________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा- यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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पुराणों के रचना काल में कण्व आश्रम का गौरव उन्नति के शिखर पर था।

वेद, पुराण और ब्राह्मण ग्रंथों से लेकर महाभारत तक समस्त वैदिक साहित्य में कण्व आश्रम का गौरवपूर्ण वर्णन है। प्राचीन समय में कण्व आश्रम वैदिक संस्कृति के प्रसार और शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। वैदिक संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए स्थापित इस प्राचीन विश्वविद्यालय में वेदों सहित ज्ञान विज्ञान के अनेकों विषयों की शिक्षा दी जाती थी। वेदों और उसके अंगोपांगो का ज्ञान देना कण्व आश्रम का मुख्य उद्देश्य था।

कण्व आश्रम वैदिक संस्कृति के ज्ञान प्राप्ति का महत्वपूर्ण केंद्र था। दूर-दूर से विद्यार्थी यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हजारों विद्यार्थी आचार्यों की छत्रछाया में यहां विद्या विद्याध्ययन करते थे। विद्यार्थियों को शिक्षा निशुल्क दी जाती थी, उनके आश्रम में रहने, भोजन, वस्त्र आदि का प्रबंध भी आश्रम के द्वारा ही किया जाता था। आश्रम द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के सब खर्चो का प्रबंध आश्रम की कृषि भूमि, पशुपालन और उस समय के राजा महाराजाओं द्वारा दिए जाने वाले भरपूर अनुदानों से चलता था।

हर दृष्टि से संपन्न कण्व आश्रम में दूर- दूर के देशों से हजारों विद्यार्थी यहां विद्याध्ययन के लिए आते थे। आश्रम में विद्याध्ययन के लिए प्रवेश पाने के लिए प्रवेशार्थियों की भीड़ लगी रहती थी। इसलिए आश्रम में प्रवेश के लिए नियम बहुत ही कठिन थे। प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि कण्व आश्रम में अध्ययन करने के उद्देश्य से आए बहुत से मुनीजनों को आश्रम के आंतरिक भाग में प्रवेश न मिलने के कारण आश्रम के बाहरी भाग में ही मालिनी नदी के तटों पर दल कुटीर बनाकर रहने के लिए संतुष्ट होना पड़ता था। इसलिए कण्व आश्रम में प्रविष्ट होकर शिक्षा प्राप्त करना एक विद्यार्थी की उच्च कोटि की योग्यता का परिचायक माना जाता था।
कण्व आश्रम में सहशिक्षा प्रचलित थी, स्त्री- पुरुष सभी विद्यार्थी समान रूप से शिक्षा ग्रहण करते थे।

एक बहुत बड़े भू क्षेत्र में फैले विशाल कण्व आश्रम में शिक्षा – दीक्षा का कार्य पर्ण कुटीर और वृक्षों की छाया में बैठकर किया जाता था। सभी विषयों के उच्च कोटि के विद्वान आचार्य आश्रम में निवास करते थे। वेदों के छह अंग व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष, शिक्षा और कल्प इनके विद्वान आचार्य के साथ साथ अन्य विषयों को जानने वाले आचार्य विद्वान और ज्ञाता कण्व आश्रम की शोभा बढ़ाते थे।

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शकुंतला और दुष्यंत
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शंकुतला – दुष्यंत की धरती भी यही है। यह प्रसंग पुराणों में भी वर्णित है और इसी शकुंतला और दुष्यंत के कथानक पर पर महाकवि कालिदास ने भी अपने अमर महान नाट्य कृति अभिज्ञान शकुंतलम की रचना की ।
अभिज्ञान शाकुंतलम् महाकवि कालिदास की ही नहीं, बल्कि समग्र संस्कृत साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक रचना है।

