कैराना पौराणिक नगर है। इसके बारे में मान्यता है कि इसे दानवीर कर्ण ने बसाया था। कर्ण की बसाई हुई कर्णपुरी नगरी आज कैराना के नाम से जानी जाती है।

महाभारत काल में यमुना नदी कैराना से होकर ही बहती थी। कर्ण प्रतिदिन सूर्योदय के समय यमुना के जल में खड़े होकर सूर्य की पूजा किया करते थे। सूर्य देव ने कर्ण की रक्षा के लिए उसके शरीर पर कवच और कानो में कुंडल देकर उस अजेय बना दिया था। जिससे कर्ण को युद्ध में कोई नहीं हरा सकता था। भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर देवराज इंद्र ब्राहमण का रूप धारण कर महाभारत युद्ध में अर्जुन की विजय सुनिश्चित करने के लिए कर्ण से उसके कवच और कुंडल दान में मांगने आए थे। इसी स्थान पर कर्ण ने देवराज इंद्र को अपने कवच और कुंडल दान कर दिए थे। इसके बाद ही कर्ण दानवीर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

राजा कर्ण ने यहां अपने महल के अलावा एक मंदिर बनवाया था और उसी के सामने एक भव्य तालाब का निर्माण करवाया था। कैराना नगर कि उत्तरी दिशा में महल के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। मंदिर अपने नए स्वरूप में आज भी विद्यमान है।

महाभारत युद्ध के समय यह स्थान कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान के समीप ही होने के कारण पांडवों और कौरवों ने यहां भी अपने युद्ध शिविर लगाए थे।

इस स्थान से महाभारत कालीन अन्य स्मृतियां तो अब लुप्त हो चुकी हैं।

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कैराना पर मुगल बादशाहों की नजरे इनायत रही है। बादशाह जहांगीर दो बार कैराना आए और यहां दरबारे आम लगाया। मुगल काल में यहां पर अनेक महत्वपूर्ण निर्माण कराए गए। जिनके अवशेष आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खंडहर बने मुगल काल की गवाही दे रहे हैं।

बादशाह जहांगीर ने अपने खास विश्वसनीय नवाब मुकर्रम खां को उसके द्वारा की गई सेवा से खुश होकर शामली परगना की जागीर जिसमें कैराना भी शामिल था भेंट स्वरूप दे दी थी। जिसकी सीमा करनाल तक लगती थी। इस परगने में दरबारे आम लगता था। नवाब के किले में चार कसौटी पत्थर के खंबे थे जो वर्तमान समय में पानीपत शहर में स्थित सुप्रसिद्ध हजरत मौला कलंदर शाह के मजार में लगे हुए हैं।

नवाब द्वारा इस स्थान को बेहतरीन बागों तथा इमारतों से सुशोभित किया गया। बताया जाता है कि उस समय यहां जो बाग लगाया गया था, वह बाग अपने समय के बेहतरीन बागों में गिना जाता था। यह भी कहा जाता है कि उस बाग के अंदर नौ लाख पेड़ थे। इसी कारण यह नौलखा बाग कहलाता था। इस बाग में गर्मी के मौसम वाले और सर्दी के मौसम वाले दोनों प्रकार के पेड़ थे। यहां तक कि पिस्ते के पेड़ भी इस बाग में मौजूद थे। जबकि भारत में आज के समय में भी और उस काल में भी कहीं पर भी पिस्ता पैदा नहीं होता था। बाग के बीच में एक बहुत ही सुंदर तालाब था। जिसके कुछ अंश इस समय भी मौजूद हैं। इस तालाब में पानी एक और से यमुना नदी से आता था तो दूसरी और से निकल जाता था।
नवाब मुकर्रम खां ने उस नौलखा बाग की सिंचाई के लिए 360 कुएं भी बनवाए थे। उन कुओं में से कुछ कुओं के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।

