गढ़मुक्तेश्वर अत्यंत प्राचीन पुराण प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। शिव पुराण में इसका उल्लेख शिववल्लभपुर अर्थात भगवान शिव का अत्यधिक प्रिय स्थान के रूप में है।

यहां गंगा की पवित्र जल धारा के तट पर विशाल रेतीले मैदान पर गढ़ गंगा के नाम से एक विशाल मेला लगता है। इस मेले में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली आदि प्रांतों के लाखों की संख्या में यात्री आते हैं।

चहूंओर हर-हर गंगे के जयघोष के बीच ओर – छोर तक श्रद्धालुओं का सैलाब है। पतित – पावनी, पाप – नाशिनी  गंगा जी के तट पर कार्तिक पूर्णिमा के स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

समूचे मेला परिसर में पश्चिम के ग्रामीण परिवेश को देखा जा सकता है। गढ़ मेले के तंबुओं में ठेठ गंवई जिंदगी की नोक – झोंक , लुका – छिपी, हंसी – ठिठोली का चटक लोक रंग छाया रहता है।

गढ़मुक्तेश्वर का पौराणिक महत्व है। महाभारत काल से ही कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का यहां बहुत महत्व है। कहते हैं कि भगवान परशुराम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। उस समय इसे खांडवी वन क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। शिव पुराण में भी इसका वर्णन है। महाभारत काल में यह स्थान पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर का अहम हिस्सा था।

गढ़मुक्तेश्वर में गंगा के किनारे प्रतिवर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान की परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि महाभारत के विनाशकारी युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन तथा भगवान श्री कृष्ण के मन में युद्ध की विभीषिका और नरसंहार को देखकर भारी ग्लानि हुई। वे इस सोच में पड़ गए कि इस युद्ध में मारे गए असंख्य व्यक्तियों, कुटुम्बियों, बंधुओं व निर्दोष लोगों  की आत्माओं की शांति के लिए क्या उपाय या संस्कार किया जाए। तब सबने एक राय से निर्णय लिया कि खांडवी वन में परशुराम द्वारा स्थापित शिववल्लभपुर (गढ़मुक्तेश्वर) नामक स्थान पर पावन गंगा में स्नान करने तथा वहां पिंड दान करने से सभी संस्कार पूर्ण हो जाएंगे। सभी ने इस निर्णय का स्वागत किया। एकादशी से चतुर्दशी तक इस स्थान पर महाभारत युद्ध में मारे गए सभी लोगों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ किया गया तथा चतुर्दशी की संध्या यज्ञ की समाप्ति पर उन आत्माओं को गंगा में दीपदान कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अगले दिन प्रातः पूर्णिमा को सभी ने गंगा स्नान कर पूजा अर्चना की।

कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में मारे गए व्यक्तियों की आत्मा की शांति के लिए एकादशी से चतुर्दशी तक यज्ञ व चौदस की रात्रि को दीपदान कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई थी इसीलिए यह परंपरा आज भी चली आ रही है।

श्रद्धांजलि इसके बाद से ही गढ़मुक्तेश्वर में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं द्वारा अपने स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए  पावन गंगा में स्नान कर दीपदान करने की परंपरा शुरू हुई।

हजारों वर्षों से कार्तिक पूर्णिमा पर गढ़ गंगा मेले का आयोजन होता आ रहा है। प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां कार्तिक पूर्णिमा पर पापहरिणी गंगा में स्नान करने और अपने स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए यहां दीपदान करने आते हैं।

कार्तिक मेला वैसे तो कई दिन पहले ही शुरू हो जाता है। हर रोज लाखों श्रद्धालु गंगा की रेती में पड़ाव डालने आते रहते हैं लेकिन चतुर्दशी के दिन अचानक मेले की रौनक बढ़ जाती है। दीपदान करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। हर रास्ता भीड़ से खचाखच भर जाता है।

कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी पर लाखों श्रद्धालु  गंगा जी में अपने दिवंगत स्वजनों की आत्मशांति   के लिए पिंड दान व गंगा में दीपदान करते हैं। उस समय गंगा के जल  में तैरते असंख्य दीपों से गंगा आकाशगंगा का रूप धारण कर लेती है। गंगा की जलधारा के साथ बहते दीपों का दृश्य बड़ा ही मनोहारी प्रतीत होता है।