पूर्व समय में महर्षि विश्वामित्र ने महान तप किया। देवताओं के राजा देवराज इंद्र को आशंका हुई कि कहीं तप के तेज से मुनि विश्वामित्र उसे देवताओं के राजा के पद से हटा न दें। इस डर से इंद्र ने अप्सरा मेनका को आदेश दिया, जाओ और अपने रूप, लावण्य और यौवन से महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को भंग करो। मेनका महर्षि विश्वामित्र के तेज और सामर्थ को जानती थी। स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने देवराज इंद्र से कहा उग्रकर्मा विश्वामित्र से मुझे भय है। किंतु हे देवराज -कामदेव को मेरा सहायक बनाओ और उस वन प्रांतर को सुरभित वायु से भर दो। वह सुरभित वायु मेरे वस्त्रों को उड़ाती हुई मेरी सहायता करें। मैं महर्षि विश्वामित्र के पास जाऊंगी और तुम्हारा कार्य करूंगी।
स्वर्ग की अप्सरा मेनका अपने संपूर्ण श्रंगार और कामदेव के द्वारा रचित सम्मोहित कर देने वाले परिदृश्य के साथ जब महर्षि विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई तो महर्षि विश्वामित्र काम के वशीभूत हो उठे। महर्षि विश्वामित्र के चिरकाल तक स्वर्ग की अप्सरा मेनका के साथ रमन से एक बालिका का जन्म हुआ। अप्सरा मेनका उस बालिका को एक रमणीय प्रस्थ पर छोड़ कर स्वर्ग लौट गई। उस बालिका की शकुंतों(पक्षियों) ने रक्षा की। कण्व ऋषि ने निर्जन वन में पक्षियों से घिरी हुई उस नवजात बालिका को देख कर उसे अपने आश्रम में ले आए और उस बालिका को अपनी पुत्री के समान पाला और उस बालिका का नाम शकुंतला रखा। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच जनमी शकुंतला को प्रकृति और पेड़-पौधों से बहुत प्यार था। किसी पेड़ पौधे में कोई नव अंकुर फूटता या कोई फूल खिलता तो शकुंतला को असीम सुख मिलता था। वह ऋषि आश्रम में मृग के छौनों के साथ खेलती थी। महर्षि कण्व ने अपनी पुत्री की तरह शकुंतला का पालन किया था।

एक बार आखेट करते हुए प्रतापी राजा दुष्यंत एक सुंदर पवित्र तपोवन में पहुंचे। यही कण्व ऋषि का आश्रम था। जब दुष्यंत कन्व ऋषि के आश्रम में पहुंचे, तब ऋषि कन्व वहां नहीं थे और अतिथि सत्कार का भार शकुंतला पर था।
उनका स्वागत शकुंतला ने किया। राजा दुष्यंत की शकुंतला से भेंट हुई। उन्होंने शकुंतला से प्रणय निवेदन किया और वन प्रांतर में यही ऋषि आश्रम में दुष्यंत ने शकुंतला से गांधर्व विवाह किया। जब राजा दुष्यंत वापस नगर को जाने लगे, तो उन्होने एक अंगुठी शकुंतला को दी। दुष्यंत शकुंतला को ससम्मान बुलाने का वचन देकर अपनी राजधानी चले आए। त्रिकालदर्शी महर्षि कण्व दिव्य दृष्टि से सारी बातें जान गए और उन्होंने विवाह को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकृति प्रदान कर दी।

समय पर शकुंतला के गर्भ से अत्यंत सुंदर पुत्र हुआ। ६ वर्ष की अवस्था में ही वह बाघ, सिंह, हाथियों आदि जंगली जानवरों को आश्रम के पेड़ों से बांध देता था। उनके साथ खेलता था, कभी उन पर चढ़ता, खेल खेल में सिंह के मुंह में हाथ डालकर उनके दांत गिनता।
बालक के बड़े होने और उसके अलौकिक कर्म देखकर यथा समय महर्षि कण्व ने अपने शिष्यों को आज्ञा दी कि शकुंतला को बालक भरत के साथ उनके पति के घर पहुंचा आओ। ऋषि कण्व और लता, पशु-पक्षियों सहित सारे
आश्रमवासियों ने भरे मन से शकुंतला को विदाई दी।
पर नगर के मार्ग में चलते हुए एक नदी पड़ी और वंही पानी पीते समय शकुंतला के हाथ से पति की दी हुई अंगूठी
फिसलकर नदी में गिर गई।
हस्तिनापुर राजभवन पहुंचने पर पति दुष्यंत ने शकुंतला को पहचानने से इंकार कर दिया।

शकुंतला की यह कथा पौराणिक है। इस प्रसंग को महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ -अभिज्ञान शाकुंतलम -के द्वारा विश्व प्रसिद्ध बना दिया। महाकवि कालिदास ने इस ग्रंथ में यहां की इस भूमि का व यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।
लगभग दो सदी पहले महाकवि कालिदास की महान रचना अभिज्ञान शाकुंतलम् अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी। फॉरस्टर नामक जर्मन यात्री ने लंदन में सन 1790 में इस अंग्रेजी अनुवाद को देखा और इतना प्रभावित हुआ कि तुरंत ही उसने अभिज्ञान शाकुंतलम् का जर्मन अनुवाद 1791 में प्रकाशित किया। जर्मन भाषा के महान कवि गेटे शकुंतला को पढ़कर अभिभूत हो गए थे। उनकी मानें, तो पृथ्वी और स्वर्ग सभी का श्रेष्ठ इस रचना में मौजूद है।

