____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि. मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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श्रद्धालुओं की परम आस्था का प्रतीक श्री गुरु दरबार सोलहवीं शताब्दी के अवसान पर सिखों के सातवें गुरु श्री हरराय के पुत्र श्री गुरु राम राय जी द्वारा स्थापित किया गया था। सन 1676 में गुरु महाराज उत्तराखंड की पावन भूमि देहरादून आए। संत समाज ने इस धाम की रमणीयता से मुग्ध होकर दून की ऊंची नीची धरती पर जो डेरा बनाया, उसी के अपभ्रंश स्वरूप इस जगह का नाम डेरादीन हो गया और फिर बाद में देहरादून हो गया। श्री गुरु राम राय जी ने इस धरती को अपनी कर्म स्थली बनाया।

प्राचीन पुस्तकों की जानकारी के अनुसार बाबा राम राय का जन्म पंजाब के जिला रोपड़ स्थित किरतपुर में चैत्र मास की पंचमी को सन 1646 में हुआ था। यह दिन होली के बाद पांचवे दिन पड़ता है। इनके पिता गुरु हरराय साहब तथा माता सुलक्षिणी थीं।

बाबा राम राय की शिक्षा दीक्षा किरतपुर के दीवान दुर्गामल के निर्देशन में हुई जिससे वे संस्कृत गुरुमुखी तथा फारसी भाषाओं के ज्ञाता हुए। इसके अलावा यह शस्त्र विद्या के भी धनी थे। बचपन से ही बाबा रामराय का अधिकांश समय पूजा पाठ में व्यतीत होता था। बाबा रामराय ने 15 वर्ष की अल्पायु में ही परमयोगी की सिद्धि अवस्था प्राप्त कर ली थी।

गुरु रामराय के पिता सिखों के सातवें गुरु हरराय और उस समय के मुगल बादशाह शाहजहां के मध्य संबंध पहले तनावपूर्ण होने के बाद सुधर गए थे। दोनों के बीच संबंधों के सुधार का एक कारण यह बताया गया है कि गुरु हरराय जी ने शाहजहां के प्रिय पुत्र दारा की बीमारी के समय बादशाह के अनुरोध करने पर एक महत्वपूर्ण जड़ी भिजवाई थी और उस जड़ी से दारा ठीक हो गया था। इसके बाद दारा के मन में भी श्री गुरु हरराय जी के प्रति सम्मान उत्पन्न हो गया था।

सन 1657 में शाहजहां बीमार पड़ गया और इसके साथ ही उसके पुत्रों में दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए युद्ध प्रारंभ हो गया। उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा को पराजित कर दिया। औरंगजेब से पराजित हो कर जब दारा पंजाब की ओर भाग रहा था तो उसने गुरु हरराय जी से सहायता मांगी। गुरु हर राय जी ने यद्यपि दारा की मदद तो नहीं की लेकिन उन्होंने दारा को भागने में अवश्य सहायता प्रदान की। दारा को भागने में सहायता करने के कारण औरंगजेब गुरु हर राय जी से अप्रसन्न था।

दिल्ली के तख्त पर कब्जा करने के बाद बादशाह बनने पर औरंगजेब ने 1661 में एक दूत भेज कर सिखों के गुरु हरराय जी को दिल्ली आने का हुकुम दिया। गुरु हरराय स्वयं तो दिल्ली नहीं गए लेकिन उन्होंने अपने पुत्र राम राय को योग्य समझकर जिनकी उस समय मात्र 15 वर्ष की आयु थी को दिल्ली जाने की आज्ञा दी।

औरंगजेब खुद कुरान और महजबी किताबों का बड़ा विद्वान था। औरंगजेब को सूफी पीरों के चमत्कार पर बड़ा विश्वास था। उसे जब मालूम हुआ कि सिक्खों के गुरु भी चमत्कार दिखाने की शक्ति रखते हैं। औरंगजेब ने गुरु हर राय जी को बुलाने के लिए दूत भेजा था पर गुरु जी ने अपने योग्य पुत्र को दिल्ली भेजा। बालक राम राय औरंगजेब के दूत के साथ दिल्ली के निकट पहुंचे तो नगर के समीप एक वाटिका में ठहर गए और अपने पहुंचने का समाचार बादशाह औरंगजेब को भेज दिया।