इस दिन सूर्यास्त के बाद लाखों श्रद्धालु गंगा के तट पर पहुंचते हैं। जहां गंगा स्नान के बाद वह घास से बनी आसन पर जलते हुए पांच या सात दीपक रख कर गंगा में प्रवाहित करते हुए पितरों की आत्मशांति की कामना करते हैं। पुरखों की आत्मशांति के लिए कितने ही सिर मुंडवाते हैं तो कितने ही पिंडदान करते हैं।

पुरानी चली आ रही परंपरा के अनुसार आज भी गंगा किनारे यह विशाल मेला लगता है दीपावली के बाद से ही इस मेले की तैयारियां शुरू हो जाती हैं दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होकर यह मेला मार्गशीर्ष कृष्ण की द्वितीय तक चलता है

गंगा के रेतीले मैदान में डेरों व तंबुओं की नगरी बसाकर यह मेला संचालित किया जाता है। दीपावली के बाद से ही डेरों व तंबुओं की विशाल नगरी बननी शुरू हो जाती है।

मुख्य पर्व के कई दिन पहले से ही भारी तादाद में लोग मेले में आना शुरू कर देते है। जैसे-जैसे मेले की तरफ बढ़ते हैं तो दृश्य सुहाना होता जाता है। अपनी –  अपनी बैल गाड़ियों, बुग्गियों, घोड़ा गाड़ी, ट्रैक्टर ट्रालियों आदि वाहनों में आकर लाखों नर नारी व बच्चे यहां विशाल रेतीले मैदान में तंबुओं व डेरों की विशाल नगरी बसाते हैं।  रंग बिरंगे परिधान पहने गीत गाती हुई महिलाएं बरबस लोगों को अपनी ओर देखने के लिए मजबूर कर देती हैं।

गढ़ गंगा मेला नवंबर महीने में लगता है इस समय दिन में सूरज की गर्मी के चलते सर्दी का असर अधिक नहीं होता लेकिन रात के समय गंगा के रेतीले तट पर कड़कड़ाती ठंड पड़ती है। इसके बाद भी गंगा मैया के जय कारे और लक्कड़ महाराज के जयकारों के बीच श्रद्धालु पहुंचते हैं।  श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से जहां समूचे मेला क्षेत्र में अजब सी रंगत फैल जाती है जिसके चलते मेला अपने शबाब पर पहुंचता जाता है।

इस विशाल मेले में सुदूर क्षेत्रों के व्यक्ति आकर आपस में मिलते हैं तथा एक साथ धार्मिक कृत्य करके परिवार की सुख समृद्धि एवं खुशहाली की कामना करते हैं।

मेले में पहुंचने के बाद श्रद्धालु तंबूओं से निकल कर मेले का आनंद उठाते हैं। गंगा के खादर का मैदान  पिकनिक का स्थान बन जाता है।

गढ़ गंगा मेले की शोभा बढ़ाने के लिए मनोरंजन के अधिकांश साधन मेले में पहुंचते हैं। विभिन्न प्रकार के छोटे- बड़े झूले, मौत का कुआं, सर्कस काला जादू खेल- तमाशे आदि श्रद्धालुओं का मनोरंजन करते हैं। छोटे-बड़े व्यापारी भी बड़ी संख्या में आते हैं।

मेले को कई सेक्टरों में बांटा जाता है। इनमें सदर सेक्टर सबके आकर्षण का केंद्र होता है।

सरकार की तरफ से भी इस मेले में कई तरह की प्रदर्शनी यहां लगाई जाती हैं किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग द्वारा लगाए जाने वाली कृषि प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रहती है इसके अलावा प्रदर्शनी में वन विभाग, गन्ना विभाग, उद्यान विभाग, सिंचाई विभाग आदि यहां अपने स्टालों को लगाते हैं।

इस अवसर पर यहां एक बड़ा पशु मेला भी लगता है। जिसमें लाखों की संख्या में पशु  खरीद-फरोख्त के लिए लाए जाते हैं। इस मेले में ज्यादातर गधा, खच्चर और घोड़ों की ही खास खरीद बिक्री होती है।

वैसे तो अनेकों तीर्थयात्री यहां भारी श्रद्धा और विश्वास लेकर आते हैं। उनका मानना है कि मां गंगा में अद्भुत शक्ति है। परंतु आजकल के अनेको नौजवान मेले में तफरी करने भी आते हैं और धार्मिक स्थल का वातावरण खराब करते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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