंगीन रोशनी से सजी झांकियों वाली कावड को तेज आवाज वाले डीजे पर बजते धार्मिक गीतों पर झूमते नाचते गाते कांवड़िए लगातार एक के बाद एक कांवरियों की टोली आती रहती हैं।

मुजफ्फरनगर शहर में रात के समय बड़ी बड़ी डीजे लगी सुंदर झांकियों वाली कांवड़ों की कतार लग जाती है। इन  कांवड़ों को देखने के लिए पूरा नगर सड़कों की ओर उमड़ पड़ता है।

बड़ी कांवड़ों पर कलाकार शिव पार्वती राधा कृष्ण मां काली आदि के रूप में धार्मिक गीतों पर नृत्य करते हुए चलते हैं।

राधा कृष्ण का मोर नृत्य भोले का तांडव नृत्य मां काली हनुमान जी व देश भक्ति भोले की बारात आदि की तरह-तरह की झांकियां होती हैं।

धार्मिक गीतों के साथ राष्ट्रभक्ति के गीतों पर जमकर नृत्य करते चलते हैं। जिसे देख कर पूरा नगर व देहात के लोग भाव विभोर हो जाते हैं।

जगह जगह शिव भक्तों के रुकने, भोजन नाश्ता नहाने सोने दवाई का इलाज की व्यवस्था स्थानीय नागरिक व सामाजिक संस्थाएं बड़े पैमाने पर करते हैं।

राह चलते कांवड़ियों को अपने अपने कांवड़ शिविर में रोकने के लिए एक दूसरे सामाजिक संगठनों में होड़ मची रहती है।

कांवड़ियों के मनोरंजन के लिए शिविरों में झांकियों भजन मंडलियों व डीजे साउंड का प्रबंध किया जाता है। डीजे पर बजते धार्मिक भजनों व कलाकारों के नृत्य के साथ कांवड़िए जमकर नृत्य करते हैं और भरपूर आनंद उठाते हैं।

पूरा मार्ग भगवान भोले शिव शंकर के गीतों से गुंजायमान हो उठता है। केसरिया रंग के कपड़े पहने कांवड़ियों, उनके कंधे पर रखी रंग बिरंगी झालरों से सजी कांवड़ तथा साथ में चल रही डीजे साउंड लगी गाड़ियों पर बजते भोले शंकर के गीत हर किसी के दिल को छू जाते हैं।

 

कांवड़ सेवा शिविर, सार्वजनिक स्थान , पार्क कहीं भी नजर दौड़ाएं केसरिया परिधान पहने भोले नजर आते हैं।

नाचते गाते व झूमते जाते कांवड़ियों के जत्थों को देखने के लिए लोग सड़कों पर उमड़ पड़ते हैं।

गंग नहर की पटरी पर हरिद्वार से कांवड़ ले कर आने वाले शिव भक्त भोले बम बम का जयकारा लगाते हुए नाचते गाते हुए आगे बढ़ते हैं।

नहर की पटरी पर जगह जगह सेवा शिविर खुल जाते हैं।

कांवड़ यात्रा के पहले चरण में राजस्थान, हरियाणा , दिल्ली के कांवरिया पवित्र जल लेकर लौट रहे हैं। शिव भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।

हरिद्वार से दिल्ली और मुजफ्फरनगर के शिव चौक से हरियाणा के पानीपत तक अटूट श्रंखला सी बन गई है। भगवान शिव का जय घोष करते हुए बढ़ रहे शिव भक्तों को देख कर लगता है कि गंगा जी हाईवे पर बह रही हो।

सिसौना से कांवरिए, बझे डी गांव और सरवट रोड, जीटी रोड से होकर शिव चौक पहुंचते हैं।

मुजफ्फरनगर के शिव चौक से यह धारा दो भागों में बट जाती है। एक धारा हरियाणा की ओर मुड़ जाती है तो दूसरी धारा सीधे मेरठ दिल्ली की ओर चल पड़ती है।