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कण्व आश्रम — कोटद्वार -(उत्तराखंड)

प्राचीन ग्रंथों में वर्णित अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य में स्थित कण्व आश्रम अपनी ज्ञान ज्योति से सदियों तक विश्व को आलोकित करता रहा लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों के द्वारा नष्ट करने के पश्चात इस स्थान के बारे में लोग भूल से गए। प्रसिद्ध वन यात्री श्रीनिधि विद्यालंकार की वर्षों की खोज और विश्लेषण के बाद सन 1950 के दशक में गढ़वाल के मालिनी नदी के तट पर कण्व आश्रम की सही पहचान हो गई।

प्राचीन शिक्षा का केंद्र होने के साथ-साथ कण्व आश्रम एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी है। इस स्थान पर प्राचीन समय में कई मंदिर भी स्थापित है जो समय-समय पर हुए भूस्खलन और मालिनी नदी की बाढ़ में तहस-नहस हो गए। इन प्राचीन मंदिरों के ध्वसावशेष, मूर्तियां और अलंकृत प्रस्तराखंड कण्व आश्रम में जगह जगह बिखरे पड़े हैं।

हरिद्वार की तरह कोटद्वार हिमालय के विभिन्न तीर्थ स्थलों में जाने का प्राचीन यात्रा पथ भी है। कैलाश मानसरोवर तक फैले हिमा लय के प्राचीन तीर्थ स्थलों के दर्शनों को जाने का यात्रा पथ यहीं से होकर गुजरता है।
हिमालय के विभिन्न स्थानों को जाने वाले प्राचीन यात्रा पथ पर ही स्थित होने के कारण यह स्थान व्यापार और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान था। प्राचीन ग्रंथों से पता चलता है कि यहां से होकर जाने वाले रास्ते से निरंतर यात्रियों की आवाजाही और व्यापार चलता रहता था। यह स्थान पर्वतीय और मैदानी वस्तुओं के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। बाद में पहाड़ों में यातायत के साधन और सुविधा बढ़ने से यहां का व्यापारिक महत्व कम हो गया।

पौराणिक एवं ऐतिहासिक कण्व आश्रम का कोटद्वार से लगभग 10 किलोमीटर का रास्ता एक और गाने सघन वन और दूसरी ओर हरे भरे खेतों के बीच से होकर जाता है। कुछ चढ़ाई के पश्चात शिवालिक पर्वत मालाओं के बीच उपत्यका है जिसके बीच से मालिनी नदी प्रवाहित होती है। यही घने वनों के बीच कण्व आश्रम स्थित है।
मालिनी नदी शकुंतला को बहुत प्यारी थी। पौराणिक मालिनी नदी गढ़वाल के चंडाखाल पर्वत शिखर से निकल कर शिवालिक पर्वतों के बीहड़ वनों के बीच से कल कल का मधुर स्वर करती हुई तीव्र गति से भाबर के उबड़ खाबड़ मैदानों और समतल भूमि के बाद गंगा नदी में मिल जाती है।
कण्व आश्रम एक ऊंचे स्थान पर बना है इसके नीचे घाटी में मालिनी नदी की शीतल और शांत धारा प्रवाहित होती रहती है। यही मालिनी नदी के तट पर एक टीले पर कण्व में ऋषि का मंदिर है। यहां पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि डालो तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि हम कहीं देवलोक में आ गए हैं।
यहां मालिनी नदी के तटवर्ती भाग में कुछ गांव बसे हुए हैं लेकिन अधिकतर भाग ग्रामीण क्षेत्र है। यहीं एक स्थान पुराने जीर्ण शीर्ण मठ मंदिरों के भग्नावशेष और विशाल भीमकाय तराशे हुए पत्थरों की शिलाएं यहां वहां बिखरी पड़ी है। मालिनी नदी के दोनों ओर जंगली आम, बांस, शीशम, खैर, आमला, पीपल, बड, साल, कीकर आदि तरह-तरह के अनेक प्रकार के वृक्ष है तो अमलतास, ढाक, सिरस, जंगली गुलाब आदि फूलों के वृक्ष भी यहां बहुलता में मिलते हैं। इन्हीं सब के बीच विचरण करते वन्य पशु हिरण, नीलगाय, सूअर, बारहसिंघा, बाघ, हाथी और तरह-तरह के पक्षी हमें उस प्राचीन समय का स्मरण करा देते हैं। इन सब का महाकवि कालिदास ने सुंदर और विशद वर्णन अपने महाकाव्य- अभिज्ञान शाकुंतलम् में अंकित किया है।

