______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी. के दायरे में व उसके निकट गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के चकराता क्षेत्र में स्थित एक नहीं कई मायनों में अद्वितीय जौनसार बावर का जनजातीय इलाका अपनी बोली ,भाषा तथा जनजातीय परंपरा के लिए दूर-दूर तक ख्याति प्राप्त है। यहां प्रकृति ने पग-पग पर अपनी सुंदरता का खजाना बिखेरा है तो यहां की परंपराएं, रीति-रिवाज, वेशभूषा, रहन-सहन, बोली-भाषा, गीत-संगीत, खान-पान, मकानों के निर्माण आदि विशेषताओं के कारण यहां की लोक संस्कृति देश-दुनिया में सबसे ज्यादा ख्याति प्राप्त है। यहां कई स्थान हैं जहां पर प्राचीनतम इतिहास और संस्कृति के पदचिन्ह मौजूद हैं। यह जनजातीय क्षेत्र देहरादून शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और कालसी, चकराता व त्यूणी तहसीलें इसी क्षेत्र के अंतर्गत हैं। यहां के प्रमुख स्थान कालसी, लाखामंडल, बैराटगढ़ और हनोल आदि हैं।

यदि ऐतिहासिक तथा पौराणिक आख्यानों का आधार लिया जाए तो पता चलता है कि यहां पर स्थित लाखामंडल जौनसार की राजधानी माना जाता है। प्राचीन धर्म ग्रंथ के केदारखंड का यह क्षेत्र सबसे समृद्ध और सुखी राज्य माना जाता था। लाखामंडल राज्य की परिकल्पना का आधार लिया जाए तो ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि लाखामंडल, बाटाहाट मंडल की दक्षिणी सीमा से अंबाला, सहारनपुर के घाड क्षेत्र तक यह विस्तारित था।

महाभारत काल का यहां से गहरा नाता है। यह स्थान जौनसारी जनजाति का मूल स्थान है, जिनकी जड़ें महाभारत के पांडवों से निकली हुई है। यह समाज अपने को पांडवों का वंशज मानते हैं। पांडव कालीन संस्कृति इस समाज के लोक जीवन में रची बसी है। इस क्षेत्र के हर गांव में आज भी पांडवों की चौंरी मिल जाएगी जहां पांडवों के प्रतीक अस्त्र रखे हुए होते हैं। प्रत्येक माह की संक्रांति के दिन इनकी पूजा की जाती है। पांडव यहां के लोकगीतों में नायक के रूप में तो विद्यमान हैं ही साथ ही यहां के त्योहारों, उत्सवों तथा शादी-विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों में भी पांडवों का चित्रण है।

यहां की बहुपति प्रथा भी पांच पांडव और उनकी पत्नी द्रौपदी वाले प्रसंग से जुड़ी है यद्यपि अब यह प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है।

महाभारत काल में यह प्रदेश पांचाल देश के नाम से जाना जाता था। द्वापर युग के महाभारत काल में दुर्योधन ने पांचो पांडव और उनकी माता कुंती को जीवित ही जलाकर मारने का षड्यंत्र रचा था। लाखामंडल के बारे में कहा जाता है कि महाभारत पुराण में दिए गए वर्णन के अनुसार दुर्योधन ने उस लाक्षागृह का निर्माण यहीं कराया था, लेकिन पांडव लंबी सुरंग से पहाड़ी की दूसरी ओर निकल गए, आज भी उस मीलों लंबी सुरंग का मुंह पर्यटक अपनी आंखों से देख सकते हैं। यहां बड़ी-बड़ी कई गुफाएं हैं जो इस स्थान की ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को बताती हैं। अभी भी यहां खेतों में हल जोतते समय यदा-कदा अनेक तरह की मूर्तियां मिल जाती हैं। यहां अनेक तरह के शिवलिंग और मूर्तियों का भंडार है। लाखामंडल के बारे में अनेक तरह की कहानियां व्याप्त हैं। लाखामंडल के समीप खेत में खुदाई के दौरान 2800 साल पुराने महापाषाण शवागार संस्कृति (मेगालिथिक साइट) के अवशेष मिले हैं। इस खोज से लाखामंडल क्षेत्र और यमुना-टौंस घाटी के इतिहास को नई दिशा मिलती है। लाखामंडल के निकट एक किसान को खुदाई के दौरान पत्थरों के बीच सुरक्षित किए गए तीन-चार शवों के कंकाल, बर्तन व अन्य वस्तुएं मिली थी।

