_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र सारा इलाका पर्वतीय प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। इस वृहत भूभाग में महासू देवता गहरे से समाए हुए हैं। इस क्षेत्र के आराध्य महासू देवता हैं। यहां महासू देवता एवं उनके नायबों के मंदिर हर गांव में मौजूद हैं लेकिन महासू देवता का मूल एवं प्रमुख मंदिर टौंस नदी के तट पर हनोल नामक स्थान पर स्थित है। देहरादून से मोटर मार्ग द्वारा चकराता-त्यूणी होकर यहां पहुंचा जा सकता है।

हनोल के महासू मंदिर पर पूजित क्षेत्र के श्रद्धालु निरंतर आते रहते हैं। यह मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास में रुचि रखने वाले शोधकर्ता एवं पर्यटक भी यहां बड़ी संख्या में आते हैं।

हनोल के महासू मंदिर में समय-समय पर अनेक मेले-उत्सव होते हैं। पौष और माघ में महासू की पूजा उत्सव के रूप में होती है। बसंत पंचमी का ढ़कनच, दिवाली, भादो माह की तृतीया का जागरण तथा प्रत्येक माह की सक्रांति को देवालों द्वारा किया जाने वाला ‘ढ़कनच’।

महासू देवता का मूल स्थान कुल्लू कश्मीर में माना जाता है। कहावत है कि ये देवता कश्मीर से यहां लाए गए थे। जनश्रुति के अनुसार हनोल से 9 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मैंद्रथ गांव के निकट टौंस नदी के तट पर पुरनाव ताल में किरविदराना(किरबीर) दैत्य का निवास था। इस दैत्य ने यहां के लोगों के ऊपर अपना आतंक मचाया हुआ था। इस दैत्य से जौनसार वासी ऊणा भाट नामक ब्राह्मण सबसे अधिक प्रभावित था क्योंकि किरमिर नामक दैत्य ने इस ब्राह्मण के साथ बेटों को खा लिया था। ऊणा के तीन लड़के और एक पुत्री को छोड़कर इस दैत्य ने प्रतिदिन एक-एक करके परिवार के सभी सदस्यों का भक्षण कर लिया। इससे ऊणा बहुत दुखी हुआ। वह इस दैत्य के नाश की तलाश में इधर-उधर भटकता फिरा। एक रात ऊणा को स्वप्न हुआ कि वह कश्मीर जाकर महासू देवता को यहां ले आए। महासू देवता ही इस दैत्य का नाश करेंगे।

ऊणा भाट कश्मीर गए वहां उन्होंने पूरे मन से महासू देवता की स्तुति की। उनके आह्वान पर महासू देवता ने प्रकट होकर दर्शन दिए और उन्हें वरदान दिया कि जल्दी ही उनको और समस्त क्षेत्रवासियों को दैत्यों के अत्याचार से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने ऊणा को थोड़े से चावल दिए और कहा कि इन्हें टौस नदी में डाल देना। वह दैत्य कुछ नहीं कर सकेगा। रविवार के दिन किसी युवक के द्वारा खेत में हल जुतवाना, इस कार्य में प्रयुक्त होने वाले बैल ऐसे होने चाहिए जिन्होंने पहले कभी खेत न जोते हों। ऐसा करने से सातवें हफ्ते में महासू भाई अपने मंत्रियों और सेना के साथ प्रकट होंगे और समस्त क्षेत्र को दैत्यों से मुक्त कर देंगे।

ऊणा भाट ने अपने गांव में आकर जैसा उससे कहा गया था वैसा ही किया। खेत जोतना आरंभ करने के छठे हफ्ते के रविवार को जब हूणा भट खेत जोत रहे थे तो हल के पहले चक्कर पर बोठा महासू प्रकट हुए इसी प्रकार दूसरे चक्कर पर खेत जोतते हुए पबासिक महासू तीसरे चक्कर पर बसिक महासू और चौथे चक्कर पर खेत जोतते समय चालदा महासू प्रकट हुए। चारों देव भ्राताओं को सामूहिक रूप से महासू (चार महासू) कहा जाता है।

चालदा – यह एकमात्र स्वस्थ एवं बलशाली निकले

पहले तीन देवताओं की मूर्तियां मंदिरों में स्थापित हैं तथा चालदा पूरे क्षेत्र की खोज खबर के लिए घूमते रहते हैं।

पांचवी मूर्ति भी निकली थी जो महासू देवता की माता की थी। उनका मंदिर उसी खेत में बनवाया गया। महासू देवता का यह सबसे पुराना मंदिर है जो मैंद्रथ गांव में है जो महासू की मां ‘देओलाड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध है।

ऊणा ने अपने तीनों पुत्रों के सहयोग से सभी महासू देवताओं की मूर्तियों की यथा-विधि पूजा शुरू की। उसने अपने तीनों बेटों को इनकी सेवा में लगा दिया। उसका बड़ा बेटा पुजारी हुआ , मंझला बेटा घंटा बजाता था जो राजपूत हुआ और सबसे छोटा लड़का बाजा बजाने वाला बाजगी कहलाया। यही तीन भाई तीन वर्णों में विभक्त हुए।

ऊणा की भक्ति से प्रसन्न होकर महासूओं ने अपने गण केलूवीर के द्वारा उस दैत्य का नाश किया। तब से ही उन केलूवीर की भी पूजा की जाती है।

महासू देवता ने मैंद्रथ गांव के स्थान पर हनोल को अधिक पसंद किया। महासूओं का सबसे बड़ा मंदिर हनोल गांव में है। हनोल मंदिर में चार भाई महासू की मूर्तियां स्थापित होने के कारण बोठा मंदिर न होकर संयुक्त रूप से महासू मंदिर कहलाता है। महासू मंदिर के पुजारी वजीर कहलाते हैं।

महासू देवता चार भाई हैं। सबसे बड़े भाई स्थाई रूप से हनोल में ही रहते हैं। चालदा महासू इस क्षेत्र में भ्रमण करते रहते हैं। जौनसारी बोली में चालदा का मतलब ‘चलता’ होता है अर्थात जो निरंतर भ्रमण करता है। चालदा महासू 12 वर्ष टौंस नदी के बाएं तटवर्ती इलाके जिसे साठी क्षेत्र कहा जाता है में भ्रमण करते हैं तथा 12 वर्ष पांसी क्षेत्र में जो टौंस नदी का दाएं तटवर्ती इलाका है भ्रमण करते हैं। इन दोनों भागों में स्थान परिवर्तन करने पर दो-तीन रात्रि के लिए हनोल में शिविर स्थापित कर निवास करते हैं तथा 12 वर्ष तक उस क्षेत्र में भ्रमण करने के दौरान जो धन दौलत भेंट में एकत्र होती है वह सब हनोल मंदिर में जमा कर देते हैं।

महासू देवता के अन्य रूपों की पूजा इस क्षेत्र केअन्य अनेकों स्थानों पर होती है। ‘पासी क्षेत्र’ के माकुड़ी,वामसू,भूटाणू,चिवा,आराकोट,देवगन तथा देवती जगहों पर स्थित मंदिरों में महासू के पवासी रूप की पूजा होती है तो ‘साठी क्षेत्र’ के बागी,कूचा,केमाड़ा,रडू,कनासर गांव के मंदिरों में महासू के भासीक रूप की पूजा होती है।

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