कण्व आश्रम के पास ही कलालघाटी एक छोटा सा गांव है। यहीं से मालिनी घाटी प्रारंभ होती है। यही मालिनी वन्य जंतु बिहार है।

कण्व आश्रम से थोड़ी दूर सहस्त्रधारा नाम के दो मनोहरी जलप्रपात है।

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कण्व आश्रम

रावली घाट- (रावली गांव-जनपद बिजनौर)

बिजनौर से लगभग 11 किलोमीटर दूर रावली नामक गांव स्थित है।

प्राचीन काल में यह स्थान घने वनों से आच्छादित था और कल कल बहती गंगा नदी से यहां की भूमि बड़ी आकर्षक होने के कारण यह स्थान ऋषियों मुनियों की तपोभूमि रहा है।
यही निकट ही गंगा में मालिनी नदी के संगम पर स्थित कण्व आश्रम के अवशेष आज भी महाकवि कालिदास की अमर कृति अभिज्ञान शाकुंतलम् की याद दिलाते हैं। माना जाता है कि यही कण्व आश्रम में शकुंतला का लालन पालन हुआ था।
यह क्षेत्र कुरु वंश के राजाओं का प्रिय आखेट स्थल रहा। महाराजा दुष्यंत एक बार आखेट के लिए इसी क्षेत्र में आए थे। उन्होंने यहां शकुंतला से गांधर्व विवाह किया, जिसके फलस्वरूप वीर बालक भरत का यह जन्म हुआ। इस भूमि को भरत जैसे वीर को जन्म देने का गौरव प्राप्त है। महाभारत में वर्णन है कि इन्हीं पराक्रमी भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पडा।
यह भूमि दुष्यंत और शकुंतला का प्रणय, विवाह, विरह और पुनर्मिलन और भरत का जन्म भी इसी स्थल से संबंधित कहे जाते है।
महाभारत ग्रंथ में भी कण्व आश्रम को मालिनी नदी के तट पर बताया गया है। महाभारत ग्रंथ में ही कहा गया है कि मालिनी और गंगा नदी का संगम कण्व आश्रम के निकट ही है। चक्रवर्ती सम्राट भरत की राजधानी रहा हस्तिनापुर यहां से मात्र 14 किलोमीटर दूर है।
प्राचीन संस्कृत साहित्य के अग्रणी साहित्यकार महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओं में यहां के तराई क्षेत्र और तत्कालीन प्राकृतिक छटा का बहुत ही सुंदरता से वर्णन किया है।
वर्तमान समय में यहां कण्व ऋषि का मंदिर गोलाई में बना हुआ है। मंदिर के बीच में कण्व ऋषि की मूर्ति है। मंदिर की दीवारों पर सिंह शावकों के दांत गिनते बालक भरत की मूर्ति के अलावा शकुंतला की भी मूर्ति है। यह मूर्तियां गांव वालों ने स्थापित की है जबकि ऋषि कन्व की मूर्ति की स्थापना कब और किसने की इसकी जानकारी किसी को नहीं है। संभवतः किसी समय किसी व्यक्ति ने इस स्थान के महत्व को देखते हुए कण्व ऋषि की यह मूर्ति यहां लगवाई होगी। निकटवर्ती गांव के लोग शादी विवाह जैसे शुभ अवसरों पर यहां आकर विशेष पूजा अर्चना करते हैं। हर सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

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इसी इलाके में एक और स्थान पर भी कण्व आश्रम होने के बारे में संजय शर्मा ने comment किया है। उनके किए comment के अनुसार –

मालन नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन कण्व ऋषि
का आश्रम जिसे मालदेव के नाम से भी जाना जाता है।
यह गजरौला शिव से बग्गीची गांव को जाने वाले मार्ग
पर मणकेश्वर महादेव के मंदिर से डेढ़ किलो मीटर की
दूरी के बाद मालन नदी की ओर एक किलो मीटर दूर
जंगल में एक ऊंची जगह पर बहुत पुरानी कला कृतियां
जो खुदाई के दौरान मिली हैं। जहां शिव लिंग स्थापित
है वर्तमान में यहां जूना अखाड़े की महा मंडलेश्वर इस
स्थली की सेवा और देख भाल में सेवा रत है।
स्थान बहुत ही मनोरम है

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