औरंगजेब ने बालक राम राय का सम्मान किया। कहते हैं कि बालक राम राय ने बादशाह औरंगजेब के समक्ष क‌ई चमत्कार दिखाए। बादशाह औरंगजेब ने राम राय की परीक्षा लेने के लिए जहर युक्त बहुमूल्य परिधान उनके पास भेजा। राम राय जी परिधान को देखकर मुस्कुराए और कहा ‘जिस राखे तिस कोय न मारे’। उन्होंने वस्त्र धारण किए परंतु उनके ऊपर जहर का कुछ भी प्रभाव नहीं हुआ। औरंगजेब यह सब देख कर आश्चर्यचकित हो गया।

इसके बाद औरंगजेब ने इससे भी कठिन परीक्षा लेने का फैसला कर मौलवियों से सलाह करके उन्हें मिलने के लिए बुलाया और बैठने के स्थान पर उनका आसन एक गहरे कुएं के ऊपर चादर बिछाकर इसलिए लगाया कि जब राम राय बैठेंगे तो कुए में गिर पड़ेंगे, परंतु ऐसा नहीं हुआ और राम राय आसन पर विराजमान होने के लिए गए तो आसन अपने स्थान पर था और उनका बाल भी बांका नहीं हुआ।

इस प्रकार बादशाह औरंगजेब को गुरु राम राय के चमत्कार पर कई बार आश्चर्य हुआ। कहते हैं कि राम राय ने औरंगजेब को 72 चमत्कार दिखाए। औरंगजेब पर राम राय के चमत्कारों का असर हुआ और वह उनसे काफी प्रभावित हुआ। सिख इतिहास के अनुसार औरंगजेब ने राम राय से गुरु ग्रंथ साहब की एक पंक्ति ‘मिट्टी मुसलमान की पेड़े पई कुम्हार’ का स्पष्टीकरण करने को कहा। बादशाह औरंगजेब ने उनसे पूछा कि मुसलमानों को गुरुवाणी में अपशब्द क्यों कहे गए हैं? राम राय ने पंक्ति के शब्दों में परिवर्तन करते हुए स्थिति संभाल ली और कहा कि मुसलमान गलत रूप से उद्धृत है। यह बेईमान होना चाहिए। इस उत्तर से औरंगजेब प्रसन्न हो गया।

सिखों के सातवें गुरु हर राय के दूत बनकर दिल्ली आए उनके जयेष्ठ पुत्र राम राय औरंगजेब से सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने में तो सफल हुए लेकिन गुरु गद्दी के उत्तराधिकार से सदा-सदा के लिए वंचित हो गए।

बादशाह औरंगजेब के समक्ष चमत्कारों का प्रदर्शन कर व गुरुवाणी में परिवर्तन करके राम राय ने मुगल दरबार में तो प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली किंतु उनके पिता गुरु हर राय बिना बात चमत्कारों का प्रदर्शन करने से उनसे खफा हो गए। परिणामत: गुरु हर राय ने राम राय को गुरु गद्दी से वंचित कर दिया। उन्होंने गद्दी का उत्तराधिकारी छोटे बेटे हरकिशन को बना दिया। यद्यपि राम राय ने लौटकर पिता को मनाने का प्रयास किया पर गुरु हर राय ने पुत्र से भेंट भी नहीं की। राम राय दिल्ली लौट आए। गुरु हर राय ने राम राय को सिख धर्म से भी बहिष्कृत कर दिया। इसके कुछ समय बाद गुरु हर राय का निधन हो गया। अब बालक हरकिशन सिखों के आठवें गुरु हो गए।