नवाब का तालाब –

कैराना में स्थित नवाब तालाब के निर्माण की निर्माण की एक रोचक कहानी है। इस बारे में बताया जाता है कि यह मुगल काल का समय था। यहां कैराना में एक हकीम रहा करते थे। कहा जाता है कि उनकी सेवा में हमेशा जिन्न रहा करते थे। एक बार बादशाह जहांगीर की एक बेगम के पेट में दर्द हुआ। जिस पर बादशाह जहांगीर ने उस बेगम के पेट दर्द का इलाज कई वैद्य और हकीमों से करवाया। लेकिन कोई भी बेगम के पेट के दर्द का कारण नहीं जान पाया। तब किसी के द्वारा कैराना के हकीम के बारे में बताए जाने पर बादशाह जहांगीर ने कैराना के हकीम को बुलवाया।

हकीम ने बेगम के सिर पर एक चमत्कारी लकडी रखकर देखा और सारा माजरा समझ लेने के बाद बादशाहा से कहा कि इतनी मात्रा में राख मंगाई जाए कि उस पर बेगम कुछ दूरी तक टहल सकें। कुछ और दूरी पर ही गोखरू कांटे मिली राख बिछा दी जाए। लेकिन इस बारे में बेगम को कोई जानकारी नहीं होनी चाहिए। बादशाहा जहांगीर ने ऐसा ही किया और वह बेगम ठीक हो गई। बेगम के ठीक हो जाने पर बादशाह जहांगीर बहुत खुश हुआ और उसने कैराना की जागीर भेंट स्वरूप उस हकीम को दे दी।

उस हकीम के पुत्र नवाब मुकर्रम खां ने कैराना में अपने वालिद के जिन्न सेवकों से नवाब तालाब बनवाया। इसके निर्माण में लाल रंग के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया। तालाब में एक और से यमुना का शीतल – स्वच्छ जल आता था और दूसरी तरफ से निकल जाता था।

इस नवाब तालाब के चारों ओर नौलखा बाग था। जिस में मेवाओं के पेड़ भी लगे हुए थे। इस तालाब की सुंदरता उस समय देखते ही बनती थी।

इस तालाब के बीच में टापू पर एक सुंदर सफेद पत्थरों से करीब 15 फुट ऊंचा और 60 फुट वर्गाकार चबूतरा बना हुआ है। बताया जाता है कि नवाब साहब अपनी बेगम के साथ नाव में बैठकर तालाब की सैर किया करते थे और बीच में स्थित चबूतरे पर आराम फरमाया करते थे।

नवाब मुकर्रम खां ने अपनी बेगमों के लिए नौलखा बाग में बारादरी का निर्माण कराया था बारादरी अर्थात 12 दरवाजे वाली इमारत जमीन से लगभग 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर पुरानी लाल ईंटों से बनी इस बारादरी में चारों ओर तीन तीन दरवाजे हैं बारादरी से बेगमें नौलखा बाग की खूबसूरती को निहारा करती थी

ऐसा माना जाता है कि उस समय के मशहूर नौलखा बाग और उसमें बनी इमारतों के सौंदर्य को देखने की इच्छा बादशाह जहांगीर भी नहीं दबा पाए थे। इस बाग देखने के लिए बादशाह जहांगीर अपनी कशमीर यात्रा के दौरान कैराना आए थे। इस नौलखा बाग का वर्णन बादशाह जहांगीर की आत्मकथा तुजुक जहांगीरी में भी मिलता है।

यह भी बताया जाता है कि कैराना का बलशाली जॉग पहलवान बारादरी पर ही कसरत किया करता था। जॉग को कोई भी पहलवान हरा नहीं पाया था।

नवाब तालाब के तीन ओर पक्की दिवारें है। जिनमें सीढ़ियां बनी हुई हैं। लेकिन एक तरफ की साइड आज भी टूटी हुई हालत में स्थित है। इसके बारे में कहा जाता है कि इस तालाब को जिन्नों के द्वारा एक ही रात में बना दिया गया था। रात में इस तालाब को बना रहे जिन्न सुबह भोर हो जाने पर एक तरफ की दीवार बिना बनाए अधूरी ही छोड़कर भाग गए थे।

इस तालाब के पास बने किले के नीचे तीन सुरंगे हैं। जिनका एक दरवाजा यमुना नदी की ओर, दूसरा दरवाजा दिल्ली की ओर तथा तीसरी सुरंग का दरवाजा पानीपत की ओर खुलता है। यहीं से एक और सुरंग नवाब गेट से होते हुए दरबार वाली शाही मस्जिद में खुलती है।

