_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद ( उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद का जौनसार बावर क्षेत्र कई मायनों में बहुत खास है । जौनसार बावर प्राचीन समय से ही ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से वैभव संपन्न रहा है।

जौनसार बावर इलाके की संस्कृति का संबंध भारत की प्रमुख पौराणिक एवं धार्मिक नदी यमुना जी से है। जौनसार नाम का संबंध भी यमुना नदी से ही है यानी यमुना के इस पार का इलाका – जौनसार। यमुना से उस पार का इलाका जौनपुर कहलाता है।

पतित पावनी नदियां गंगा और यमुना का उद्गम स्थल उत्तराखंड है। गंगोत्री के अपने उद्गम स्थल से चलकर गंगा नदी हरिद्वार में पहाड़ों से उतर कर मैदान में प्रवेश करती हैं यह बात तो हर कोई व्यक्ति जानता है, लेकिन यह बात बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि यमुना नदी यमुनोत्री के अपने उद्गम स्थल से चलकर हिमालय के पर्वतों की घाटियों से होती हुई आगे बढ़ती हैं तो यमुना नदी जौनसार बावर इलाके के कालसी में ही पहाड़ों से उतर कर मैदान में प्रवेश करती है।

कालसी एक प्राचीन तथा ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। इसका प्राचीन नाम हरिपुर था। देहरादून से लगभग 56 कि. मी. दूर स्थित कालसी में यमुना नदी के ऊपर बने पुल को पार करते ही जौनसार बावर क्षेत्र शुरू हो जाता है।

कालसी में यमुना नदी पर पहले अंग्रेजों के जमाने का बना पुल था लेकिन उसके जर्जर होने के बाद सन 1980 में 448 फीट लंबा नया पुल बनाया गया। देहरादून जनपद में कालसी में यमुना नदी पर बना यह सबसे लंबा पुल है। यमुना नदी पर कालसी में बना यह पुल जौनसार बावर के इलाके को अन्य क्षेत्रों से जोड़ता है।

कालसी का धार्मिक महत्व भी है। यहां चार नदियों का संगम होता है। यमुना, तमसा (टौंस), अमलावा और नौरा नदियों का संगम होने के कारण यहां यात्री प्राचीन काल से यज्ञ, पिंडदान और मकर सक्रांति पर साल दर साल आते रहे हैं। कालसी के निकट ही बागवाला यानी जगतग्राम में तीन बार अश्वमेध यज्ञ होने के प्रमाण हैं।

कालसी महाभारत एवं अन्य पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली और कल्प ऋषि की तपोस्थली है।

कालसी में सम्राट अशोक का विशाल अभिलेख पाए गए हैं। ये अभिलेख प्राचीन एवं ऐतिहासिक हैं। इन अभिलेखों को एक श्वेत चकमक की 20 फीट लंबी आधार पर 8 फुट चौड़ी और 20 फीट ऊंची चट्टान पर उत्तकीर्ण किए गए हैं।

अशोक के शिलालेख भारत के कोने कोने में स्थापित हैं। ‌‌इन शिलालेखों के सुदूर स्थानों में पाए जाने से यह भी प्रमाणित होता है कि सम्राट अशोक की राज्य की सीमा कहां-कहां तक थी।

कलिंग युद्ध के भयंकर नरसंहार के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। बाद में जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म में निहित शिक्षा की ध्वजा को दुनिया में फहराना शुरू किया तो उसका सौभाग्य कालसी को भी मिला। सम्राट अशोक का यह शिलालेख अशोक के काल के सबसे बड़े शिलालेखों में से सबसे बड़ा माना जाता है

कालसी के इस शिलालेख को सन 1860 में मि.फारेस्ट द्वारा खोज निकाला गया। उस समय यह शिलालेख मिट्टी आदि से इस प्रकार ढका हुआ था कि चट्टान पर उत्तकीर्ण लेख स्पष्ट नहीं थे।

