________________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और स्थान की जानकारी – –

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देहरादून में स्थित श्री माता कालिका भवन तथा यहां होने वाले झंडारोहण समारोह में भारतीय संस्कृति के विभिन्न रूप दृष्टिगोचर होते हैं। देहरादून के विख्यात उत्सव मेलों में कालिका माता भवन में आयोजित होने वाला ध्वजारोहण समारोह दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

प्रतिवर्ष रामनवमी के पावन अवसर पर ‌आदि शक्ति कालिका माता मंदिर में होने वाला भव्य ध्वजारोहण समारोह यहां का सर्व प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर एक विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है।

कालिका माता मंदिर में ध्वजारोहण की तैयारियां चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्र के पहले दिन से जोरों-शोरों से प्रारंभ हो जाती हैं। लगभग 80 फुट ऊंचे अष्ट धातु के कीर्ति स्तंभ पर हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में पूर्ण श्रद्धा के साथ ध्वजारोहण किया जाता है।

नवरात्रों के अंतिम दिन राम नवमी के अवसर पर बैंड बाजों के साथ अष्ट धातु कीर्ति स्तंभ की पूजा की जाती है। संत महात्मा और इस अवसर पर दूर-दूर से हजारों की संख्या में आए हुए उपस्थित श्रद्धालु भक्तजन प्रसन्ता से कालिका माता की जय जयकार करते हुए नाचते और गाते हैं।

संध्या के समय मंदिर की गद्दी पर आसीन श्री महाराज जी अपने कर कमलों से झंडा फहराते हैं। झंडा फहराने के साथ ही हजारों श्रद्धालुओं की जय जय कार से सारा वातावरण गूंज उठता है।

झंडारोहण वाले दिन प्रातः काल कालिका मंदिर के श्री महाराज अद्वैत आश्रम जाते हैं जहां पूजा पाठ के पश्चात सिंदुरिया श्री हनुमान मंदिर में यज्ञ होता है। प्रातः काल ही दूध, गंगाजल, शहद के मिश्रण से अष्टधातु के स्तंभ को स्नान कराया जाता है।

दोपहर में सिंदुरिया श्री हनुमान जी मंदिर में भगवान राम का यज्ञ किया जाता है और रामायण का पाठ होता है।

ध्वजारोहण के अवसर पर श्री कालिका माता मंदिर भवन तथा सिंदुरिया हनुमान जी का मंदिर और आसपास के पूरे परिसर की सजावट की जाती है।

अपार जनसमूह झंडे जी पर पर माथा टेकने के लिए लालायित रहता है। बड़ी संख्या में महिलाओं,बच्चों और पूरे परिवार के साथ सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति माता के जयकारे लगा रहा होता है। ध्वजारोहण के समय आसपास के भवनों की छतों पर भी श्रद्धालु जमा हो जाते हैं तथा चारों को सिर ही सिर दृष्टिगोचर होते हैं। अंबिका देवी के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती है। देर शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

इस अवसर पर मेले का आयोजन भी किया जाता है जिसमें तरह-तरह के स्टाल लगे होते हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले आदि भी लगाए जाते हैं।

देहरादून के आदि शक्ति कालिका माता के भव्य मंदिर की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि मंदिर की स्थापना व झंडारोहण समारोह का इतिहास बालयोगी श्री सर्वदास महाराज को बाल्यकाल में हुई एक आंतरिक प्रेरणा से जुड़ा है। सन 1947 में भारत के विभाजन के पश्चात विस्थापित हुए कुछ परिवार देहरादून में आकर बस गए थे। इन्हीं परिवारों में एक तोताराम चांदना परिवार था। इसी परिवार के सबसे छोटे पुत्र कुलभूषण बाल्यकाल से ही धर्म ग्रंथों के अध्ययन के साथ धार्मिक कार्यों में रुचि रखते थे। उनके हम‌उम्र के बालक खेलते तो वह उन बच्चों के साथ न खेलते बल्कि धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते। बालक की इस आध्यात्मिक साधना का यह परिणाम हुआ कि उन्हें सरस्वती सिद्ध हो गई।