शिव चौक पर शिव जी की मूर्ति की परिक्रमा करके हरियाणा के कांवरिये भगत सिंह रोड से होकर शामली की ओर जाते हैं।

राजस्थान, दिल्ली की ओर जाने वाले शिव भक्त यहां शिव जी की मूर्ति की परिक्रमा करके सीधे जी जीटी रोड से होकर हाईवे की ओर जाते हैं।

झांकियों से सजी हुई विशाल कावड़ आनी शुरू हो जाती है। भगवान शंकर, शिव पार्वती, भगवान श्री राधा कृष्ण, गणेश जी , भोले की बारात, शिवलिंग आदि तरह-तरह विभिन्न झांकियों को प्रदर्शित करती विशाल कावड़ आकर्षण का केंद्र बनी है।

शिव भक्तों और रंगीन रोशनी से सजी विशाल कावड़ को देखने के लिए लोग उमड़ रहे हैं। इन्हें देखने के लिए देर रात तक लोगों की भीड़ लगी रहती है। सुंदर सुंदर कांवड़ आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। रात्रि में जगमगाती लाइटों का अलग ही नजारा दिखाई देता है।

शाम ढलते ही शहर भोले की भक्ति में डूब जाता है। सुंदर सुंदर कांवड़ों को देखने के लिए हजारों की संख्या में महिलाएं और बच्चे कांवड़ मार के दोनों और एकत्र हो जाते हैं। नाचते गाते शिव भक्तों व रंगीन लाइटों से सजी सुंदर झांकियों वाली विशाल कांवड़ों को देख कर अपने आपको आनंदित महसूस करते हैं। इतने भव्य भोले के दृश्य को देखकर लोगों में अटूट श्रद्धा की भावना दिखाई देती है।

हरिद्वार से गंगाजल लेकर आने वाले कांवड़ियों की भीड़ जैसे-जैसे बढ़ती है शहर की जनता में उत्साह भी उतना ही बढ़ता जाता है। लोग भक्ति भाव से कांवड़ मार्ग पर जुटते हैं।

नाचते गाते हुए भक्ति की मस्ती में अपने गंतव्य की ओर कूच करते कांवड़िए अलग ही छाप छोड़ते हैं, विभिन्न वेशभूषा में अपने पूरे ग्रुप में करतब दिखाते शिव भक्त मनोहरी दृश्य प्रस्तुत करते हैं। शिव पार्वती का नृत्य प्रत्येक झांकी में आम होता है ।

बहुत से ग्रुप अपनी कांवड़ पर बहुत धन खर्च करते हैं। रात्रि में उनकी कांवड़ की छटा अलग ही दिखाई देती है।

 

शिव चौक का अद्भुत नजारा

 

केसरिया परिधान पहने कांवड़िए रंग बिरंगी कावड़ लेकर बम बम , हर महादेव के उद्घोष के साथ शिव मूर्ति की परिक्रमा करके आगे बढ़ते हैं। इस समय शिव चौक का नजारा अद्भुत होता है। चारों ओर कंधे पर कावड़ लिए शिवभक्त ही नजर आते हैं।

एक से बढ़कर एक मनोहर झांकी देखने को मिलती है। विभिन्न स्वरूप को धारण कर सुंदर झांकियों के साथ

कांवड़िए शिव मूर्ति से होकर गुजरते हैं। दिल्ली मेरठ व हरियाणा के रहने वाले विभिन्न स्वरूपों के साथ बनी आकर्षक झांकियों के साथ शिव मूर्ति से होकर गुजरते हैं। इन आकर्षक झांकियों का प्रदर्शन शिव मूर्ति के पास होता है, जिससे हर रात्रि के समय शिव चौक वह आस-पास के मार्ग पर इन्हें देखने के लिए भारी हुजूम इकट्ठा हो जाता है। कुछ कांवड़ियों के दल तो ऐसे ऐसे नजारे पेश करते हैं कि देखने वाले हतप्रभ रह जाते हैं।

