____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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शामली जनपद के कांधला कस्बे की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत रही है।

कांधला के प्राचीन इतिहास को देखें तो इसका संबंध महाभारत काल में दानवीर कर्ण से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसे कर्णधला के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम अपभ्रंश होकर कांधला हो गया। कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच हुए महाभारत के युद्ध में यह स्थान राजा कर्ण के सैनिकों की छावनी रहा है। कर्ण की उपासना स्थली जो आज भी सूर्य कुंड मंदिर के रूप में नगर में स्थित है

कांधला के पास का पड़ोसी गांव नाला में उस समय कर्ण का न्यायालय होना बताया जाता है। नाला न्यायालय का अपभ्रंश है। कांधला कस्बे में पौराणिक काल में सात महल, सात तालाब व सात बाग थे।

बाहर से आए हुए हमलावरों व मुगलों द्वारा इस नगर को
कई बार लूटा व रौंदा गया। मराठों ने पानीपत की तीसरी लड़ाई के समय इसे छावनी बनाया।

उस समय मराठों द्वारा यहां एक शिव मंदिर व जलकुंड का निर्माण कराया गया। इस मंदिर के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि पानीपत के तीसरे युद्ध के दौरान मराठा सेना अपने सेनापति के नेतृत्व में बाहरी आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली के हमले का जवाब देने के लिए कांधला होते हुए जा रही थी। उस दौरान मराठा सेना का पड़ाव कांधला कस्बे के बहार लगा था। सैनिकों को अपने शिविर लगाने के लिए यहां सफाई करते समय एक शिवलिंग के दर्शन हुए। बाद में वहीं शिव मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में जमीन से निकला हुआ शिवलिंग सांपों के बीच विराजमान है। मंदिर में सूरजमल बाबा की समाधि स्थित है।

मराठा काल में मराठा राजाओं द्वारा कांधला के चारों ओर पूर्व दिशा में सूरजकुंड मंदिर, पश्चिम दिशा में नीलकंठ महादेव मंदिर, उत्तर दिशा में अंदोसर मंदिर और दक्षिणि दिशा में प्राचीन तालाब मंदिर बनवाए।

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कांधला का जैन स्थानक आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र है।

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कांधला नगर में दो समुदायों के बीच प्रेम सौहार्द और आपसी भाईचारे को मजबूती देने वाले कई स्थान है।

कांधला का हृदय स्थल कहा जाने वाला मोहल्ला रायजादगान स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर व जामा मस्जिद की एक ही दीवार है। जो दोनों संप्रदायों के लोगों को आपसी भाईचारा का संदेश सालों साल से देती आ रही है।
कांधला के ही कैराना मार्ग स्थित शमशान मुक्तिधाम व गोविंद गौशाला व ईदगाह तथा गरीबा में स्थित कब्रिस्तान की दीवार भी एक होने के चलते प्रेम और सौहार्द के प्रतीक के रूप में गिना जाता है। धार्मिक स्थानों की एक ही दीवार कांधला कस्बे के लिए अपने आप में एक मिसाल है।

नगर के अन्य धार्मिक स्थान शीतला माता मंदिर में स्थित महाभारत कालीन विदुर की समाधि, सिद्धेश्वर महादेव मंदिर व तालाब, राधा कृष्ण व ललिता सती का मंदिर का सुंदरीकरण किया जाए तो यह स्थान आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।

कांधला में मुगलकालीन इमारतें भी हैं। उन्हीं में से एक है प्राचीन पत्थरों वाले कुए के निकट स्थित हजीरा। इस हजीरा के निर्माण के बारे में एक रोचक कहानी बताई जाती है। कहते हैं कि कांधला से होकर बादशाह अकबर की सेना का काफिला ढोल- नगाड़े बजाते हुए गुजर रहा था। उस समय पहाड़ खां सो रहा था। पहाड़ खां की मां ने काफिले वालों से कहा कि वे यहां शोर न करें उनका बेटा सो रहा है। ढोल नगाड़ों की तेज आवाज से वह जाग जाएगा। इस बात पर बादशाह की सेना ने पहाड़ खां को गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ ले गई।
ऐसा बताया जाता है कि बादशाह के दरबार में एक दिन तीर कमान से निशानेबाजी के प्रदर्शन का आयोजन था। जिसमें खासो – आम में हर किसी को अपने हुनर का कमाल दिखाने की अनुमति थी। तय समय पर दूर दूर से तीर कमान चलाने के हुनर बाज इसमें शिरकत करने के लिए पहुंचे। लेकिन उन सब में से कोई भी अपने तीर कमान से निशाना लगाने के कमाल का हुनर नहीं दिखा सका। पहाड़ खं को भी किसी ने इस आयोजन के बारे में जानकारी दी थी। बादशाह अकबर को जब पहाड खां की इच्छा का पता लगा तो बादशाह ने उसे भी अपने हुनर को दिखाने के लिए उस स्थान पर लाने का हुक्म दिया।
पहाड़ खां ने रेत के सात बडे ढेर लगवाकर उन पर लोहे के तवे लगवाए और जैसे ही उसने तीर को कमान पर चढ़ाकर निशाना साध तीर को खींचकर सामने लक्ष्य पर छोड़ा। तो तीर छह रेत के ढेर को बेधता हुआ सातवें रेत के ढेर में जाकर अटक गया। तब पहाड़ खाने कहा कि बादशाह सलामत मुझे लगता है कि इस रेत के ढेर में कहीं कुछ कंकड़ है। इसके बाद बादशाह के हुक्म से जब सातवें रेत के ढेर को देखा जांचा गया तो उस रेत के ठेर में कंकड़ मिली। बादशाह ने पहाड़ खा के तीर कमान चलाने के हुनर से खुश होकर कुछ भी मांगने के लिए कहा। बादशाह ने पहाड़ खां कि याद में इस हजीरा का निर्माण कराया था।

कांधला की एक खासियत है कि कांधला के लोग शिक्षा तालीम के बारे में हमेशा से जागरूक रहे हैं। कांधला की अनेक विभूतियों ने इस छोटे से नगर का नाम प्रदेश में ही नहीं पूरे देश यहां तक कि विदेशों तक में चमकाया।

पाकिस्तान के राष्ट्र कवि एहसान – बिन – दानिश कांधला के ही रहने वाले थे।

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