अचानक एक दिन कुलभूषण को अंत: प्रेरणा हुई कि उनके घर के निकट स्थित बरसाती नाले के पास स्थित बुर्जी कभी काली का मंदिर था। जिसे विदेशी हमलावरों ने विध्वंस कर विनाश कर दिया था तथा मंदिर की मूर्ति वहीं धरती में गड़ी हुई है।

कुलभूषण ने इसकी चर्चा अन्य लोगों से की तो पहले तो उनकी कही हुई बात पर किसी को विश्वास नहीं हुआ किन्तु कुलभूषण के अटूट विश्वास और उनकी भगवत निष्ठा को देखकर जब एक दिन कुछ लोगों ने उस बुर्जी वाले स्थान पर खुदाई की तो लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, खुदाई में कालिका माता की मूर्ति अष्टभुजी रजतपत्र तो मिली ही साथ ही वहां मंदिर होने के भी क‌ई प्रमाण मिले। बाद में वहीं उनकी प्रेरणा से कालिका माता की मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई। अष्टभुजी देवी की प्रतिमा का बहुत महत्व है। इस घटना के बाद अनेक चमत्कारों के कारण इस स्थान की कीर्ति दिनों-दिन चारों ओर फैलती चली गई।

लोगों का मानना है कि बालक कुलभूषण को क‌ई बार देवी आवेश हुए। उनकी अवस्था दिन-प्रतिदिन विलक्षण होती गई। कुलभूषण की आध्यात्म निष्ठा को देखकर उस समय के प्रसिद्ध संत स्वामी अद्वैत प्रकाश ने उन्हें मंत्र दीक्षा देकर परमार्थ पथ पर विधिवत दीक्षित किया। कुलभूषण ने संसार के सभी सम्बन्धों को त्याग कर निवृत्ति पथ अंगीकार कर लिया। उनका नाम कुलभूषण से बालयोगी सर्वदास हो गया और वह नैष्टिक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए साधना में रत हो गए।

देहरादून नगर के मध्य में स्थित कालिका मार्ग जिसका नाम कभी मछली बाजार था, बहुत पहले कभी यहां घने जंगल थे और इस स्थान पर बने मंदिर में पशु बलि दी जाती थी। बाहरी विध्वंसक आक्रमण के कारण मंदिर ध्वस्त हो गया और केवल शिला बची रह गई थी।

श्री बाल योगी सर्वदास महाराज की आयु जिस समय 12 वर्ष थी के निर्देश पर इस स्थान का जीर्णोद्धार कराया गया। खुदाई में मिली शिला जिसका छोर नहीं मिल पाया था उस पर एक मढ़ी के आकार का छोटा मंदिर बनवाया गया। सर्व दास महाराज जी ने यहां पशु बलि निषेध कर दिया और मात्र मिष्ठान व तेल से यहां पूजा की शुरुआत की गई।

11 मई 1954 के दिन मंदिर में मां भगवती की ज्योति प्रज्वलित की गई जो आज भी अखंड ज्योति के रूप में विराजमान है। खुदाई के दौरान प्राप्त श्री हनुमान जी की प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित है।

समय-समय पर जन सहयोग के परिणाम स्वरूप यह स्थान एक बड़े तीर्थ के रूप में परिवर्तित हो चुका है। इस स्थान पर श्री कालिका माता के मंदिर के अलावा श्री सिंदुरिया हनुमान मंदिर, श्री ठाकुर राधा कृष्ण मंदिर, श्री हनुमंत गुफा, श्रीबालाजी की पुष्प वाटिका, श्री गिरी गोवर्धन जी, श्री हनुमंत वाटिका आदि अन्य पवित्र स्थल स्थापित है।