कांवड़ यात्रा के इन कुछ दिनों में हजारों की संख्या में सजी-धजी विशाल कावड़ शिव मूर्ति से होकर गुजरती हैं।

कावड़ियों द्वारा हैरतअंगेज करतब भी प्रस्तुत किए जाते हैं। जिन्हें देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है।

 

 

नेशनल हाईवे 58 व गंग नहर कांवड़ पटरी मार्ग पर इन दिनों उत्सव जैसा माहौल होता है। विभिन्न प्रकार की सजी-धजी कांवड़ आकर्षण का केंद्र होती हैं। इन रास्तों पर शिव भक्तों का सैलाब सा उमड़ पड़ता है। महिलाएं तथा बच्चे भी श्रद्धा के रंग में रंगे हुए कांवड़ कंधे पर उठाए अपने गंतव्य की ओर हर हर महादेव बम बम का जयकारा लगाते हुए खुशी खुशी से आगे बढ़ते चले जाते हैं।

हरिद्वार से पवित्र गंगा जल लेकर कावड़ियों का सैलाब अपने अपने शिवालयों की ओर तूफानी गति से आगे बढ़ता है। इस समय चारों और भोलों के द्वारा लगाए जाने वाले बम बम भोले के जय घोष के जयकारे की गूंज ही सुनाई देती है।

तरह-तरह की रंग बिरंगी कांवड़ धारण किए हुए कांवड़िए विचरण करते हुए दिखाई देते हैं। कोई अकेला तो कोई

टोली में घूम रहा होता है।

साधारण कांवड़ से लेकर बड़ी बड़ी कांवड़ भोले के भक्त लेकर आते हैं।

कंधे पर कांवड़ , तपती धूप, पैरों में छाले फिर भी भोले के भक्त बम बम भोले कहते हुए तेजी से शिवालयों के और आगे बढ़ते रहते हैं।

 

रात्रि के समय कांवड़ सेवा शिविरों में की गई साज सज्जा अलग ही छटा बिखेरती है।

शिव भक्त कांवड़िए यहां पर विश्राम करते हैं। शिविरों में

भोले के भक्त डीजे पर बज रही धार्मिक धुनों पर जमकर नृत्य करते हैं।

शिविरों में भोले के भक्तों को गर्म दूध, जलेबी, चाट, पकौड़ी के अलावा विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं

पूरे हाईवे पर केवल भगवा वस्त्र धारण किए कावड़ियों का ही सैलाब दिखाई देता है।

रात में हाईवे का माहौल पूरा उत्सव जैसा हो जाता है। बड़ी संख्या में आस पास से शहरवासी व ग्रामीण रात के समय शिविरों पर भोले के भक्तों के नृत्य को देखने के लिए पहुंचते हैं। पूरा हाईवे शिवमय माहौल में रंगा नजर आता है।

गंगाजल लेकर आ रहे कांवड़िए बम बम का उद्घोष करते हुए मंदिर में शिवालयों की ओर बढ़ते हैं।

कावड़ लाने वालों में युवाओं के साथ साथ महिलाएं बच्चे वह बड़े बूढ़े भी होते हैं। इन शिव भक्तों को न तो खाने पीने की सुध होती है बस उनकी मंजिल तो अपने अभीष्ट शिवालय मंदिर है जहां उन्हें साथ लाएं गंगाजल से शिवलिंग का जलाभिषेक करना होता है।

धार्मिक भजनों के साथ देशभक्ति के गीतों के साथ अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ते जाते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग पर जहां बड़ी बड़ी आकर्षक कांवड़ गुजरती है, वहीं गंग नहर कांवड़ पटरी मार्ग पर भी कांवड़ियों की भीड़ बड़ी संख्या में गुजरती है। इन मार्गों पर कांवड़ियों का सैलाब देखने को मिलता है।