लाक्षागृह से सुरक्षित बचकर निकलने के बाद पांडव इस क्षेत्र में भटकते रहे इसी बीच पांडव ‘एकचक्रा’नगरी गए थे। जहां भीम ने बकासुर नामक राक्षस का वध किया था। वह एकचक्रा नगरी ही अपभ्रंश होकर आज का चकराता नगर है। यहां और भी कई गांवों और स्थानों के नाम महाभारत कालीन हैं।

लोकमान्यता तो यह भी है कि पांडव अज्ञातवास का समय यहां छुप कर रहे थे। पांडवों ने अज्ञातवास का समय राजा विराट के यहां रूप बदलकर बिताया था। राजा विराट की राजधानी बैराटगढ़ के अवशेष यहां के कालसी कस्बे के ऊपर टूटी-फूटी अवस्था में पाए जाते हैं जो अभी भी यहां खंडहर, ध्वंषाशेष,कुएं व सुरंग आदि के रूप में विद्यमान हैं। यह राजा विराट महाभारत कालीन के हैं या कोई और—-? राजा विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था।

यहां विशेष अवसरों पर इस क्षेत्र के प्रसिद्ध ‘पांडव नृत्य’ का आयोजन होता है। इस विशेष नृत्य को करने वाले अब कुछ ही लोग बचे हैं। पांडव नृत्य होने के समय बजने वाली ढोल की धुनों से इसके करने वाले कलाकार आवेशित हो जाते हैं।

लाखामंडल के अलावा यहां के हनोल, रैना वह मैंद्रथ आदि स्थानों पर भी खुदाई के दौरान पौराणिक शिवलिंग व मूर्तियां प्राप्त हुई है जो गवाह है कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा है।

जौनसार बावर क्षेत्र के ही कालसी में सम्राट अशोक का शिलालेख आज भी मौजूद है। इस प्राचीन शिलालेख में भगवान बुद्ध के बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का उल्लेख किया गया है। कलिंग युद्ध में हुए भीषण नरसंहार के पश्चात सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म में निहित शिक्षा की ध्वजा संसार में यहां वहां फहराना शुरू किया तो जौनसार बाबर के इस क्षेत्र को भी यह सौभाग्य प्राप्त हुआ, यहां अशोक का शिलालेख आज भी कालसी में मौजूद है। यह सम्राट अशोक के समय का सबसे विशालतम शिलालेख माना जाता है और यह इस बात की भी पुष्टि करता है की उस कालखंड के समय इस क्षेत्र का कैसा वैभव रहा होगा।

सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेंनसांग (सन 629 – 45) गुप्त काल के समय भारत की यात्रा पर आए थे। उन्होंने भी अपने यात्रा वृतांत में इस स्थान का वर्णन ‘सुग्न’ के रूप में किया है।ह्वेंनसांग ने लिखा है कि ‘उत्तर में पर्वतों से घिरा तथा पूर्व में गंगा व पश्चिम में यमुना के बीच स्थित सुग्न क्षेत्र सिरमौर से पूर्व में पड़ता है, मैं इसी रास्ते से चलकर कालसी पहुंचा ‌ यमुना के पश्चिम में स्थित विरान से पड़े एक शहर से भी गुजरा, यहां के निवासी सच्चे और ईमानदार हैं।मुलत: वे हिंदू धर्म में विश्वास रखते हैं यहां सौ हिंदू मंदिर है। यहां हीनयान बौद्ध धर्म के भी संघ हैं जिनमें एक हजार बौद्ध भिक्षु रहते हैं। यहां तथागत बुद्ध के पवित्र केश और नाखून एक बड़े स्तूप के भीतर सुरक्षित रखे हैं।’

कालसी को सिरमौर राज्य के दौरान दो बार राजधानी होने का सम्मान मिला।

अनेक कहानियों के रूप में कहा जाता है और कुछ का तो यह भी कहना है कि यहां की समृद्धि को देखकर महमूद गजनवी ने इसको लूटा उसके बाद गुलाम कादिर ने भी यहां पुण: लूटपाट की तथा मूर्तियों को खंडित कर दिया। आज भी इस इस क्षेत्र में अनेक मूर्तियां खंडित अवस्था में विद्यमान हैं। जौनसार बावर में अनेक तरह की लोक मान्यताएं, कथाएं और स्थल हैं जिनके बारे में बड़े-बुजुर्ग तरह-तरह की दंत कथाएं सुनाते हैं।

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