श्री कालिका माता मंदिर में विश्व का अनूठा अष्टधातु (सोना, चांदी, प्लेटिनम, सीसा, पारा, तांबा, जस्ता व लोहा) से निर्मित 3.5 टन वजनी तथा लगभग 80 फुट ऊंचा कीर्ति स्तंभ स्थापित है। वस्तूत: यह स्तंभ दैवीय शक्ति का प्रतीक होता है। कालिका भवन मे प्रतिष्ठित ध्वज स्तंभ को दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। शास्त्रों में दुर्गा मां के नौ रूप( शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री) बताए गए हैं, इन सभी रूपों की स्थापना इस स्तंभ में की गई है। इन नौ रूपों की स्थापना के लिए नौ रंग के वस्त्रों को स्तंभ पर चढ़ाया जाता है क्योंकि शास्त्रों में दुर्गा के नौ रूपों के साथ नौ प्रकार के रंगों का ही विधान मिलता है।

इसी कीर्ति स्तंभ पर प्रतिवर्ष रामनवमी के दिन झंडारोहण समारोह होता है। लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष स्तंभ को दैवीय शक्ति का प्रतीक मानकर झंडा जी की पूजा करके अपनी मनौती की याचना करते हैं, इस याचना के प्रतिक के रूप में ध्वज के साथ रुमाल, मौली, धागा आदि बांधते हैं। स्तंभ के ऊपर रजत-स्वर्ण छत्र चढ़ाया गया है जो देहरादून के किसी भी कोने से नजर आता है।

श्री सर्वदास जी महाराज की प्रेरणा से सन 1956 में पहली बार ध्वज स्थापित किया गया था। तबसे लगातार प्रतिवर्ष राम नवमी पर्व के दिन यहां ध्वजारोहण समारोह मनाया जाता है।

अष्टधातु के कीर्ति स्तंभ स्थापित होने से पहले यहां काष्ट का स्तंभ होता था जिस पर प्रत्येक रामनवमी पर झंडारोहण किया जाता था। तब बाजार से 30 फुट लंबी बल्ली लाकर स्तंभ के रूप में स्थापित की जाती थी। बाद में ध्वज स्तंभ की लकड़ी बाजार से नहीं लाकर बल्कि प्रति दूसरे वर्ष बाबा लक्ष्मण सिद्ध के जंगल से शास्त्रोक्त रीति से ध्वज स्तंभ हेतु वृक्ष का चयन किया जाता था, वृक्ष के साथ वनस्पति पूजन किया जाता था। वृक्ष से स्तंभ बनाने की क्रिया को भी बड़े धूमधाम से संपन्न किया जाता था। स्तंभ को शोभा यात्रा के रूप में लाया जाता था तथा शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते थे।

झंडारोहण समारोह के अवसर पर नवरात्र की दुर्गाष्टमी पर्व के दिन विशाल कुमारिका पूजन किया जाता है। रात्रि में भगवती जागरण होता है जिसमें प्रसिद्ध कलाकार और संगीताचार्य भक्तिपूर्ण भजनों और गीतों को प्रस्तुत करते हैं।

एक संत की प्रेरणा के परिणाम स्वरूप यह एक भव्य तीर्थ के साथ-साथ समाज सेवा का भी एक प्रमुख केंद्र है। यहां संतो व अतिथियों के लिए मां कालिका दयाल अन्नपूर्णा भंडार चल रहा है। मां कालिका धर्मार्थ औषधालय संचालित होता है। इसके अलावा श्री सिंदुरिया हनुमान मंदिर व मां कालिका रैन बसेरा,श्री सिंदुरिया एंबुलेंस, मां कालिका नेत्र औषधि, मां कालिका पुस्तकालय, मां कालिका अतिथि स्वागत गृह आदि भी चल रहे हैं। महाराज धर्मदास जी ने यहां कालिका गुप्त बाबा की दुकान स्थापित की जिससे संतो व भक्तों को निशुल्क विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुएं दी जाती हैं। निर्धन बालिकाओं के लिए उनके नाम पर बैंक में सावधि राशि जमा करा कर उनके माता-पिता को सौंप दी जाती है। निर्धन बालिकाओं के विवाह भी कराए जाते हैं। साथ ही गोधन सेवा कोष, अन्न क्षेत्र कोष व चिकित्सा कोष स्थापित किए गए हैं।

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