___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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बिहारी गांव -(जानसठ कस्बा मुजफ्फरनगर जनपद)

कांच का तालाब यह नाम सुनकर तो किसी को भी लगेगा कि यह कोई सुंदर रमणीक स्थान होगा। हां महाभारत काल में यह स्थान हस्तिनापुर राज्य का विहार स्थल हुआ करता था। इसकी सुंदरता और रमणिकता के कारण इस स्थान को किसी समय अनूपशहर के नाम से जाना जाता था।

कुरु प्रदेश की राजधानी हस्तिनापुर के निकट होने के कारण यह स्थान राज-परिवार के आमोद-प्रमोद का स्थान हुआ करता था। कौरव-पांडव यहां के विहार स्थल पर कभी सरोवर में जल क्रिड़ा और कभी चौसर खेलने के लिए आते थे।

दूर तक फैले इस विहार स्थल के मध्य में एक विशाल एवं भव्य सरोवर था। सरोवर में प्रवेश करने के लिए स्वर्ण की सीढ़ियां बनी हुई थी।

सरोवर के चारों ओर तथा इस विहार भूमि में और भी स्थानों पर अनगिनत कुएं बने हुए थे।

सरोवर के समीप ही एक स्थान चौसर खेलने का हुआ करता था।

कहा जाता है कि महाभारत पुराण में वर्णित कौरव पांडवों के बीच निर्णायक द्यूत-क्रीड़ा जिसमें पांडव अपने सर्वस्व सहित द्रोपदी को भी हार गए थे यहीं पर संपन्न हुई थी।

यह स्थान उनका विहार स्थल था और इसी स्थान पर पांडव अपने सर्वस्व सहित द्रोपदी को भी हारे थे इसलिए इस स्थान का नाम ‘बहुहारी’ पड़ा जो बाद के कालखंड में अपभ्रंश होकर ‘बिहारी’ कहा जाने लगा। स्वर्ण अर्थात कंचन से निर्मित सीढ़ियां होने के कारण जिसे उस समय कंचन ताल कहा जाता था। अपभ्रंश होकर अब केवल कंची या कांच का तालाब रह गया।

मुजफ्फरनगर जनपद में जानसठ कस्बा और मुजफ्फरनगर शहर के बीच सिखेड़ा गांव स्थित है। सिखेड़ा से तीन कि.मी. दूर बिहारी गांव स्थित है।

महाभारत काल में जो सरोवर कौरव पांडवों की विहार भूमि हुआ करता था। आज के समय में वह कंची तालाब गन्ने के खेतों के बीच जंगली घास-फूस से घिरा तालाब जैसा एक जोहड़ है।

तालाब के पास ही जिस स्थान पर कौरव-पांडव चौसर खेलते थे। कुरुवंशियों का वह विशाल द्यूतस्थल जहां चौसर बनी हुई थी। वह स्थान आज टूटी-फूटी लखौरी ईंटों से बना एक छोटा वनखंड सा प्रतीत होता 25-30 मीटर के एक चबूतरे के अवशेष के रूप में अभी भी कंची तालाब के किनारे विद्यमान है।

उस समय सरोवर के तट पर स्थित मंदिर जहां पांडव पूजा-अर्चना किया करते थे। उन मंदिरों के अवशेष कंची तालाब के आसपास देखे गए हैं। यहां के निवासियों का कहना है कि उक्त अवशेष पांडवों के उन मंदिरों के ही हैं जिनमें वे पूजा-अर्चना किया करते थे।

इतना ही नहीं उस समय इस स्थान पर 85 कतारवार कुएं स्थित थे। जो पूरे क्षेत्र में वर्गाकार रूप में मौजूद थे। उनमें से कुछ कुएं आज भी गांव में मौजूद हैं। जबकि कुछ के अवशेष मात्र ही रह गए हैं।

इन कुओं को उस समय इस प्रकार और ऐसे स्थानों पर बनाया गया था जिससे एक छोर के किसी भी कुएं से दूसरे छोर के किसी भी अन्य दूसरे कुएं को देखा जाए तो ऐसा लगे कि सभी के सभी कुएं एक दूसरे के पीछे पंक्ति में खड़े दिखाई दें।

यहां के ग्रामीण बताते हैं कि जो तालाब अब आकार में छोटा दिखाई देता है उसे कुछ दशक पहले तक विशाल तालाब के रूप में और उस चौसर को उन्होंने अपनी आंखों से देखा है।

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श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र -बिहारी गांव

बिहारी गांव में श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर है। इस मंदिर में संवत 254, लगभग 1800 वर्ष पुरानी मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की सप्तफनी प्रतिमा मौजूद है। इसके अलावा मंदिर में काले ग्रेनाइट पाषाण काल की शिला पर भी 26 जैन मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। जो की अति दुर्लभ और प्राचीन हैं।

विदेशी आक्रमणकारियों से इन्हें बचाने के लिए उस समय इन्हें कंची तालाब में छिपा दिया गया था। जिन्हें सन 1500 ई. में गांव में मौजूद वर्तमान मंदिर में विराजमान कराया गया। यहां पर की गई मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

इस मंदिर की शिल्प कला मुगल काल की है। मंदिर में समय-समय पर चमत्कार देखने को मिलते रहते हैं।

ऐसी मान्यता है गांव के परिक्षेत्र में किसी भी इंसान को सांप काटे का जहर नहीं चढ़ता है। माना जाता है कि इस क्षेत्र में विषैला सर्प भी विषहीन हो जाता है।
ऐसे कई उदाहरण हैं जब किसी को सांप ने काटा हो और वह बिना किसी उपचार के ही स्वस्थ हो गया।

प्रतिमाओं को तालाब में छिपाए जाने से तालाब का पानी भी चमत्कारी हो गया। जिससे किसी भी प्रकार का चर्म रोगी इस तालाब में एक बार स्नान करने मात्र से स्वस्थ हो जाता है। आज भी बहुत से चर्म रोगी इस तालाब में आकर नहाते हैं और उन्हें फायदा भी होता है। लेकिन अतिक्रमण के कारण यह तालाब बदहाल है।

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बिहारी गांव में जन्माष्टमी के शुभावसर पर भव्य झांकियों से सुसज्जित भगवान श्री कृष्ण की विशाल यात्रा निकाली जाती है। इस शोभायात्रा में बिहारी गांव के मुस्लिम भी तन मन धन के साथ पूर्ण सहयोग करते हैं।

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