ब्राह्मी लिपि में लिखा गया यह शिलालेख सम्राट अशोक के चौदह लेखों का पाठान्तर है और इसे अशोक के राज्याभिषेक के पश्चात चौदहवें वर्ष में तथा ईसा ‌ से 250 वर्ष पूर्व अंकित किया गया था। इस शिलालेख में अंकित यह चौदह अभिलेख प्राय: परिपूर्ण अवस्था मेंअन्य स्थानों पर भी प्राप्त होते हैं।

कालसी में सम्राट अशोक का जो शिलालेख है उसका अधिकांश भाग चट्टान के दक्षिणी भाग में मिलता है,किन्तु शब्दों के बड़े होने तथा नीचे की और बढ़ने के कारण निर्धारित स्थान संपूर्ण लेख के लिए अपर्याप्त प्रतित हुआ।अत‌एव अभिलेख को शिला के पश्चिमी भाग में पूर्ण किया गया।इस चट्टान के पूर्वी हिस्से में एक हाथी का चित्र भी उकेरा गया है। इस हाथी पैरों के बीच में ‘गजतमे’ शब्द को अंकित किया गया है। बौद्ध कला में हाथी को विशेष महत्व प्राप्त है। बौद्ध धर्म में कथा है कि भगवान बुद्ध तुषित स्वर्ग से आकर अपनी माता के गर्भ में एक हाथी के रूप में प्रविष्ट हुए थे। कालसी के इस शिलालेख में सम्राट अशोक को ” देवानांप्रिय ” कहकर संबोधित किया गया है।

इतिहासकार बताते हैं कि कालसी (हरिपुर) काफी समय तक सत्ता के केंद्र में रहा और कई बार राजधानी भी। प्राप्त प्रमाणों से पता चलता है कि उस कालखंड में यह क्षेत्र कितना वैभव संपन्न रहा होगा। यहां से कभी तिब्बत तक व्यापार होता था। उस समय कालसी एक बहुत बड़ी मंडी थी।तिब्बत का बाजार यहां कालसी(हरिपुर) से था ऋषिकेश, कोटद्वार या रामनगर से नहीं था। चीन तक के लिए भी यहां से व्यापार होता था। जिस तराजू में आज हम राशन आदि तोलते हैं तो इसी तराजू में कभी उस समय सोने-चांदी का व्यापार चीन के साथ होता था।

बौद्ध भिक्षु और सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेंगसांग के भ्र‌मण के प्रमाण भी यहां मिलते हैं। गुप्त काल में भारत यात्रा पर आए ह्वेंगसांग ने अपने यात्रा वृतांत में इस क्षेत्र का वर्णन सुग्न क्षेत्र के रूप में किया है। पंद्रह सौ – सोलह सौ व‌र्ष पहले जब चीनी यात्री यहां आए तो यह कालसी एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था।

यमुना नदी के स्रोत प्रदेश में किसी समय अतिवृष्टि होने के कारण यह क्षेत्र उजाड़ हो गया। इस बात के प्रमाण हैं। जिस प्रकार कुछ वर्षों पूर्व अतिवृष्टि के कारण केदारनाथ क्षेत्र को भयंकर त्रासदी झेलनी पड़ी थी और उस क्षेत्र में सब कुछ तबाह हो गया था। ऐसा ही कुछ कभी इस इलाके में भी हुआ होगा। केदारनाथ को फिर से बसाया गया काश उस समय भी कोई ऐसी व्यवस्था होती तो कालसी (हरिपुर) फिर से आबाद हो जाता।

दून घाटी अपने लुभावने दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। दून घाटी के इलाके में ही स्थित कालसी में भी कुछ बेहद लुभावने दृश्यों का आनंद उठाया जा सकता है। इस स्थान का शांत वातावरण बाहर से दोस्तों एवं परिवार के साथ घूमने-फिरने और पिकनिक मनाने आने वालों के लिए एक अनोखा अनुभव होता है।

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