__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि एक समय था मुगल बादशाह भी जिनकी जूती में रहता था। वह बादशाहगर सैय्यद बंधु जानसठ के ही थे। दुनिया उन्हें किंगमेकर के नाम से जानती है।

मुजफ्फरनगर जनपद का जानसठ कस्बा पौराणिक एवं इतिहास की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा रहा है।

मुगल काल के अंतिम दौर का यह समय, वह था जब सैय्यद बंधु जिसे चाहते दिल्ली के लाल किले का तख्त सौंप देते और जिसे चाहते उतार देते थे। जानसठ के ये सैय्यद भाई इतिहास में ‘बादशाहों को बनाने वाले’ के नाम से जाने जाते हैं।

मुगल बादशाह औरंगजेब की मौत के बाद दिल्ली के लाल किले के तख्तेताऊस पर बैठने के लिए मुगल खानदान में सत्ता के लिए निरंतर संघर्ष हो रहे थे। उसी समय एक ऐसा भी समय आया कि जानसठ के नवाब सैय्यद भाई हसन अली खां और अब्दुल्ला खां जिसको चाहते दिल्ली के लाल किले के तख्त पर बैठा देते।
मार्च 1712 में मुइजुद्दीन जहांदारशाह के नाम से दिल्ली के लाल किले के तख्त पर बैठ मुगल बादशाह बना। जहांदारशाह एक निर्दयी और विलासी शासक था। वह दिल्ली की एक नर्तकी लालकुंवर की मोहब्बत में फंसा दिन रात लालकिले के रंगमहल में उसके साथ रास रंग में डूबा रहता। लालकुंवर के संबंधी सत्ता के बड़े-बड़े पदों पर काबिज हो गए। इस सबसे बादशाह अपनी प्रतिष्ठा खोने लगा। पुराने अमीरों सामंतों में असंतोष भड़कने लगा। ऐसे समय में ही लाल कुंवर के आदेश पर शहजादों की आंखें निकाल ली ग‌ई।इस प्रकरण से आग में घी पड़ गया।
इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर सैय्यद भाईयों हसन अली खां और‌ अब्दुल्ला खां की मदद से अजीमुश्शान के लड़के फर्रूखसियर ने जहांदारशाह को कैद में डालकर दिल्ली के तख्त पर कब्जा करके सत्ता संभाली ली।

दिल्ली की तख्त पर फर्रुखसियर का अधिकार होते ही,जानसठ के सैय्यद अब्दुल्ला खां और हसन अली खां दिल्ली पर छा ग‌ए। अब्दुल्ला खां दिल्ली के वजीर ए आजम और हसन अली खां अमीर उल उमरा बने।
बादशाह के प्रधानमंत्री और सेनापति के पद मिलने के बाद सैय्यद बंधु दिल्ली की किस्मत का फैसला करने लगे।
कुछ समय बाद इनकी फर्रूखसियर से अनबन हो गई। उन्होंने फर्रूखसियर का कत्ल करा दिया। इसके बाद उन्होंने रफीउद्दरजात को बादशाह बनाया इसके बाद इनकी सहायता से ही रफीउद्दौला और फिर सन1719 में मोहम्मदशाह तख्तनशीन हुआ।

दक्कन भारत में अब्दुल्ला खान के नेतृत्व मुग़ल फौज ने कई लड़ाइयां लड़ी और वहां लूटपाट कर दिल्ली के खजाने को भरा।
सैय्यद भाइयों की तलवार की नोक पर दिल्ली के लाल किले में कई बादशाह बने और बिगड़े और यह दोनों भाई इतिहास में बादशाहगर के नाम से मशहूर हुए। सैय्यदों ने अपने दम पर दिल्ली के चार बादशाह बदल डाले थे।

लेकिन साजिशें रचने वाले खुद साजिश का शिकार हो गए। सैय्यद भाई बादशाह मोहम्मद शाह को भी अपने हाथ की कठपुतली बनाना चाहते थे लेकिन मोहम्मद शाह ने उनकी मनमर्जी से चलने से इंकार कर दिया। बाद में इन भाइयों से नाराज दरबार के तुर्की और ईरानी धर्मगुरुओं ने बादशाह मोहम्मदशाह को उनके खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। सैयद भाइयों के विरोधी एकजुट होने लगे। सत्ता की इस लड़ाई में सन 1720 में सैय्यद भाइयों में छोटे भाई हसन अली खां का कत्ल कर दिया गया और इसके 3 साल बाद बड़े भाई सैय्यद अब्दुल्लाह खां को भी कैद करके जहर दे दिया गया।

यह जानकर हैरानी भी होती है कि एक वह भी दौर था जब मुगलिया सल्तनत पर यूपी के इस छोटे से कस्बे जानसठ का राज था। यह छोटा सा कस्बा कैसे एक जमाने में इतनी महत्वपूर्ण जगह बन गया था। उस समय की तमाम निशानियां यहां मौजूद है जो उसके भव्य अतीत और वैभव की कहानियां कहती हैं।

जानसठ कस्बे में अभी भी सैय्यद बंधुओं की निशानी रंग महल मौजूद है। उस समय‌ मुगलिया सल्तनत के सारे अहम फैसले जानसठ के इस शानदार और भव्य रंग महल में बैठकर होते थे। सैय्यद भाई अपनी बेगमों और दरबारियों के साथ ताकतवर सेना सहित यहां रहते थे। उस समय रंग महल की रंगीनियों की भव्यता गजब की रही होगी लेकिन अब रंगमहल विरान पड़ा है यहां कोई नहीं रहता।
मुगल सेना की सबसे बड़ी और ताकतवर टुकड़ियां सैय्यद भाइयों के अधीन थी। मुग़ल फौज की वे टुकड़ियां सबसे बड़ी ही नहीं लाव लश्कर और हथियारों के जखीरे में भी विशाल थी। लगभग डेढ़ दशक तक सैयद भाइयों का जलवा दिल्ली के लाल किले के दरबार में चला तब वह दिल्ली में किंग मेकर बन गए थे। दिल्ली के लाल किले का दरबार एक पैर पर खड़े होकर इन भाइयों की जी हजूरी में हाजिर रहता था। दिल्ली के तख्त पर कौन बैठेगा वह कैसे राज करेगा यह तय करने का काम यह भाई करते थे।

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