नेशनल हाईवे 58 कांवड़ियों की लाइने नहीं टूट पा रही हैं। नेशनल हाईवे पर पूरी तरह कांवड़ियों का कब्जा हो जाता है। मुजफ्फरनगर नगरी में हर तरफ बोल बम बोल बम, हर हर महादेव के जयकारो से गुंजायमान हो जाती है, पूरी नगरी शिव में होकर भगवान शंकर की कुमारी में डूब जाती है।

शिव भक्त एक से बढ़कर एक सुंदर झांकियों से सजी रंगीन रोशनी ओं से नहाई विशाल कावड़ लेकर आते हैं। डीजे पर भोले के भजनों पर नाचते हुए कांवरिये चलते हैं।

नेशनल हाईवे पर स्थित गांव नरा जड़ौदा, बेगराजपुर, मंदसौर पुर, घासीपुरा, आदि गावो के किनारे देर रात तक भीड़ जुटी रहती है।

पूरा हाईवे शिव भक्तों के सैलाब से भरा रहता है। सड़कों पर केसरिया रंग ही दिखाई पड़ता है । शहर और देहात भगवा रंग से नहाए रहते हैं।

हरिद्वार की और से कांवड़ लेकर आ रहेशिव भक्तों के साथ बड़ी-बड़ी झांकियां और डीजे पर बज रही भक्ति की धुनों पर नाचते हुए कांवरिये हर हर महादेव, बोल बम बोल बम, भोले शंकर के जयकारा लगाते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। रंगीन भव्य लाइटों से जगमग कांवड़ शिव भक्तों का पूरा ग्रुप लेकर चलता है। बारी बारी से शिव भक्त कांवर को ग्रहण करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

एक के बाद एक सुंदर कांवड़ और झांकियों की धूम पूरे हाईवे पर लगी रहती है। इन्हें देखने के लिए जीटी रोड पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

अब हर तरफ भोले ही नजर आते हैं। दिन हो या रात भगवान शिव का जय घोष सुनाई देता है।

 

हरिद्वार से गंगाजल लेकर चलने वाले कांवरियों के मार्ग में मुजफ्फरनगर के शिव चौक को सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यहां अधिकांश शिव भक्त भगवान शंकर की प्रतिमा की परिक्रमा करके ही आगे बढ़ते हैं।

कांवड़ मार्ग में शिव मूर्ति शिव भक्तों की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है।

हरिद्वार से जो कांवरिया प्रस्थान करता है उसमें से 90 प्रतिशत कांवरिया शिव चौक अवश्य पहुंचता है।

शिव चौक से ही कांवरियों की धारा दो भागों में बंटती है। यहां से हरियाणा की ओर जाने वाली कॉमेडी शिव मूर्ति के पीछे वाले मार्ग से आगे बढ़ते हैं। इसी मार्ग पर कुछ किलोमीटर चल कर बुढाना तिराहे से जिन्हें आगे पानीपत की ओर जाना होता है वह सीधे शामली कैराना रोड से जाते हैं, और जिन्हें सोनीपत की ओर जाना होता है मैं यहां से शाहपुर बुढ़ाना मार्ग से आगे जाते हैं।

 

 

 

बाहरी कावड़ियों के साथ स्थानीय कावड़ियों का आना भी शुरू हो जाता है। कांवड़ियों की भीड़ लगातार बढ़ती है। शिव भक्तों की अपार भीड़ से मुजफ्फरनगर की धरा शिव नगरी में बदल जाती है। चारों ओर बम बम भोले, हर हर महादेव के जयकारे घूमते रहते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग व अन्य रास्ते जहां से कमरिया गुजरते हैं वहां के सभी कांवड़ सेवा शिविर में  भोलों की भारी भीड़ होती है। सेवा शिविरों के अलावा मार्ग के आसपास के मंदिर धर्मशाला स्कूल कॉलेज सभी शिव भक्तों से फुल हो जाते हैं।

गंगाजल लेकर आने वाले शिव भक्त कांवड़ियों की भीड़ बढ़ती जाती है। नगर में आस्था में श्रद्धा की अविरल धारा बहने लगती है। हरियाणा राजस्थान व दिल्ली आदि दूरस्थ राज्यों के कांवड़ियों के अलावा स्थानीय कांवड़िए जो पुरा महादेव व आस पास के स्थानों पर शिव मंदिरों में गंगाजल लाकर चढ़ाते हैं पहुंचना शुरू हो जाते हैं।

