_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद ( उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी के दायरे में तथा उसके निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के सीमांत का इलाका चकराता जौनसार- बावर प्राकृतिक सुंदरता के कारण अलग ही महत्व रखता है। यह क्षेत्र अपने आप में ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से विशिष्ट वैभव समेटे हुए हैं। रोज के रोज रोजी रोटी के लिए जंगल और जमीन से जूझने वाले जौनसार बावर के बाशिंदे एक उत्सवधर्मी समाज है।

इस जनजातीय क्षेत्र की आंचलिक संस्कृति का एक मुख्य पहलू खेल, नृत्य, पर्व, त्योहार और मेले हैं। इस अंचल में दो त्यौहार ‘बिस्सू’और ‘मरोज’ बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। यहां के लोग त्योहारों को मिलजुल कर नाचते गाते और खाते पीते हुए मनाते हैं। इस अंचल की संस्कृति का आनंद तब लिया जा सकता है, जब यहां प्रतिवर्ष बैसाखी पर्व के बाद गांव गांव में मेले लगते हैं।

इस क्षेत्र का श्रमजीवी समाज साल भर खेती-बाड़ी के कामों में उलझा रहता है। फसल काटने के बाद आराम के समय वह त्यौहार मनाते हैं। फसल की बुवाई से लेकर उसके समाप्त होने तक वह खेती-बाड़ी के कामों में व्यस्त रहते हैं। सर्दियों के मौसम में उन्हें फुर्सत मिलती है , तब पूस के त्योहारों का आरंभ होता है, जो छह दिन तक चलते हैं। ये पूस के त्यौहार इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ये पौष माह में होते हैं। जौनसार बावर क्षेत्र में ये त्यौहार मरोज के नाम से प्रचलित हैं। हिंदी पंचांग के अनुसार मकर सक्रांति से छह दिन पहले यह त्यौहार शुरू हो जाते हैं, यानी ९ जनवरी से १४ जनवरी तक इन त्योहारों का जश्न मनाया जाता है। इस समय लोग अपने इष्ट देवी देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं। घरों में हलवा बनाकर मीठे भोज की पूजा-अर्चना से पर्वों का आरंभ किया जाता है। गांव की थाती और पुरखों की याद में पितृ रूप में बनाए गए चारों मंदिरों के लोग रणसिंघा बजा कर त्योहारों का स्वागत करते हैं। त्योहारों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं जिन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं। लोग पूरे दिन मौज मस्ती करते हैं और शाम को तांदी गीत और रांसू नृत्य करते हैं।

जौनसार बावर क्षेत्र के ‘विशु’ उत्सव की ख्याति दूर-दूर तक है। एक माह पहले से ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। जीवन की जो उमंग और जीवट विशू में देखा जाता है वह अन्यत्र कहीं नहीं। विवाहित लड़कियों के प्राण विशु की प्रतीक्षा में अटके रहते हैं। आधा चैत्र माह के खत्म होते होते घरों की साफ-सफाई, लीपा-पोती शुरू हो जाती है। त्योहार के समय आने वाले मेहमान अतिथियों की मेहमाननवाजी के लिए अनेकों तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। विशु के उत्सव पर हर घर में विशेष विधियों से तरह-तरह के भोजन बनाए जाते हैं। इस क्षेत्र में कोई भी उत्सव या पर्व हो यहां की स्त्रियों को काम से फुर्सत नहीं मिलती।

विशु उत्सव का पहला दिन ‘फुल्यात्’ का दिन होता है। संक्रांति के दिन प्रत्येक घर का सदस्य बुरांश के लाल फूल लेने के लिए जंगल में जाता हैं। यहां के युवकों का जत्था सामूहिक रूप से जंगलों में फूल लेने के लिए जाता है। वीर विन्नरों का दल जंगल जंगल भटक कर बुरांस के फूलों का गजरा जिसे वे ‘स्यूंरी’कहते हैं तैयार करते हैं। सूर्योदय में युवकों के वापस आने के समय ढोल, दमाऊं, रणसिंगे के साथ इनका स्वागत होता है। इन वाद्य यंत्रों के बजने की आवाज के बीच बच्चों का रेला, स्यूरियों को लेकर लौट रहे युवको से मिलने निकल पड़ता है। बुरांश के इन फूलों के गुलदस्ते (जेबियां) पूरे गांव के मकान का जो अगला भाग होता है उस पर लगाई जाती हैं।

इस समय पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। स्त्रियां पुरुषों के साथ गोल घेरे के आकार में पंक्तिबद्ध हो वसंत देवता के प्रिय पुष्पों की गाथा गायी जाती है।

उत्सव का दूसरा दिन ‘विशु’ का दिन होता है। स्त्रियां ‘थोई’के कपड़े पहनती हैं।’थोई’के कपड़े मात्र विशु के पर्व पर पहनने के कपड़े होते हैं। यह पोशाक केवल इसी दिन उपयोग में लाकर वर्ष भर के लिए बक्सों में बंद करके रख दी जाती है। स्त्रियों के दल एक साथ और पुरुषों के एक साथ दोनों सार्वजनिक मिलन स्थलों (थातों) की ओर चल पड़ते हैं। गावों में केवल वृद्ध ही घरों में रह जाते हैं।

बैसाखी पर्व के बाद इस क्षेत्र के गांव-गांव में मेले लगते हैं। ‘बिस्सू’ तथा ‘गतियात’इस क्षेत्र के मुख्य मेले हैं जो कि प्रतिवर्ष १४, १५, १६ अप्रैल को परंपरागत ढंग से मनाए जाते हैं। विशु मेले का मुख्य केंद्र लाखामंडल गांव है।

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