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देवी मंदिर-

कैराना का प्राचीन देवी मंदिर देश की ऐतिहासिक धरोहर है। यह मंदिर अपनी तरह का एकमात्र मंदिर है। इस मंदिर की नींव का पत्थर मिरी मराठा ने रखा था। मंदिर की सात मंजिलें हैं और अंदर से पहली मंजिल से सातवी मंजिल मैं पूरा कैराना नगर ही नहीं बल्कि 6 किलोमीटर दूर बह रही यमुना एवं इतनी ही दूर तक के गांवों को देखा जा सकता है।

मंदिर के सबसे ऊपर से दूर बहती यमुना के मनोहारी दर्शन करना अपने आप में सुखद अनुभव होता है।

मंदिर की सबसे ऊपर वाली सातवीं मंजिल तक जाने के लिए जीने की चक्करदार सीढ़ियों को इस प्रकार बनाया गया है कि मंदिर में विराजमान दुर्गा माता की भव्य एवं सुंदर प्रतिमा के ऊपर सीढ़ियों से आते जाते समय पैर नहीं आ सकते।

देवी मंदिर के सामने पक्का तालाब है। इसके आसपास ही जमीन से निकला हुआ प्राचीन शिवलिंग व वणखण्डी महादेव मंदिर तथा आसपास बने देवी – देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर इस स्थान की अनोखी शोभा बढ़ा रहे हैं। आज भी इस स्थान पर आने वाले श्रद्धालु अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं यह स्थान कैराना का स्वर्ग माना जाता है हर वर्ष सावन माह में शिवरात्रि के अवसर पर यहां बनखंडी महादेव मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए कांवड़ियों एवं अन्य भक्त श्रद्धालु भक्तों का मेला सा लग जाता है देश विदेश के पर्यटक भी इस ऐतिहासिक तालाब और मंदिरों को देखने के लिए आते हैं

इसी के पास भव्य जैन मंदिर एवं जैन बाग स्थित है।

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यहां का प्रमुख मेला छड़ी आन जो हजरत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती अजमेर वालों की याद में लगता है हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

बताया जाता है कि बताया जाता है कि ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती अजमेर वाले यहां आए थे और छडियान चौक पर रात्रि में विश्राम किया था तथा इस स्थान पर अपनी छड़ी गाड़ी थी। तभी से यह मैदान छडियान मैदान के नाम से मशहूर हो गया।

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कैराना कस्बे के झिंझाना रोड पर पश्चिम दिशा में स्थित
‘बाले मियां’ का मजार जोकि ‘नौ गजा पीर’ के नाम से भी जाना जाता है।

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मुगल काल में यहां पर नवाब मुकर्रम खां द्वारा बनवाई गई इमारतें बेगम सराय, नवाब तालाब, दरबार मस्जिद, नवाब दरवाजा व अन्य कई इमारतें उस समय की गवाही दे रही हैं।

मुगलकालीन मस्जिद कैराना के मोहल्ला दरबार कला के बारे में कहा जाता है कि इसे औरंगजेब ने बनवाया था यह मस्जिद लगभग 400 वर्ष पुरानी है

इसके अलावा कैराना कस्बे में प्राचीन नवा गेट, नवाब किला, नवाब दरवाजा एंव सुरंग आदि जिनके अवशेष आज भी मौजूद हैं। तालाब के पास कई पुरानी खण्डहरुनुमा इमारतें, दरवाजे व सिदरियों में मंदिर आकार के खण्डहर और
बेगमपुरा मौहल्ला में एक बड़ी पुरानी सराय बेगम महल
बारादरी तथा सराय वाली मस्जिद जो बेगम महरूनिशा ने बनवाई थी तथा कई विशाल दीवारें अब भी खंडहर बनी प्राचीन समय की याद दिला देती हैं।

इमामबाड़ा में शिया मुसलमानों का ऐतिहासिक चबूतरा, कई पुराने किले नुमा मकानों के गुंबद, ईदगाह, जामा मस्जिद, मेंढकी दरवाजा, किला गेट चौकी, इमाम गेट, आदि में पुराने समय के कारीगरों की कारीगरी का कमाल देखने को मिलता है। लेकिन इन इमारतों में से अधिकतर अब खंडहर बन चुकी हैं।