सिसौना बहेड़ी के रास्ते मुजफ्फरनगर में प्रवेश करने वाले कांवड़ियों की कतारें टूटती नहीं है लगातार शिव भक्त कांवड़ियों का  अपार      सैलाब मुजफ्फरनगर में उमड़ पड़ता है।

देश की सबसे बड़ी कांवड़ यात्रा में आस्था व शिव भक्ति के साथ साथ देशभक्ति का जज्बा भी हिलोरे मारता है। गंगाजल लेकर आ रहे शिव भक्त अपनी रंग बिरंगी कांवडो पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा झंडा शान से लहराता है। शिव भक्त कांवड़ यात्रा में हर हर महादेव के साथ साथ भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए शिवालयों प्योर भरते हैं शिव भक्तों की आस्था और देश भक्ति आम जनमानस में आकर्षण का केंद्र बनती है उनमें भी आस्था के साथ देश भक्ति की भावना आती है।

शिव भक्त कांवड़ियों अनेक रंग दिखाई पड़ते हैं उनमें से ही एक है ।

शिव भोले की बारात

 

भोले की बारात में देवताओं के संग भूत प्रेत भी नाचते गाते हैं। सावन की शिवरात्रि पर शिव जी की बारात में लाखों कांवड़िये शामिल हो रहे होते हैं। भोले के भक्त विभिन्न रूप धरे सड़कों पर नाचते गाते आगे बढ़ते हैं। कुछ भोले के बाराती भूत प्रेतों के मुखोटे धारण किए हैं।

भोले के बारातियों में राधा कृष्ण बजरंगबली गणपति दुर्गा काली भी नाच रहे हैं तो भारतीय फौजियों का रूप धरे नौजवान भी हैं। जो कावड़ियों की टोली में नाचते गाते हुए आगे बढ़ते हैं।

 

लाखों कांवड़िए जो अपने आराध्य देव भगवान शिव के अभिषेक के लिए पवित्र गंगा जल को लेकर शिवालयों की ओर बढ़ते हैं ।

कुछ शिव भक्त भोले भगवान शंकर के बाराती भूत प्रेतों का मुखौटा लगाएं नाचते गाते आगे बढ़ते हैं

 

गंगा की अविरल धारा की तरह चलती डाक कावड़

महाशिवरात्रि का पर निकट आते ही डाक कावड़ लाने वाले कावड़ियों के दल हरिद्वार पहुंचने लगते हैं।
सबसे पहले दूरस्थ इलाकों के शिव भक्त हरिद्वार गंगाजल लेने पहुंचते हैं। 80 घंटे 72 घंटे 60 घंटे में पहुंचने वाली डाक कावड़ को लाने वाले शिव भक्त गंगाजल लेकर चलते हैं।
डाक कावड़ लाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश दिल्ली राजस्थान हरियाणा पंजाब के शिव भक्तों से पूरा हरिद्वार पट सा जाता है। चारों ओर शिव भक्त भोले ही दिखाई देते हैं।

डाक कावड़ ले जाने के लिए टाटा सुमो मिनी ट्रक कार मिनी ट्रक टाटा 407 होंडा सिटी मारुति अल्टो स्वराज माजदा सैंटरो बोलेरो होंडा सिटी बीते जमाने की एंबेसडर आदि ही नहीं अपितु शिव भक्त भोले ट्रैक्टर ट्राली जुगाड़ ऑटो रिक्शा तक में अप्रत्याशित संख्या में शिव भक्त श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं। लाखों की संख्या में हल्के वाणिज्यिक वाहन चार पहिया वाहन डाक कावड़ लाने के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं।
वाहनों के माध्यम से डाक कावड़ ले जाने वाले शिव भक्तों में सर्वाधिक संख्या हरियाणा तथा दिल्ली के श्रद्धालुओं की होती है। मेला क्षेत्र तथा हरिद्वार दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर जिधर नजर डाली जाए तीर्थ नगरी हरिद्वार वाहनों से फटी हुई नजर आती है।