सिख पंत से निष्कासित होने के बाद राम राय दिल्ली दरबार में रहने लगे और उन्होंने गुरु नानक के पुत्र बाबा श्रीचंद द्वारा चलाए गए उदासी संप्रदाय को अपना लिया और उनके अनुयाई उन्हें गुरु कहने लगे।

उदासीन पंथ के गुरु बनने के बाद गुरु राम राय बादशाह औरंगजेब की चिट्ठी राजा गढ़वाल के नाम लेकर देहरादून आए तो गढ़वाल के राजा फतेहशाह अमूल्य वस्तुएं लेकर उनसे मिलने पहुंचे और उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर सदा इसी स्थान पर रहने की विनती की। राजा फतेहशाह ने समीप के सात गांव – धामावाला, खुरबद्दी, चापासारी, पंडितवाडी, राजपुर, मियांवाला, धरतीबली की जागीरें भी उन्हें भेंट स्वरूप दी। राजा की इस प्रार्थना को स्वीकार कर गुरु राम राय ने सन 1681 में यहीं खुड़बुड़ा में डेरा डाल दिया। यहीं उन्होंने अपना दरबार स्थापित किया। गुरु राम राय स्थाई रूप से इसी स्थान पर रहने लगे। उस समय यह इलाका घने जंगलों के बीच था। उनकी ही स्मृति में यह स्थान पहले डेराडून और बाद में देहरादून नाम से जाना जाने लगा।

कहा जाता है कि गांव दान में मिलने पर राम राय ने एक जगह अपना घोड़ा रोका और उतरकर अपना चाबुक जमीन पर रख दिया, जहां चाबुक रखा था उसी जगह पर आज झंडा चढ़ता है।

गुरु राम राय ने सर्वप्रथम यहां कच्चा दरबार स्थापित किया जिसे बाद में गुरु पत्नी माता पंजाब कौर ने पक्का कराया। गुरु राम राय यहां स्थाई रूप से रहने लगे थे। इसी मध्य उनकी पांवटा साहब के निकट गुरु गोविंद सिंह से भी भेंट हुई। गुरु राम राय का 1687 में असामयिक निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद मकबरा शैली में उनकी पक्की समाधि (देहरा) और गुरुद्वारा बने।

गुरु के निधन के बाद माता पंजाब कौर ने दरबार का कार्य अपने हाथों में ले लिया। उन्होंने औरंगजेब की सहायता से दरबार को पक्का कराया। बादशाह औरंगजेब ने गुरु के सम्मान में एक कसीदा भी भेजा था जो अभी भी दरबार में लगा है। माता पंजाब कौर के समय गुरु गोविंद सिंह की देहरादून यात्रा का उल्लेख मिलता है।

गुरु मंदिर का प्रमुख अंग एक मध्यवर्ती भवन है जिसे ‘दरबार साहब’ या ‘गुरु दरबार’ कहते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से यह एक अति सुंदर रचना है जिसे बादशाह जहांगीर के मकबरे के अनुकरण पर बनाया गया है। दरबार साहब के अंदर गुरु राम राय का आसन सुरक्षित है जिस पर वे योग की महत्वपूर्ण क्रियाएं किया करते थे। गुरु मंदिर के चारों कोनों पर चार समाधिया हैं, जिनका निर्माण श्री गुरु राम राय की चारों पत्नियों के स्मारक के रूप में किया गया है।

जहांगीर की समाधि के अनुरूप बनाने के कारण गुरु मंदिर का स्वरूप मुस्लिम वास्तुकला की इमारत सा लगता है। गुरु मंदिर के तीन सरोवर हैं जिनमें से सबसे बड़ा अब मिट्टी से ढक दिया गया है।

गुरु मंदिर के शिलालेख के अनुसार श्री गुरु राम राय ने स्वयं अपने गुरु मंदिर के आगे झंडे का स्तंभ स्थापित किया था। गुरु जी के जीवन काल में ही झंडारोहण का उत्सव प्रचलित हो गया था। होली से पहले आने वाली नवमी से लेकर होली के पश्चात आने वाली नवमी तक गुरु मंदिर में उत्सव मनाया जाता था।

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