शासन और प्रशासन की लापरवाही के कारण यहां की अनेक ऐतिहासिक एवं पुरातत्व महत्व की इमारतें धीरे धीरे नष्ट हो रही हैं। उनकी सुध लेने को कोई तैयार नहीं है।

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यमुना ब्रिज –

कैराना का यमुना बांध और कैराना बाईपास पर वन विभाग द्वारा हजारों पेड़ लगाए गए हैं कैराना यमुना पुल के पास एक खूबसूरत झील का निर्माण कराया जाएगा जिससे यहां से गुजरने वाले यात्री झील की सुंदरता का आनंद ले सकें कैराना यमुना बांध के दोनों ओर बिडोली से लेकर इस सपोर्ट टीम तक वन विभाग द्वारा पर्यावरण संरक्षण को देखते हुए पेड़ लगाएं जाएंगे
यमुना पुल के पास खाली पड़ी वन विभाग की जमीन पर एक खूबसूरत दार्शनिक झील का निर्माण कराया जाएगा यमुना नदी के पास बनने वाली इस झील में बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी यमुना बांध से गुजरने वाले यात्री कुछ समय यहां रुककर प्रकृति के अद्भुत नजारों को निहार सकेंगे

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यहां के स्थानीय राजनीतिक नेताओं का मानना है कि कैराना की धरती राजनीतिज्ञों के लिए एक वरदानी भूमि है। इस धरती पर कदम रखते ही प्रत्येक राजनीतिक के भाग्य का सितारा बुलंद हो उठता है और वह देश एवं प्रदेश के प्रमुख पदों पर विराजमान होने का सौभाग्य प्राप्त करता है। जिसके बारे में वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेई,गायत्री देवी, मायावती, चौधरी देवीलाल,वीरेंद्र वर्मा, चौधरी नारायण सिंह, बाबू हुकम सिंह, चौधरी अजीत सिंह, मुलायम सिंह यादव, सिकंदर बख्त, राजनाथ सिंह आदि अनेक नेता है जो कैराना की भूमि पर कदम रखने के बाद ही देश तथा प्रदेश के मुख्य पदों पर पहुंचकर शिखर तक पहुंचे हैं।

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कैराना कस्बे पर लगे हैं बदनामी के भी दाग

आदम और तहजीब का आलीशान कस्बा कैराना बेनूर हो गया। कैराना से देश और दुनिया को आनंदित करने वाला संगीत लुप्त हो गया और अपराधों का बोलबाला हो गया।

कैराना मिनी पाकिस्तान के नाम से बदनाम है।आई एस आई एजेंटों की यहां पर सक्रियता, नकली नोटों का कारोबार, अवैध हथियारों, गठरी कारोबार तथा और भी बहुत सी देश विरोधी गतिविधियों और अपराधों के लिए कैराना कस्बा कुख्यात रहा है। हत्या, वसूली, शराब की तस्करी आदि अपराधों सेे कैराना और आस-पास का क्षेत्र एक आपराधिक बैल्ट के रूप में जाना जाने लगा।

कैराना से पलायन के बारे में भी कैराना कस्बा पूरे देश में चर्चा में रहा था।

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यंहा के हजारों कारीगर द्वारा हाथ की छ्पाई से तैयार लिहाफ व चादरें दूर- टूर प्रसिद्ध हैं।

कैराना की लाल और पीली मिर्च देशभर में प्रसिद्ध है। यहां से मिर्च हरियाणा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि और उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर भेजी जाती है।

गन्ना यहां की मुख्य फसल है लेकिन गेहूं, धान, आलू, गोभी की भी भरपूर फसल होती है। यहां पैदा होने वाले बेर अपनी मिठास के लिए प्रसिद्ध है।

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पंजीठ गांव-

कैराना के पास ही पंजीठ गांव कभी एक बड़ा नगर हुआ करता था, लेकिन समय के चलते पंजीठ एक नगर के स्थान पर गांव में तब्दील हो गया।
पंजीठ से राणा हुर्रा की वंशावली है।

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