पैदल यात्रा का कावड़ लाने वाले शिव भक्तों के सैलाब के बाद अब वाहनों के साथ डाक कावड़ लाने वाले शिव भक्तों का अपार सैलाब उमड़ता है।

अब राजस्थान दिल्ली और विशेषकर हरियाणा की ओर जाने वाली डाक कावड़ के दौड़ते कांवड़ियों और वाहनों से राष्ट्रीय राजमार्ग भर जाता है।
डाक कावड़ लाने का चलन हर वर्ष बढ़ता जा रहा है।

डाक कावड़ लाने वाले वाहनों पर उनकी दूरी के अनुसार डाक कावड़ का निर्धारित समय लिखा होता है।
किसी पर हरिद्वार से पानीपत की दूरी मात्र 21 घंटे में लिखी हुई है तो किसी पर हरिद्वार से भिवानी तक की दूरी मात्र 30 घंटे में लिखी हुई है तो कोई राजस्थान की ओर अपने घर पर 40 घंटे में पहुंचना चाहता है तो कोई मात्र 30 घंटे में हरिद्वार से रोहतक के आसपास अपने गंतव्य पर 30 घंटे में पहुंचना चाहता है ऐसे ही किसी डाक कावड़ लाने वाले वाहन पर यह समय भोले की मर्जी पर लिखा होता है। सर्वाधिक डाक कावड़ हरियाणा की ओर जाती है।

महाशिवरात्रि से 2 दिन पहले से डाक कावड़ अनवरत एक सैलाब की तरह इन राज्यों की ओर जा रहे हाईवे पर दौड़ती रहती हैं।

दौड़ते भागते और सीटी बजाते कांवड़िए तेजी से अपने गंतव्य की ओर लौटते हैं। हाईवे पर डाक कांवड़ियों का सैलाब उमड़ पड़ता है। सीटी बजाते भोले का जयकारा लगाते नाचते गाते कांवड़िए तेजी से अपने अपने गांव शहर के शिवालयों की ओर बढ़ते हैं जिससे वे समय पर महाशिवरात्रि के दिन शिवालयों में गंगाजल अर्पित कर सकें।
तेजी से दौड़ते इन शिव भक्तों का जुनून ही कुछ निराला होता है।
डाक कावड़ का नियम है कि इसे लेकर चलने वाले मैं तो गंगाजल पैदल लेकर चल सकते हैं और न ही गंगाजल को लेकर रुक सकते हैं। बीच बीच में गंगाजल लेकर दौड़ने वाले शिव भक्त बदलते रहते हैं।

जिस तरह से पतित पावन गंगा अपने तेज बहाव के लिए जानी जाती है और गंगा के बहाव को कोई नहीं रोक सकता उसी तरह से डाक कावड़ में धारण किए जाने वाले गंगाजल को भी गंगा की अविरल धारा की तरह निरंतर दौड़ते हुए ही हरिद्वार से गंगाजल लेकर मनोवांछित शिवालय तक पहुंचाया जाता है।
हरिद्वार में गंगा जी से डाक कावड़ के लिए गंगाजल लिया जाता है उसके बाद से ही उस गंगाजल को जो धारण करता है वह उसे कहीं रोकता नहीं है। गंगाजल को धारण करने वाले शिव भक्त थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बदलते रहते हैं लेकिन गंगाजल की गति उसी प्रकार से बनी रहती है। शिव भक्त दौड़ते दौड़ते ही कुछ गंगाजल को एक दूसरे को देते हैं। डाक कावड़ का गंगाजल हरिद्वार में जहां से भरा जाता है यह गंगाजल निर्बाध रूप से अपने मनोवांछित शिवालय तक पहुंचाया जाता है। शिवालय तक पहुंचने के बाद भी गंगाजल को तत्काल डाक कावड़ लाने वाले शिव भक्त भगवान शिव को अर्पण करते हैं।
डाक कावड़ में गंगाजल को जिस रूप में धारण किया जाता है उसी रूप में उसे शिवालय तक पहुंचाया जाता है।

