____________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के१०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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कर्णवास एक प्राचीन तीर्थ है

कर्णवास का पौराणिक काल में नाम भृगुक्षेत्र था। महर्षि भृगु ने यहां रहकर निवास क्या था।

शुंभ निशुंभ राक्षसों को मारने के पश्चात देवी भगवती दुर्गा ने यहां बैठकर विश्राम किया था। यहां का देवी मंदिर कल्याणी देवी के नाम से प्रसिद्ध है। चैत्र और अश्विन के नवरात्रों में यहां मेला लगता है।

कर्ण से भी इस स्थान का संबंध है।सूर्य के वरदान से प्राप्त अपने पुत्र को कुंती द्वारा एक लकडी की मंजूषा में बंद करके गंगा में बहा दिया था। वह पेटिका यंहा गंगा से निकाली गई थी। माता के कान से उत्पन्न होने के कारण इन्हें कर्ण कहा गया। इन्हीं कर्ण के नाम से यह स्थान कर्णवास के नाम से प्रसिद्ध है।

यहीं इसी क्षेत्र में कर्ण तपस्या करते थे। इस स्थान पर एक कर्ण शिला है। कहां जाता है इसी पर बैठकर कर्ण अतिथियों को दान देते थे।

गंगा जी का रमणीय तट होने से कर्णवास दीर्घकाल से संत महात्माओं की निवास भूमि रहा है। यहां गंगा किनारे हमेशा से साधु सन्यासी निवास करते रहे हैं।

यह स्थान प्रसिद्ध संत विद्याधर जी की है जन्मभूमि है।

यहां भगवान बुद्ध ने भी तपस्या की थी इसकी स्मृति पास के बुधौ गांव के रूप में सुरक्षित है।

अनेक संतों की यह साधना भूमि का स्थान रहा है। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद जी ने भी इस स्थान पर रहकर साधना की थी।

यहां गंगा तट पर भूतेश्वर महादेव का मंदिर है।

ज्येष्ठ माह के गंगा दशहरा और कार्तिक पूर्णिमा के गंगा स्नान के पावन अवसर पर गंगा स्नान करने वाली श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है।

 

 

 

 

 

 

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