______________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के लगभग १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और धार्मिक स्थल के बारे में – – – _____________________________________________

कंडोलिया मंदिर पौड़ी गढ़वाल शहर में ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। कंडोलिया देवता जो स्थानीय भूमियाल देवता है, मंदिर में भगवान शिव की कंडोलिया देवता के रूप में पूजा होती है।

यह मंदिर पौड़ी नगर से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। बस स्टेशन से मंदिर तक का 1 कि.मी. का पैदल रास्ता भी है।

ऊंचे-ऊंचे देवदार, चीड़, बांज, बुरांश,काफल आदि के सघन वृक्षों के बीच प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण वातावरण में स्थित कंडोलिया मंदिर से भव्य हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत चोटियों का विहंगम दृश्य और मनोरम गंगवारस्यून घाटी दृष्टिगोचर होती है।

उत्तराखंड की देवभूमि के अलग-अलग क्षेत्रों में भगवान शिव के मंदिर स्थापित है जहां उनकी अलग-अलग रूपों में पूजा- आराधना की जाती है। पौड़ी में भगवान शिव की कंडोलिया देवता के रूप में पूजा की जाती है। वे इस क्षेत्र के ईष्ट देव हैं और सभी की रक्षा करते हैं।

देवभूमि के कंडोलिया महादेव मंदिर के बारे में क‌ई रोचक कथाएं प्रचलित हैं। कंडोलिया देवता चंपावत क्षेत्र के डुंगरियाल नेगी जाति के लोगों के ईष्ट देवता हैं। मान्यता है कि बहुत पहले डुंगरियाल नेगी जाति से संबंधित कुछ परिवार चंद राजाओं की राजधानी चंपावत से पौड़ी आकर बसे थे। परंपरा के अनुसार वे परिवार अपने इष्ट गोरिल देवता को भी अपने साथ लाए थे। कहते हैं कि ईष्ट देवता को वे अपने साथ एक कंडी (छोटी टोकरी) में पौड़ी लेकर आए थे अत: इसलिए इन्हें ‘कंडोलिया देवता’ के नाम से जाना जाने लगा, तथा कुछ समय पश्चात आसपास का क्षेत्र भी ‘कंडोलिया’ के नाम से पहचाना जाने लगा।

उन्होंने पहले अपने ईष्ट देवता की स्थापना पौड़ी गांव के ही एक चौक में की थी। लेकिन गहराई में स्थित होने से यह स्थान गोरिल देवता को रास नहीं आया। उन्होंने गांव के ही एक व्यक्ति के स्वप्न में आकर स्वयं को शिखर पर स्थापित करने के लिए कहा।ईष्ट देवता की इच्छानुसार पौड़ी के शीर्ष शिखर पर उनकी स्थापना की गई और स्थानीय क्षेत्रपाल के रूप में देवता की पूजा की जाने लगी।

एक अन्य मान्यता के अनुसार बहुत समय पहले कुमाऊं की एक युवती का विवाह पौड़ी गांव के डुंगरियाल नेगी जाति के एक युवक से हुआ था। विवाह के बाद वह युवती अपने ईष्ट देवता को कंडी में रखकर अपने साथ लाई थी। इसके बाद से ही कुमाऊं के इन देवता को यहां कंडोलिया देवता के नाम से जाना जाने लगा और उनकी पूजा यहां पौड़ी गांव में होने लगी।

स्थापना के बाद से कंडोलिया मंदिर न्याय देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गया। स्थानीय जनमानस के द्वारा यहां भगवान शिव की भूम्याल देवता यानि न्याय के देवता के रूप में पूजा होती है। हर कहीं से निराश व्यक्ति को जब न्याय मिलने की उम्मीद समाप्त होने लगती है तो वो कंडोलिया देवता की शरण में आता है। कंडोलिया देवता के आशीर्वाद से लोगों की हर मनोकामना पूरी होती है। परंपरा के अनुसार डूंगरियाल नेगी जातियों के लोग ही मंदिर के पुजारी बनते हैं।

स्थानीय जनआस्था के अनुसार सारे नगर वासियों को उन पर होने वाली किसी भी तरह की विपत्ति, अपशकुन या संकट के संबंध में पूर्व में ही यह देवता पुकार लगाकर चेतावनी दे देते थे।

विगत क‌ई वर्षों से यहां हर साल जून के महीने में तीन दिवसीय मेले व पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। जिसमें बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं। बहुत से श्रद्धालु भक्त यहां मनोतियां मांगने आते हैं, तो बहुत से श्रद्धालु मनोतियां पूर्ण होने पर घंटा-छत्र आदि चढ़ाते हैं।

मंदिर की स्थापना के बाद से यहां भंडारे की परंपरा चली आ रही है। भंडारे से पहले कंडोलिया देवता की डोली और प्रतिमाओं को स्नान के लिए देवप्रयाग संगम ले जाया जाता है। देव प्रतिमाओं के संगम स्नान से लौटने के बाद मंदिर में भंडारा होता है।

तीन दिवसीय विशेष पूजा समारोह के दौरान स्थानीय और प्रवासी श्रद्धालु कंडोलिया देवता का आशीर्वाद लेने अपने पैतृक गांव अवश्य आते हैं।

गढ़वाल की समृद्ध परंपरा और आस्था का संगम देखना हो तो इस अवसर पर कंडोलिया महादेव के दर्शन करने के लिए अवश्य आना चाहिए।

इस मंदिर के समीप ही एक खूबसूरत पार्क और खेल परिसर भी स्थित है, पार्क से पौड़ी नगर का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखाई पड़ता है। गर्मियों के दौरान कंडोलिया पार्क में पर्यटकों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। यहां से कुछ मिनट की दूरी पर ही एशिया का सबसे बड़ा स्टेडियम रांशी भी है।

  • कंडोलिया से बुवाखाल का देवदार और अन्य वृक्षों से घिरा हुआ 4 किलोमीटर का ट्रेकिंग का रास्ता किसी के भी तन-मन को फिर से ताजगी से भर देता है।

सुरम्य पहाड़ों के बीच स्थित इस मंदिर के दर्शन करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को जिस असीम शांति और आनंद का अनुभव होता है उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता बस अनुभव किया जा सकता है।

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