गंगा की अविरल धारा की तरह ही चलता है डाक कावड़ के रूप में गंगाजल।

महाशिवरात्रि से 1 दिन पहले दो पहिया वाहन स्कूटर मोटरसाइकिल पर शिव भक्तों का सैलाब हरिद्वार में उमड़ता है। ये शिव भक्त लाखों की संख्या में राष्ट्रीय राजमार्गों पर तूफानी गति से अपने अभीष्ट शिवालयों में जलाभिषेक हेतु
गंगाजल लेकर रवाना होते हैं।

कांवड़ यात्रा के चलते एक पखवाड़े तक हजारों लोगों को रोजी रोटी भी मिलती है और अरबों रुपए का कारोबार भी होता है।
कावड़ को तैयार करने के लिए सैकड़ों हजारों लोगों को रोजगार मिलता है।
कांवर सजाने के लिए रंग बिरंगी झालर तस्वीरें सजावटी सामान खिलौने गंगाजल भरने के लिए प्लास्टिक के कैन कावड़ बनाने के लिए बांस पूजा सामग्री बिजली की झालर
व बिजली का सजावटी सामान।
कांवड़ियों के पहनने वाले कपड़े खाने-पीने की सामग्री बिस्कुट आदि तिरंगे झंडे बनियान अंडरवियर तोलिया प्लास्टिक की चटाई रस्सी कलश आदि जमकर बिकते हैं।

बढ़ते शिव भक्तों के सैलाब के बीच कुछ ऐसे भी होते हैं जो दो जून की रोटी के लिए कड़ी मेहनत करते नजर आते हैं।
कुछ कांवड़ ला रहे शिव भक्तों का मनोरंजन करते हैं। इनमें किन्नरों से लेकर छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं जो शिव पार्वती का भेष बदल कर भक्ति संगीत पर नाच कर शिव भक्तों का मनोरंजन करते हैं। जिसके बदले में खुश होकर शिव भक्त उन्हें इनाम के रूप में रुपए देकर उनकी कला को सराहते हैं। भगवान शंकर व पार्वती का नृत्य देख कर शिव भक्त भोले की भक्ति में डूब जाते हैं।

कावड़ यात्रा कलाकारों व रंग कर्मियों के लिए मंगलकारी साबित होती है। कांवड़ यात्रा से हजारों कलाकार भगवान शिव व पार्वती राधा कृष्ण हनुमान जी काली मां की वेशभूषा में नृत्य कर रोजी रोटी कमाते हैं। कांवड़ यात्रा संगीत मंडलियो, रंग कर्मियों व कलाकारों के लिए रोजी रोटी का जरिया बन जाती है। इस क्षेत्र के डीजे वाले आर्केस्ट्रा पार्टी भजन मंडली नृत्यशाला और रंगकर्मी सैकड़ों हजारों कलाकार झांकियों व कावड़ सेवा शिविरों में नृत्य कर दो जून की रोटी कमाते हैं। कावड़ यात्रा के समय रंगकर्मी, नृत्य शालाओं व जागरण मंडली के कलाकार कावड़ यात्रा के समय कांवड़ियों की झांकियों में डीजे की धुनों पर नृत्य करते हैं। इसके अलावा कुछ कलाकार ऐसे भी होते हैं जो विभिन्न टोलियों में कांवड़ मार्ग पर घूम रहे होते हैं और जहां भी भीड़ देखते हैं वहां नृत्य करना शुरू कर देते हैं। वहीं कुछ कलाकार शिव भक्तों को हास्य व्यंग से लोटपोट कर उनका मनोरंजन करके उनसे इनाम के रूप में कुछ रुपए प्राप्त करते हैं।

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