__________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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ऐतिहासिक गरगज्ज  –

जेवर खादर के करौल गांव में मुगल काल में निर्मित एक ऐतिहासिक मीनार है। ऐसा माना जाता है कि इस प्राचीन इमारत का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां के काल में हुआ था स्थानीय भाषा में इसको गरगज्ज कहते हैं।

एक ऊंचे टीले पर स्थित इस इमारत की वर्तमान ऊंचाई भूमितल से लगभग 90 फुट है। बताया जाता है कि यह इमारत जमीन से जितनी ऊपर है, उतनी ही गहरी जमीन में धंसी हुई बताई जाती है। इस इमारत की दीवारों की मोटाई 1 मीटर से भी अधिक है। इमारत की नीचे से चौड़ाई अधिक है और ऊपर की तरफ इसकी चौड़ाई घटती गई है। इमारत में पतली कांकरिया जैसी ईटों का प्रयोग किया गया है।

इस प्रकार की यह एकमात्र इमारत नहीं है। इसके जैसी और भी कई इमारतें आसपास के स्थानों पर स्थित हैं। इसके जैसी ही अन्य इमारतें नोएडा फेस 2 के एक गांव में है, दनकौर के चंडौस गांव में और नौहझील में भी इसके जैसी ही प्राचीन इमारतें हैं। बताते हैं की इस प्रकार की इमारतें जहां-जहां भी स्थित है वहां पहले यमुना नदी बहती थी या आज के समय में भी बह रही है। समय-समय पर यमुना अपना स्थान बदलती रही और ये गरगज्ज यमुना से दूर चले गए। मुगल काल में इन ऐतिहासिक इमारतों का क्या महत्व था। किस कामकाज के लिए इन्हें बनाया गया था। इस बारे में लोग तरह-तरह के मत रखते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इन उंची – उंची मीनारों की चोटी पर चढ़कर ढोल बजाकर संकेत के द्वारा एक दूसरे को तात्कालिक संदेश पहुंचाया जाता था। ध्वनि संकेतों के माध्यम से संदेश को बहुत कम  समय में दिल्ली से आगरा तक पहुंचा दिया जाता था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन इमारतों के ऊपर रात के समय तेल के दीपक जलाए जाते थे। जिससे रात में यात्रा कर रहे यात्रियों और मुगल सैनिकों की पलटन जोकि दिल्ली से आगरा आती जाती थी उनको रात्रि में रास्ता सुलझाने का काम करती थी। इसके अलावा और भी तरह-तरह की भ्रांतियां ग्रामीणों ने इन प्राचीन गरगज्ज के प्रति अपने मन में बना रखी है।

कुछ ग्रामीण कहते हैं कि गरगज्ज जहां स्थित है वहां प्राचीन समय में वल्लभनगर शहर था जो महाप्रलय में ध्वस्त हो गया। आज भी गांव में एक प्राचीन खेड़ा स्थित है। गांव के खेतों की जुताई और खेड़े की खुदाई में समय-समय पर प्राचीन सिक्के और मिट्टी और तांबे के बर्तन मिलते रहते हैं। इससे यह विश्वास पक्का होता है की इस स्थान पर कोई प्राचीन बस्ती थी।

गरगज्ज की ऊपरी मंजिल पर आज भी चक्की का एक विशाल पाठ रखा हुआ है। कुछ ग्रामीण कहते हैं की पुराने समय में राजा के निर्देश पर प्रतिदिन प्रातः काल गांव वालों को जगाने के लिए इस चक्की को चलाया जाता था। लेकिन यह सब स्वयं के गढे गए तर्क हैं, क्योंकि इस तरह के गरगज्ज अन्य कई स्थानों पर भी हैं।

 

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